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मोहन भागवत का बड़ा बयान: आरक्षण, भाषाई एकता, तीन बच्चों की नीति और घुसपैठ रोकने पर रखी राय

मोहन भागवत का बड़ा बयान: आरक्षण, भाषाई एकता, तीन बच्चों की नीति और घुसपैठ रोकने पर रखी राय

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने नेतृत्व की पारदर्शिता, तीन बच्चों की नीति, आरक्षण समर्थन, भाषाई एकता, घुसपैठ रोकने और तकनीक के बुद्धिमान उपयोग पर अपने विचार रखे।

New Delhi: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर दिल्ली के विज्ञान भवन में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार रखे और पत्रकारों के सवालों का जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ और भाजपा स्वतंत्र संगठन हैं और अपने-अपने क्षेत्र में काम करते हैं।

भागवत ने कहा कि नेतृत्व को साफ और पारदर्शी होना चाहिए। उन्होंने तीन बच्चों वाले परिवार को देशहित में सही बताया। इसके अलावा उन्होंने जातिगत आरक्षण, भाषाओं, शिक्षा और देश में घुसपैठ रोकने जैसे मुद्दों पर भी अपने विचार साझा किए।

संघ और भाजपा स्वतंत्र संगठन हैं- RSS चीफ

मोहन भागवत ने कहा कि संघ यह तय नहीं करता कि सरकार या पार्टी को क्या करना चाहिए। उन्होंने बताया कि संघ अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में सलाह दे सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय सरकार या पार्टी का होता है। भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ केवल मार्गदर्शन करता है और किसी भी तरह से निर्णय लेने वाला संगठन नहीं है।

उन्होंने कहा, "अगर संघ निर्णय लेता तो इतना समय क्यों लगता?" इसका अर्थ साफ है कि संघ और भाजपा अपने निर्णय स्वयं लेते हैं।

साफ और पारदर्शी नेतृत्व की जरूरत

मोहन भागवत ने कहा कि किसी भी संगठन या सरकार का नेतृत्व साफ और पारदर्शी होना चाहिए। उन्होंने हाल ही में संसद में पास हुए "CM और PM के जेल में रहने पर पदमुक्त" होने वाले बिल पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में संसद जैसा निर्णय लेगी, वैसा ही होगा। उनका मानना है कि कानून चाहे जैसा भी हो, उसका परिणाम यह होना चाहिए कि लोगों का विश्वास नेतृत्व में बना रहे।

व्यक्तिगत और सामाजिक परिवर्तन आवश्यक

भागवत ने समाज में परिवर्तन के लिए व्यक्तिगत बदलाव को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि पहले समाज का व्यवहार बदलना चाहिए और फिर व्यवस्थाओं में सुधार संभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ में तीन अपरिवर्तनीय विचार हैं, जो हिंदू राष्ट्र के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं।

तीन बच्चों वाले परिवार को देशहित में सही माना

मोहन भागवत ने कहा कि परिवार में तीन बच्चे होना देशहित में उचित है। इससे माता-पिता और बच्चों का स्वास्थ्य ठीक रहता है और जनसंख्या संतुलित रहती है। उन्होंने कहा कि तीन से अधिक बच्चे होने की जरूरत नहीं है।

शहरों के नाम आक्रमणकारियों पर नहीं

भागवत ने कहा कि शहरों और रास्तों के नाम आक्रमणकारियों पर नहीं होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम नेताओं और वीरांगनाओं के नाम पर शहरों और संस्थाओं का नाम होना चाहिए, लेकिन आक्रांताओं के नाम नहीं। उन्होंने उदाहरण दिया कि राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान दोनों ही प्रेरणा स्रोत हैं।

राम मंदिर और संघ का दृष्टिकोण

मोहन भागवत ने कहा कि राम मंदिर आंदोलन ऐसा था, जिसे संघ ने समर्थन दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि काशी और मथुरा के स्थलों के पुनरुद्धार जैसे अन्य आंदोलनों का संघ समर्थन नहीं करेगा। संघ के स्वयंसेवक स्वतंत्र हैं और वह किसी आंदोलन में व्यक्तिगत रूप से भाग ले सकते हैं।

जातिगत आरक्षण पर संघ का दृष्टिकोण

भागवत ने कहा कि जातिगत आरक्षण संवैधानिक रूप से सही है और संघ इसका समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय ने समाज में ऊपर और नीचे की स्थिति सुधारने का मार्ग दिखाया। उन्होंने कहा कि जो नीचे हैं, उन्हें ऊपर लाने के लिए मदद करनी चाहिए और जो ऊपर हैं, उन्हें हाथ पकड़ कर आगे बढ़ाना चाहिए।

भाषाओं और शिक्षा पर दृष्टिकोण

मोहन भागवत ने कहा कि भारत की सभी भाषाएं राष्ट्र भाषाएं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भाषा विवाद नहीं होना चाहिए और संपर्क के लिए एक भारतीय भाषा होना आवश्यक है। उन्होंने संस्कृत शिक्षा पर जोर दिया और कहा कि संस्कृत का ज्ञान भारत को समझने के लिए जरूरी है।

उन्होंने शिक्षा में तकनीक का बुद्धिमानी से उपयोग करने की बात कही और बताया कि नई शिक्षा नीति में पंचकोषीय शिक्षा का प्रावधान है, जिसमें कला, क्रीड़ा और योगा शामिल हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मकसद केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि संस्कारवान व्यक्ति तैयार करना होना चाहिए।

हिंसा पर स्पष्ट संदेश

मोहन भागवत ने कहा कि संघ कभी हिंसा नहीं करता। यह एक भ्रम है कि संघ हिंसक संगठन है। उन्होंने कहा कि यदि संघ हिंसक होता तो यह बड़ा और खुला संगठन नहीं रह पाता। कहा संघ में महिलाओं की प्रभावी भूमिका है। शाखाएं अलग हैं, लेकिन महिलाएं संघ प्रेरित संगठनों में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। उन्होंने महिलाओं को संघ की पूरक शक्ति बताया।

भारतीय ज्ञान परंपरा और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण

मोहन भागवत ने बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा संघ का अभिन्न हिस्सा है। संघ हर दिन अपने कार्यकर्ताओं को ऋषियों और आधुनिक वैज्ञानिकों के जीवन से परिचित कराता है। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य केवल भारत में है, लेकिन हिंदू स्वयंसेवक विदेशों में भी सक्रिय हैं और उनकी कार्यप्रणाली संघ जैसी ही है।

इस्लाम और घुसपैठ पर दृष्टिकोण

उन्होंने कहा कि इस्लाम भारत का हिस्सा है और हमेशा रहेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुसलमान नागरिकों को रोजगार देना चाहिए, लेकिन विदेशी घुसपैठ को रोकना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब सब एक हैं, तभी संघर्ष खत्म होगा।

त्योहारों में शाकाहारी भोजन का महत्व

भागवत ने कहा कि त्योहारों के दौरान लोग व्रत और शाकाहारी भोजन को महत्व देते हैं। इसलिए ऐसे समय पर मांसाहार से परहेज करना समझदारी है। उन्होंने कहा कि यह कानून बनाने की बात नहीं है, बल्कि सामाजिक समझ की जरूरत है। कहा कि विद्यार्थियों को संविधान की प्रस्तावना, नागरिक कर्त्तव्य, अधिकार और मार्गदर्शक तत्व की जानकारी होना जरूरी है। इससे बच्चे अपने देश और समाज के प्रति जिम्मेदार बनेंगे।

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