लोमड़ी और अंगूर: असफलता पर बहाने बनाने की कहानी

लोमड़ी और अंगूर की यह प्रसिद्ध कहानी सिखाती है कि असफलता पर बहाने बनाना आत्म-धोखा है। पढ़ें एक गहरी नैतिक सीख वाली कथा।

यह कहानी हमें मानव स्वभाव की एक बहुत बड़ी कमजोरी के बारे में बताती है। अक्सर जब लोग अपनी कड़ी मेहनत या योग्यता के बावजूद किसी चीज़ को हासिल करने में असफल हो जाते हैं, तो वे अपनी हार मानने के बजाय उस चीज़ में ही बुराई ढूँढने लगते हैं। यह कहानी आत्म-धोखे और झूठे बहानों पर एक करारा प्रहार है।

कहानी 

एक बार की बात है, एक घने जंगल में एक बहुत ही चालाक लोमड़ी रहती थी। उस दिन दोपहर का समय था और सूरज तेज़ तप रहा था। लोमड़ी को बहुत ज़ोर की भूख लगी थी और वह सुबह से भोजन की तलाश में यहाँ-वहाँ भटक रही थी। उसने पूरे जंगल का कोना-कोना छान मारा था, लेकिन उसे कहीं भी शिकार या फल नहीं मिले थे। भटकते-भटकते वह काफी थक गई थी और उसकी हिम्मत जवाब देने लगी थी। तभी वह जंगल के एक ऐसे हिस्से में जा पहुँची जहाँ एक बहुत बड़ा और सुंदर फलों का बगीचा था।

उस बगीचे के बीचों-बीच अंगूरों की एक विशाल बेल लगी थी, जो एक ऊँचे मचान के सहारे आसमान की ओर बढ़ रही थी। लोमड़ी ने जब ऊपर देखा, तो उसकी आँखें चमक उठीं और उसकी सारी थकान पल भर में दूर हो गई। बेल पर अंगूरों के बड़े-बड़े, बैंगनी और रसीले गुच्छे लटक रहे थे। वे अंगूर देखने में बहुत ही ताज़ा और मीठे लग रहे थे। ऐसा लगता था जैसे वे अभी-अभी ओस की बूंदों से धोए गए हों। लोमड़ी के मुँह में पानी आ गया। उसने मन ही मन सोचा, 'वाह! आज तो किस्मत खुल गई। इन मीठे और रसीले अंगूरों को खाकर मेरी सारी भूख और प्यास एक साथ मिट जाएगी। मुझे अब और कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है।'

अंगूरों के गुच्छे काफी ऊँचाई पर लटक रहे थे। लोमड़ी ने पहले अपनी जगह का जायज़ा लिया और फिर अपनी पूरी ताकत लगाकर ऊपर की ओर एक ऊँची छलाँग मारी, लेकिन उसके हाथ कुछ नहीं लगा। वह अंगूरों के गुच्छे से कुछ ही इंच दूर रह गई। लोमड़ी ने हार नहीं मानी। उसने सोचा कि शायद वह ठीक से उछल नहीं पाई। उसने थोड़ा पीछे हटकर दौड़ लगाई और पूरी फुर्ती के साथ फिर से ज़ोर से उछली, लेकिन इस बार भी वह अंगूरों को छू तक नहीं सकी।

लोमड़ी बार-बार उछलती रही, कभी दाएं से तो कभी बाएं से। उसने अलग-अलग कोणों से प्रयास किए, अपनी एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया, लेकिन अंगूरों की ऊँचाई उसकी पहुँच से बहुत ज़्यादा थी। वह जितनी बार उछलती, उतनी ही ज़ोर से ज़मीन पर गिरती। धीरे-धीरे लोमड़ी थककर चूर हो गई, उसका शरीर पसीने से तर-बतर हो गया और उसकी साँस बुरी तरह फूलने लगी। उसे अब समझ आ गया था कि वह कितनी भी कोशिश कर ले, उसकी छोटी कद-काठी उन ऊँचे अंगूरों तक नहीं पहुँच पाएगी।

पड़ोस के पेड़ पर बैठा एक पक्षी यह सब देख रहा था। अपनी हार को स्वीकार करना लोमड़ी की फितरत में नहीं था। वह नहीं चाहती थी कि कोई उसे असफल या कमज़ोर समझे। उसने अपनी धूल झाड़ी, अपनी नाक सिकोड़ी और उन रसीले अंगूरों की तरफ एक तिरछी और नफरत भरी नज़र डाली। उसने बड़े घमंड के साथ ज़ोर से कहा ताकि आसपास के जानवर भी सुन सकें, 'छोड़ो भी, मुझे ये अंगूर चाहिए भी नहीं। मैं तो बस इन्हें करीब से देख रही थी। देखने में ही लग रहा है कि ये अंगूर अभी कच्चे हैं और बहुत खट्टे हैं। अगर मैं इन्हें खाऊँगी, तो मेरा गला खराब हो जाएगा और मैं बीमार पड़ जाऊँगी। ऐसे खट्टे अंगूरों से तो भूखा रहना ही बेहतर है।'

यह कहकर वह लोमड़ी अपना सिर ऊँचा उठाकर वहाँ से शान से चलते बनी, जैसे उसे अंगूर न मिलने का कोई दुख ही न हो। वह खुद को यह तसल्ली दे रही थी कि अंगूर खट्टे हैं, जबकि असलियत यह थी कि वह अपनी असमर्थता और असफलता को छिपाने का एक झूठा बहाना ढूँढ रही थी।

सीख

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि 'जो चीज़ हम अपनी योग्यता की कमी के कारण हासिल नहीं कर पाते, अक्सर हम उसमें ही बुराई निकालना शुरू कर देते हैं।' हमें अपनी असफलताओं के लिए झूठे बहाने बनाने के बजाय अपनी सीमाओं को स्वीकार करना चाहिए और उन्हें पार करने के लिए और अधिक परिश्रम करना चाहिए।

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