केंद्र सरकार ने शैक्षणिक वर्ष 2025-26 में देश में एमबीबीएस और मेडिकल पीजी सीटों की संख्या का खुलासा किया है। इस साल 1,28,875 एमबीबीएस और 80,291 मेडिकल पीजी सीटें उपलब्ध हैं। कुछ सीटें अभी भी खाली हैं और सरकार भविष्य में प्रवेश परीक्षाओं में सुधार कर छात्रों पर अकादमिक दबाव कम करने पर विचार कर रही है।
MBBS And Medical PG Seats 2025-26: केंद्र सरकार ने हाल ही में बताया कि इस शैक्षणिक वर्ष में देश में कुल 1,28,875 एमबीबीएस और 80,291 मेडिकल पीजी सीटें उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार इन सीटों में 65,193 सरकारी और 63,682 प्राइवेट एमबीबीएस सीटें शामिल हैं। कुछ सीटें अभी भी खाली हैं और सरकार ने भविष्य में प्रवेश परीक्षाओं में सुधार की योजना बनाई है, ताकि छात्रों पर अकादमिक दबाव कम हो और पढ़ाई का गुणवत्ता पूर्ण मूल्यांकन हो सके।
कुल एमबीबीएस और मेडिकल पीजी सीटें
केंद्र सरकार ने शैक्षणिक वर्ष 2025-26 में देश में मेडिकल शिक्षा की स्थिति का डेटा साझा किया है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार इस साल देश में कुल 1,28,875 एमबीबीएस सीटें उपलब्ध हैं, जिनमें 65,193 सरकारी और 63,682 प्राइवेट कॉलेजों की सीटें शामिल हैं। चार राउंड की ऑल इंडिया काउंसलिंग के बाद भी 72 सीटें खाली रह गई हैं। वहीं, मेडिकल पीजी में कुल 80,291 सीटें हैं, जिनमें 17,707 डीएनबी, डीआरएनबी, एफएनबी और पोस्ट एमबीबीएस डिप्लोमा सीटें शामिल हैं।
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राज्यवार एमबीबीएस सीट वितरण
एमबीबीएस सीटों का वितरण राज्यों के अनुसार भिन्न है। आंध्र प्रदेश में 3,415 सरकारी और 3,800 प्राइवेट सीटें हैं, असम में 1,975 सरकारी सीटें हैं जबकि प्राइवेट सीटें नहीं हैं। बिहार में 1,645 सरकारी और 1,900 प्राइवेट सीटें, दिल्ली में 1,296 सरकारी और 100 प्राइवेट सीटें उपलब्ध हैं। तमिलनाडु में 5,250 सरकारी और 7,800 प्राइवेट सीटें हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में 5,925 सरकारी और 7,500 प्राइवेट सीटें हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि मेडिकल शिक्षा का क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन कुछ राज्यों में सीटों की कमी या खाली रहना अभी भी चुनौती है।
भविष्य में प्रवेश परीक्षाओं में बदलाव
केंद्र सरकार ने मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में सुधार के लिए कई पहल पर विचार शुरू कर दिया है। प्रस्तावित बदलावों में जेईई मेन, नीट और सीयूईटी जैसी प्रवेश परीक्षाओं को कक्षा 11वीं में कराने का सुझाव शामिल है, ताकि छात्रों पर अकादमिक दबाव कम हो। इसके अलावा, बोर्ड परीक्षा के अंक और प्रवेश परीक्षा के परिणाम को वेटेज देने वाला हाइब्रिड असेसमेंट मॉडल भी लागू किया जा सकता है। यह छात्रों को कोचिंग पर निर्भरता कम करने और क्लासरूम पढ़ाई को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करेगा।
छात्रों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए संभावित प्रभाव
अगर ये सुधार लागू होते हैं, तो आने वाले वर्षों में छात्रों पर मानसिक दबाव कम होगा और उनकी पढ़ाई की गुणवत्ता भी बढ़ेगी। साल में दो बार प्रवेश परीक्षा कराने की योजना से छात्र अपनी तैयारी को बेहतर तरीके से मैनेज कर पाएंगे। इसके अलावा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत इन पहलों से देश में मेडिकल शिक्षा का पारदर्शी और संतुलित विकास सुनिश्चित होगा।








