केदारनाथ धाम में इस साल श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ कचरा प्रबंधन भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच केदारनाथ में 50.30 मीट्रिक टन कचरा दर्ज किया गया। यह मात्रा पिछले वर्षों में पूरे यात्रा सीजन के दौरान दर्ज किए गए कचरे से भी अधिक है। वहीं 24 सितंबर तक केदारनाथ धाम में 15.42 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की जानकारी सामने आई है। कचरे के बढ़ते आंकड़ों ने हिमालयी क्षेत्र में यात्रा के पर्यावरणीय प्रभाव और कचरा प्रबंधन को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
केदारनाथ नगर पंचायत की ओर से सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 के शुरुआती पांच महीनों में ही 50.30 मीट्रिक टन कचरा दर्ज किया गया। इसकी तुलना यदि पिछले वर्षों के पूरे यात्रा सीजन से की जाए तो 2023 में 32.58 टन, 2024 में 26.10 टन और 2025 में 21.40 टन कचरा दर्ज किया गया था। यानी इस साल अप्रैल से अगस्त तक दर्ज कचरे की मात्रा पिछले तीनों वर्षों के पूरे साल के आंकड़ों से अधिक हो चुकी है।
मासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो अप्रैल में केदारनाथ में करीब 1.7 टन कचरा दर्ज हुआ था। मई में यह बढ़कर 16.3 टन हो गया। जून में 11.5 टन, जुलाई में 10.5 टन और अगस्त में 10.3 टन कचरा दर्ज किया गया। इससे साफ है कि यात्रा सीजन में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ कचरे की मात्रा में भी तेजी आई।
कचरे में प्लास्टिक की मात्रा भी प्रशासन के लिए चिंता का विषय है। उपलब्ध आरटीआई आंकड़ों के मुताबिक 2026 में अब तक करीब 20 टन प्लास्टिक कचरा दर्ज किया गया, जिसमें से 18.5 टन को प्रोसेस किए जाने की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि केदारनाथ में कचरा निस्तारण के लिए करीब 30 हजार वर्गफुट क्षेत्र लैंडफिल के लिए निर्धारित है और पिछले पांच वर्षों में चार लैंडफिल बनाए गए हैं।
इस बीच श्रद्धालुओं को भी कचरा वापस नीचे लाने के लिए अभियान से जोड़ा जा रहा है। जिला प्रशासन की 'कैरी मी बैक पॉलिसी' के तहत अब तक 4,732 श्रद्धालुओं की मदद से 12 टन सूखा कूड़ा केदारनाथ से गौरीकुंड तक पहुंचाया जा चुका है। श्रद्धालुओं को विशेष बैग दिए जाते हैं, जिनमें वे प्लास्टिक की बोतलें, रैपर, पैकेजिंग सामग्री और दूसरे सूखे कचरे को जमा करके अपने साथ नीचे लाते हैं।
इस अभियान में एक श्रद्धालु को सामान्य तौर पर करीब चार से पांच किलोग्राम सूखा कचरा अपने साथ वापस लाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। नगर पंचायत केदारनाथ, हीलिंग हिमालयास फाउंडेशन और सुलभ इंटरनेशनल के सहयोग से यह अभियान चलाया जा रहा है। गौरीकुंड पहुंचने के बाद कचरे के सुरक्षित संग्रहण, परिवहन और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निस्तारण की व्यवस्था की जा रही है।
केदारनाथ में इस साल श्रद्धालुओं की संख्या भी लगातार बढ़ी है। उत्तराखंड सरकार के 15 सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक 14 सितंबर की शाम तक ही केदारनाथ में 14,98,544 श्रद्धालु दर्शन कर चुके थे। बाद के आंकड़ों में 24 सितंबर तक यह संख्या 15.42 लाख से अधिक बताई गई। इसका मतलब है कि यात्रा सीजन में धाम तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती रही है।
श्रद्धालुओं की इतनी बड़ी संख्या वाले संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में कचरे का प्रबंधन केवल सफाई व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण से भी सीधे जुड़ा है। केदारनाथ ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है, जहां कचरे को नीचे लाना, अलग-अलग करना और उसका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करना मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। इसी वजह से प्रशासन की ओर से यात्रियों को कचरा वापस लाने और प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है।
पुराने पर्यावरणीय आंकड़े भी बताते हैं कि तीर्थस्थलों पर बढ़ता पर्यटन कचरा प्रबंधन के लिए चुनौती बन सकता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संबंधित दस्तावेजों में उत्तराखंड स्टेट एनवायरनमेंट प्लान के हवाले से बताया गया था कि 2021-22 के यात्रा सीजन में केदारनाथ में करीब 15.63 लाख तीर्थयात्रियों के मुकाबले 2.08 टन सूखा कचरा दर्ज किया गया था। हालांकि पुराने और मौजूदा आंकड़ों की गणना की पद्धति अलग हो सकती है, इसलिए दोनों को सीधे एक-दूसरे से जोड़कर तुलना करना उचित नहीं होगा।
केदारनाथ में कचरे के बढ़ते आंकड़ों के बीच 'कैरी मी बैक' अभियान से मिलने वाला 12 टन सूखा कूड़ा यह भी दिखाता है कि श्रद्धालुओं को सीधे सफाई व्यवस्था से जोड़ने पर सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। 4,732 यात्रियों ने अब तक इस अभियान में हिस्सा लिया है और यात्रा सीजन के दौरान इसे जारी रखने की योजना है।
प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ कचरा प्रबंधन की क्षमता भी उसी अनुपात में बढ़ाई जाए। केदारनाथ में आने वाले यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और इसी के साथ प्लास्टिक, पैकेजिंग और अन्य ठोस कचरे का दबाव भी बढ़ सकता है। ऐसे में स्रोत पर कचरे को अलग करना, प्लास्टिक को वापस लाना, रीसाइक्लिंग और वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी होगा।
ताजा आंकड़ों से फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2026 में केदारनाथ में कचरा प्रबंधन एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। अप्रैल से अगस्त के केवल पांच महीनों में 50.30 टन कचरा दर्ज होना और इसी अवधि में लाखों श्रद्धालुओं का पहुंचना इस चुनौती का पैमाना बताता है। दूसरी ओर, 12 टन सूखा कचरा श्रद्धालुओं के जरिए गौरीकुंड तक पहुंचना यह संकेत देता है कि यात्रा में शामिल लोगों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर इस समस्या को कम करने की कोशिश की जा सकती है।









