मिज़ोरम विवाह और विरासत कानून संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: महिलाओं के अधिकारों पर भेदभाव का आरोप

मिज़ो विवाह व संपत्ति संशोधन अधिनियम 2026 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में इसे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताते हुए असंवैधानिक बताया गया है।

सुप्रीम कोर्ट में मिज़ो विवाह व संपत्ति कानून संशोधन 2026 को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह कानून मिज़ो महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करता है और गैर-मिज़ो पुरुषों से विवाह पर भेदभाव करता है।

आइजोल: मिज़ोरम में विवाह और संपत्ति अधिकारों से जुड़े कानून में किए गए हालिया संशोधनों को लेकर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। The Mizo Marriage and Inheritance of Property (Amendment) Act, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह संशोधन मिज़ो महिलाओं के अधिकारों के साथ भेदभाव करता है, विशेषकर उन महिलाओं के साथ जिन्होंने गैर-मिज़ो पुरुषों से विवाह किया है।

याचिका का मुख्य आधार

याचिका में कहा गया है कि संशोधित कानून ने मिज़ो महिलाओं के लिए कानूनी संरक्षण को सीमित कर दिया है। नए प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई मिज़ो महिला किसी गैर-मिज़ो पुरुष से विवाह करती है, तो उसे इस कानून के दायरे से बाहर कर दिया जाता है।

इसके विपरीत, यदि कोई मिज़ो पुरुष किसी गैर-मिज़ो महिला से विवाह करता है, तो वह इस कानून के अंतर्गत ही बना रहता है। याचिका में इसे स्पष्ट रूप से “लिंग आधारित भेदभाव” बताया गया है।

संशोधित कानून में क्या बदलाव किए गए हैं?

  • याचिका के अनुसार, संशोधन के तहत कानून की कई धाराओं—विशेषकर धारा 2, 3(m), 25 और 26(1)—में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
  • धारा 2 को संशोधित कर विवाह की कानूनी सीमा को केवल उन मामलों तक सीमित कर दिया गया है, जहां दोनों पति-पत्नी मिज़ो हों या पति मिज़ो हो।
  • धारा 3(m) में “मिज़ो” की परिभाषा को बदलते हुए पैतृक पहचान और पुरुष वंश को अधिक महत्व दिया गया है।
  • धारा 25 में वैवाहिक संपत्ति में महिलाओं के हिस्से पर एक अधिकतम सीमा तय कर दी गई है।
  • धारा 26(1) में महिलाओं की व्यक्तिगत संपत्ति की सुरक्षा से जुड़े पुराने प्रावधान को हटा दिया गया है।

महिलाओं के अधिकारों पर प्रभाव

याचिका में कहा गया है कि इन संशोधनों का प्रभाव केवल वैवाहिक स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मिज़ो महिलाओं के संपत्ति अधिकारों, विरासत और सामाजिक सुरक्षा को भी प्रभावित करता है।

मिज़ोरम में भूमि और संपत्ति अधिकार अक्सर पारंपरिक और सामुदायिक व्यवस्था से जुड़े होते हैं। ऐसे में यह कानून महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक सम्मान को कमजोर कर सकता है।

संवैधानिक दलीलें

याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि यह संशोधन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है, जो समानता और भेदभाव से सुरक्षा की गारंटी देते हैं।

इसके अलावा, यह तर्क भी दिया गया है कि यह बदलाव अनुसूचित जनजातियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 342) की भावना के खिलाफ है, क्योंकि इससे मिज़ो महिलाओं की सामाजिक और कानूनी स्थिति प्रभावित होती है।

याचिका में इसे “मनमाना और असमान वर्गीकरण” बताया गया है, जो केवल पति की पहचान और महिला के वैवाहिक निर्णय पर आधारित है।

संपत्ति और विरासत अधिकारों पर असर

याचिका में यह भी कहा गया है कि संशोधित कानून से मिज़ो महिलाओं के लिए विरासत और संपत्ति से जुड़े अधिकारों में अनिश्चितता पैदा हो गई है।

पारंपरिक भूमि व्यवस्था के तहत मिलने वाले अधिकार, सामुदायिक संपत्ति में हिस्सा और पारिवारिक संपत्ति पर नियंत्रण अब प्रभावित हो सकता है। इससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक स्थिति पर भी असर पड़ेगा।

याचिकाकर्ता का पक्ष

यह याचिका एक मिज़ो महिला द्वारा दायर की गई है, जिन्होंने वर्ष 1984 में एक गैर-मिज़ो पुरुष से विवाह किया था। उनका कहना है कि नए कानून से उनके मौलिक अधिकारों और संपत्ति अधिकारों पर सीधा प्रभाव पड़ता है और यह न्यायसंगत नहीं है।

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