दिल्ली हाईकोर्ट ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की ‘जमीन के बदले नौकरी’ मामले में याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि CBI की जांच और आरोपपत्र कानूनी हैं। इस फैसले से लालू के लिए राजनीतिक और कानूनी चुनौती बढ़ गई।
Bihar: राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा। कोर्ट ने उनके और उनके परिवार से जुड़े “जमीन के बदले नौकरी” मामले में CBI द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। इस फैसले के बाद लालू यादव के लिए यह मामला और जटिल हो गया है।
लालू यादव की याचिका का आधार
लालू यादव ने अपनी याचिका में कहा था कि CBI ने इस मामले में मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक मंजूरी नहीं ली थी। उनका तर्क था कि जांच, एफआईआर, जांच की प्रक्रिया और आरोपपत्र कानूनी रूप से मान्य नहीं हैं। यादव ने दावा किया कि सीबीआई ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी नहीं ली थी। अदालत ने इस दलील को मान्यता नहीं दी और टिप्पणी की कि इस याचिका में कोई दम नहीं है।
न्यायाधीश की टिप्पणी
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस रविंदर डुडेजा ने लालू यादव की याचिका खारिज करते हुए कहा, “याचिका में कोई दम नहीं है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है।” इस याचिका में 2022, 2023 और 2024 में दायर तीन आरोपपत्र और बाद के संज्ञान लेने के आदेशों को रद्द करने का अनुरोध किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपपत्र और जांच में कोई वैधानिक खामी नहीं है।
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'जमीन के बदले नौकरी' मामले का इतिहास
यह मामला लालू यादव के रेल मंत्री के कार्यकाल (2004-2009) के दौरान मध्य प्रदेश के जबलपुर में भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में की गई ‘ग्रुप डी’ नियुक्तियों से जुड़ा है। आरोपों के अनुसार, ये नियुक्तियां उन लोगों को दी गई थीं जिन्होंने राजद प्रमुख के परिवार या सहयोगियों के नाम पर जमीन उपहार स्वरूप दी थी। इसे लेकर सीबीआई ने जांच शुरू की थी।
इस मामले में 18 मई 2022 को एफआईआर दर्ज की गई थी। एफआईआर में लालू यादव, उनकी पत्नी, दो बेटियां, अज्ञात सरकारी अधिकारी और निजी व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया। वर्तमान में 77 वर्षीय लालू प्रसाद यादव और अन्य आरोपी जमानत पर हैं।
क्या है कानूनी प्रक्रिया
CBI ने इस मामले में आरोप पत्र दाखिल किया और जांच प्रक्रिया पूरी की। लालू यादव का दावा था कि CBI ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून की पूर्व अनुमति नहीं ली, इसलिए आरोपपत्र रद्द किया जाना चाहिए। लेकिन अदालत ने कहा कि यह दलील मान्य नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच प्रक्रिया और आरोपपत्र में कानूनी खामी नहीं है और मामला अदालत में वैध है।
इस फैसले के बाद राजद सुप्रीमो लालू यादव के लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर चुनौती बढ़ गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिका में कोई दम नहीं है, इसलिए CBI द्वारा दर्ज केस वैध रहेगा। यह फैसला यह भी संकेत देता है कि अदालत इस मामले में जांच एजेंसी की स्वतंत्रता और जांच प्रक्रिया को महत्व देती है।









