देहरादून। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच टोंस नदी पर प्रस्तावित बहुउद्देशीय किशाऊ बांध परियोजना को लेकर वर्षों से चली आ रही प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती नजर आ रही है। परियोजना को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चाओं, सहमति और तकनीकी प्रक्रियाओं के बीच अब छह राज्यों की सहमति बनने की उम्मीद जताई जा रही है। यदि प्रस्तावित सहमति आगे बढ़ती है तो किशाऊ बांध परियोजना को कागजों और बैठकों से निकालकर जमीन पर उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।
किशाऊ बांध परियोजना को केवल एक बांध के निर्माण के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। यह एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य बिजली उत्पादन के साथ-साथ सिंचाई और पेयजल की जरूरतों को पूरा करना भी है। परियोजना का प्रभाव उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के साथ उन राज्यों तक पहुंच सकता है जिन्हें इससे जल और बिजली के रूप में लाभ मिलने की उम्मीद है। इसी कारण परियोजना की लागत, पानी के बंटवारे, बिजली उत्पादन और राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है।
किशाऊ परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है। प्रस्तावित बांध उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के सीमावर्ती क्षेत्र और हिमाचल प्रदेश से जुड़े इलाके में स्थित होगा। पहाड़ी क्षेत्र में इतनी बड़ी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए जमीन, पर्यावरण, पुनर्वास, वित्तीय व्यवस्था और अंतरराज्यीय सहमति जैसे कई स्तरों पर निर्णय आवश्यक हैं। यही कारण है कि परियोजना की घोषणा और योजना बनने के बाद भी इसे जमीन पर उतारने में लंबा समय लगा है।
परियोजना से जुड़े छह राज्यों में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली का नाम प्रमुख रूप से सामने आता है। इन राज्यों की जरूरतों और प्रस्तावित लाभों को ध्यान में रखते हुए परियोजना में जल एवं ऊर्जा से जुड़े हिस्सों का निर्धारण किया जाना है। किसी भी बड़े अंतरराज्यीय बांध के लिए पानी के उपयोग और लाभों का बंटवारा बेहद संवेदनशील विषय होता है। इसलिए सभी राज्यों के बीच सहमति परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक मानी जाती है।
किशाऊ बांध परियोजना की कल्पना काफी पहले की गई थी और समय-समय पर इसे लेकर केंद्र तथा संबंधित राज्य सरकारों के स्तर पर चर्चा होती रही है। परियोजना के आकार और लागत के कारण इसमें कई तरह की प्रशासनिक और तकनीकी मंजूरियां भी जरूरी हैं। परियोजना को अंतिम रूप देने के लिए राज्यों के बीच समझौता, वित्तीय मॉडल और निर्माण एजेंसी से जुड़े मुद्दों पर सहमति जरूरी है।
इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसकी बहुउद्देशीय प्रकृति शामिल है। बांध से जल संग्रहण के जरिए सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करने की योजना है। इसके अलावा पेयजल की जरूरतों के लिए भी जल उपलब्ध कराने की संभावना है। बिजली उत्पादन भी परियोजना का प्रमुख हिस्सा है। यदि परियोजना निर्धारित क्षमता के अनुसार विकसित होती है तो इससे उत्तर भारत के बिजली और जल प्रबंधन ढांचे को लाभ मिलने की उम्मीद है।
उत्तराखंड के लिए यह परियोजना विशेष महत्व रखती है, क्योंकि प्रस्तावित बांध राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में स्थित होगा। परियोजना से जुड़े निर्माण कार्यों के दौरान स्थानीय स्तर पर सड़क, पुल, बिजली, संचार और अन्य बुनियादी ढांचे के विकास की संभावना भी रहती है। बड़ी परियोजना के आने से निर्माण गतिविधियों के साथ रोजगार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अवसर भी पैदा हो सकते हैं। हालांकि इसके साथ स्थानीय पर्यावरण और प्रभावित आबादी से जुड़े सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
