तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा को शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा। फेसबुक पर कथित रूप से भड़काऊ पोस्ट से जुड़े एक आपराधिक मामले में महुआ मोइत्रा ने पुलिस के समक्ष वर्चुअल माध्यम से पेश होने की अनुमति मांगते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था।
नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा को एक आपराधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। सर्वोच्च अदालत ने पुलिस जांच के दौरान वर्चुअल माध्यम से पेश होने की उनकी मांग को खारिज करते हुए कहा कि केवल सांसद होने के आधार पर किसी को विशेष छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नेताओं को राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
यह मामला एक सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है, जिसके संबंध में पश्चिम बंगाल में उनके खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी। महुआ मोइत्रा ने अदालत से अनुरोध किया था कि उन्हें जांच अधिकारी के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान महुआ मोइत्रा की दलीलों पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक राजनीति में भाग लेने वाले जनप्रतिनिधियों को विरोध और आलोचना जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। पीठ ने टिप्पणी की कि स्वतंत्रता सेनानियों ने देश के लिए बड़े बलिदान दिए थे और आज के जनप्रतिनिधियों को सार्वजनिक जीवन की कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि केवल राजनीतिक पद धारण करने के कारण किसी व्यक्ति को जांच प्रक्रिया से अलग तरह का व्यवहार नहीं मिल सकता।
वर्चुअल पेशी की मांग क्यों की गई?

महुआ मोइत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उनकी मुवक्किल को आशंका है कि यदि वह व्यक्तिगत रूप से पुलिस स्टेशन पहुंचती हैं, तो कुछ लोग उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। याचिका में यह तर्क दिया गया कि पहले भी उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए थे और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण उन्हें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जांच में शामिल होने की अनुमति दी जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को पर्याप्त आधार नहीं माना और पूछा कि क्या केवल सांसद होने के कारण उन्हें वर्चुअल उपस्थिति की अनुमति दी जानी चाहिए।
हाई कोर्ट के आदेश का भी हुआ उल्लेख
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कलकत्ता हाई कोर्ट पहले ही महुआ मोइत्रा को जांच एजेंसी के साथ सहयोग करने का निर्देश दे चुका है। अदालत ने कहा कि यदि जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है, तो उसका पालन किया जाना चाहिए। पीठ ने संकेत दिया कि न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है, चाहे वह जनप्रतिनिधि हो या सामान्य नागरिक। इसी आधार पर सर्वोच्च अदालत ने याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
मामला क्या है?
यह विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सोशल मीडिया पर साझा किए गए कुछ वीडियो और पोस्ट से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि संबंधित पोस्ट भड़काऊ प्रकृति की थीं और उन्होंने सामाजिक तनाव को बढ़ावा देने का काम किया। इन आरोपों के आधार पर स्थानीय पुलिस ने मामला दर्ज किया था और जांच शुरू की गई थी। इसके बाद महुआ मोइत्रा ने एफआईआर को चुनौती देते हुए कानूनी राहत की मांग की थी।
पिछले महीने कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन्हें अंतरिम संरक्षण प्रदान किया था, लेकिन साथ ही यह भी निर्देश दिया था कि वे निर्धारित तिथि पर जांच अधिकारी के सामने पेश होकर जांच में सहयोग करें।