किशाऊ परियोजना को लेकर सबसे बड़ा सवाल इसकी लंबी समयावधि रहा है। वर्षों से परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिशें होती रही हैं, लेकिन अलग-अलग स्तरों पर सहमति और मंजूरियों की प्रक्रिया के कारण काम जमीन पर अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पाया। अब छह राज्यों के स्तर पर सहमति की उम्मीद ने परियोजना से जुड़े लोगों में नई उम्मीद पैदा की है। यदि सहमति औपचारिक रूप लेती है तो आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया को तेजी मिलने की संभावना है।
बड़े बांधों के मामले में पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन भी महत्वपूर्ण होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में बांध निर्माण के कारण नदी के प्राकृतिक प्रवाह, जंगल, जैव विविधता, स्थानीय बस्तियों और भूगर्भीय स्थिति पर असर का अध्ययन किया जाता है। किशाऊ जैसी बड़ी परियोजना के लिए भी पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों से जुड़े पहलुओं पर आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन करना होगा। निर्माण शुरू होने से पहले संबंधित मंजूरियों और शर्तों को पूरा करना जरूरी होगा।
परियोजना से प्रभावित होने वाले स्थानीय लोगों के पुनर्वास और मुआवजे का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहेगा। किसी भी बड़े जलाशय के निर्माण में कुछ क्षेत्र जलमग्न हो सकते हैं और वहां रहने वाले परिवारों को विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए प्रभावित परिवारों के लिए उचित पुनर्वास, मुआवजा और आजीविका की व्यवस्था परियोजना की सफलता का अहम हिस्सा होगी। स्थानीय लोगों की चिंताओं को दूर किए बिना परियोजना को लंबे समय तक सुचारु रूप से आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है।
किशाऊ बांध से मिलने वाले जल लाभों का बंटवारा भी छह राज्यों के बीच महत्वपूर्ण विषय है। पानी की मांग लगातार बढ़ रही है और उत्तर भारत के कई राज्यों में सिंचाई तथा पेयजल के लिए जल संसाधनों पर दबाव है। ऐसे में किसी बड़े जलाशय से मिलने वाले अतिरिक्त जल का उपयोग किस प्रकार किया जाएगा, यह अंतरराज्यीय समझौते का प्रमुख हिस्सा हो सकता है।
दिल्ली जैसे बड़े महानगर के लिए जल उपलब्धता हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। इसी तरह हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में सिंचाई और पेयजल की जरूरतें बड़ी हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के लिए नदी जल और बिजली उत्पादन के साथ स्थानीय विकास का पहलू महत्वपूर्ण है। इस वजह से परियोजना के लाभों का संतुलित वितरण सभी पक्षों की प्राथमिकता हो सकता है।
बिजली उत्पादन के लिहाज से भी किशाऊ परियोजना महत्वपूर्ण मानी जाती है। जलविद्युत ऊर्जा को अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा स्रोत के रूप में देखा जाता है, हालांकि बड़े जलविद्युत प्रोजेक्ट के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का आकलन भी जरूरी है। यदि परियोजना आगे बढ़ती है तो उत्तर भारत के ऊर्जा तंत्र को अतिरिक्त बिजली मिल सकती है और राज्यों की ऊर्जा जरूरतों में योगदान किया जा सकता है।
परियोजना के निर्माण में बड़ी वित्तीय राशि की आवश्यकता होगी। लागत बढ़ने का मुद्दा भी वर्षों से चल रही परियोजनाओं में महत्वपूर्ण होता है। जिस समय परियोजना की प्रारंभिक लागत का अनुमान लगाया गया था, उसके बाद निर्माण सामग्री, श्रम, मशीनरी, भूमि और अन्य खर्चों में वृद्धि हो सकती है। इसलिए अंतिम वित्तीय मॉडल तैयार करते समय परियोजना की मौजूदा लागत का पुनर्मूल्यांकन भी आवश्यक होगा।
छह राज्यों की संभावित सहमति के बाद परियोजना के सामने सबसे महत्वपूर्ण चरण वास्तविक क्रियान्वयन का होगा। समझौते के बाद भी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, वित्तीय मंजूरी, पर्यावरणीय एवं वन संबंधी अनुमति, भूमि और पुनर्वास जैसी प्रक्रियाओं को पूरा करना होगा। निर्माण शुरू होने के बाद भी परियोजना को पूरा होने में कई वर्ष लग सकते हैं। इसलिए मौजूदा सहमति को शुरुआत का निर्णायक चरण माना जा सकता है, न कि परियोजना के तत्काल निर्माण की गारंटी।
स्थानीय स्तर पर परियोजना को लेकर रोजगार और विकास की उम्मीद भी जुड़ी हुई है। सड़क निर्माण, सुरंग, बांध, बिजलीघर और अन्य बुनियादी ढांचे के काम में बड़ी संख्या में तकनीकी और गैर-तकनीकी श्रमिकों की आवश्यकता हो सकती है। स्थानीय कारोबार को भी निर्माण गतिविधियों से फायदा मिल सकता है। लेकिन इन संभावित लाभों के साथ यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि स्थानीय लोगों को परियोजना से वास्तविक और दीर्घकालिक लाभ मिले।
पहाड़ी क्षेत्रों में किसी बड़े बांध की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण विषय है। बांध निर्माण से पहले क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता, भूगर्भीय संरचना, भूस्खलन की संभावना और नदी के व्यवहार का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए इन पहलुओं पर विशेष ध्यान देना जरूरी होगा।
किशाऊ परियोजना के समर्थकों के लिए छह राज्यों की सहमति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से अटकी अंतरराज्यीय प्रक्रिया को इससे गति मिल सकती है। यदि सभी संबंधित पक्ष जल, बिजली, लागत और जिम्मेदारियों के बंटवारे पर सहमत हो जाते हैं तो परियोजना के अगले चरणों को आगे बढ़ाना आसान होगा। इससे केंद्र सरकार के स्तर पर भी आवश्यक मंजूरियों और वित्तीय प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद की जा सकती है।
वहीं परियोजना को लेकर स्थानीय और पर्यावरणीय चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बड़ी परियोजना के निर्माण से पहले प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के साथ संवाद, पर्यावरणीय प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन और पारदर्शी पुनर्वास नीति जरूरी होगी। इससे परियोजना के प्रति स्थानीय विश्वास बढ़ाया जा सकता है और भविष्य में विरोध या कानूनी अड़चनों की संभावना कम हो सकती है।
वर्षों से प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना का अब वास्तविक धरातल पर पहुंचना कई स्तरों पर निर्भर करेगा। छह राज्यों की सहमति यदि औपचारिक रूप से दर्ज होती है तो यह निश्चित तौर पर बड़ा प्रशासनिक कदम होगा। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकारों को परियोजना से जुड़े शेष तकनीकी, पर्यावरणीय, वित्तीय और पुनर्वास संबंधी मुद्दों को तय करना होगा।
फिलहाल सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि वर्षों से फाइलों में चल रही परियोजना को अंतरराज्यीय सहमति का आधार मिल सके। टोंस नदी पर बनने वाली किशाऊ परियोजना उत्तर भारत के जल और ऊर्जा ढांचे के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन इसकी वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब सहमति के बाद निर्माण की प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से आगे बढ़े, स्थानीय लोगों के हित सुरक्षित रहें और पर्यावरणीय मानकों का पूरी तरह पालन किया जाए।
यदि छह राज्यों की प्रस्तावित मुहर लगती है तो इसे किशाऊ परियोजना के लिए लंबे इंतजार के बाद एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाएगा। अब तक जो योजना कागजों, बैठकों और समझौतों के स्तर पर घूमती रही है, उसे जमीन पर उतारने की दिशा में यह पहला बड़ा कदम होगा। आने वाले समय में परियोजना की मंजूरियों, वित्तीय व्यवस्था, पुनर्वास और निर्माण की समयसीमा पर होने वाले फैसले यह तय करेंगे कि किशाऊ बांध वास्तव में कब आकार लेता है।











