Mokshada Ekadashi 2025: मोक्षदा एकादशी कब है और क्यों मनाई जाती है?

मोक्षदा एकादशी 1 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी। इस व्रत से मोक्ष, पितरों का उद्धार, पाप नाश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह गीता जयंती का दिन भी है।

मोक्षदा एकादशी 1 दिसंबर 2025 को मनाई जा रही है। यह मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी भगवान विष्णु प्रिय और पुण्यदायी मानी जाती है। व्रत करने से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है, पितरों का उद्धार होता है, पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। गीता जयंती के रूप में भी यह दिन महत्वपूर्ण है।

Mokshada Ekadashi: मोक्षदा एकादशी इस साल 1 दिसंबर को मनाई जा रही है और इसका धार्मिक महत्व अत्यंत खास है। मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को भगवान विष्णु प्रिय और पुण्यदायी माना जाता है। यह व्रत भारत के हिंदू समाज में पूरे देश में विशेष रूप से पूजा और उपवास के माध्यम से मनाया जाता है। व्रत करने से साधक को मोक्ष मिलता है, पितरों का उद्धार होता है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। साथ ही, यह दिन गीता जयंती के रूप में भी महत्वपूर्ण है।

मोक्षदा एकादशी व्रत की तिथि और समय

इस साल मोक्षदा एकादशी 1 दिसंबर, 2025 को पड़ रही है। पंचांग के अनुसार, यह एकादशी मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की है और सोमवार को शुरू होकर 2 दिसंबर को दोपहर 3:57 बजे समाप्त होगी।

व्रत का पारण समय भी निर्धारित है। पारण सुबह 6:57 बजे से 9:03 बजे तक किया जा सकता है। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति को धार्मिक लाभ मिलता है और पितरों का उद्धार भी होता है।

मोक्षदा एकादशी को सभी एकादशियों में विशेष इसलिए माना जाता है क्योंकि इसे विष्णुप्रिया और पुण्यदायी कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन सिर्फ पूजन करने से ही भगवान श्रीहरि व्यक्ति का कल्याण करते हैं।

Mokshada Ekadashi 2025: मोक्षदा एकादशी कब है और क्यों मनाई जाती है?

मोक्षदा एकादशी क्यों मनाई जाती है?

मोक्षदा एकादशी का महत्व धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत अधिक है। इसे करने से जीवन में कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मोक्ष की प्राप्ति: इस व्रत को करने से साधक मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त करता है और पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होता है।
  • पितरों का उद्धार: इस दिन व्रत करके प्राप्त पुण्य को पितरों को अर्पित करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • गीता जयंती: मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन ही भगवान कृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान दिया था, इसलिए इस दिन को गीता जयंती भी कहा जाता है।
  • पापों का नाश: इस व्रत को करने से सभी प्रकार के पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सकारात्मकता आती है।
  • मनोकामनाओं की पूर्ति: व्रत और पूजा करने से संतान, धन, विवाह और अन्य इच्छाओं की पूर्ति होती है।
  • बैकुंठ लोक की प्राप्ति: मान्यता के अनुसार, इस एकादशी का व्रत करने से साधक को बैकुंठ लोक में स्थान प्राप्त होता है।

इस प्रकार मोक्षदा एकादशी न केवल पितरों की शांति और मोक्ष का मार्ग प्रदान करती है, बल्कि साधक के व्यक्तिगत जीवन में भी सुख, शांति और समृद्धि लाती है।

व्रत का धार्मिक महत्व और पूजा विधि

मोक्षदा एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले भक्त दिनभर निर्जला उपवास रखते हैं या हल्का फलाहार करते हैं। व्रत के दौरान भगवान विष्णु की पूजा करने और भगवद्गीता का पाठ करने का विशेष महत्व है।

  • स्नान और स्वच्छता: व्रत से पहले स्नान करना और घर को स्वच्छ रखना अनिवार्य है। यह धार्मिक पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
  • पूजा सामग्री: व्रती भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करके उन्हें फल, पुष्प, धूप, दीप और अक्षत अर्पित करते हैं।
  • गीता का पाठ: मोक्षदा एकादशी के दिन गीता का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह व्रती के ज्ञान और अध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है।
  • पितरों का तर्पण: इस दिन व्रत करने वाले अपने पूर्वजों को तर्पण अर्पित कर उनकी आत्मा की शांति के लिए विशेष रूप से पूजा करते हैं।

व्रत के दौरान विशेष ध्यान दें कि सभी क्रियाएं मन और आत्मा की शुद्धि के साथ की जाएं।

मोक्षदा एकादशी का सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व

मोक्षदा एकादशी केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज और परिवार की भलाई के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस दिन लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और दान करते हैं। इससे सामाजिक और धार्मिक दायित्व का पालन भी होता है।

इसके अलावा मोक्षदा एकादशी का व्रत मन और आत्मा को शुद्ध करता है। यह मानसिक शांति प्रदान करता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। व्रती इस दिन भक्ति, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।

मोक्षदा एकादशी का पालन कैसे करें?

  • उपवास और भजन: व्रती निर्जला या फलाहार व्रत रख सकते हैं। दिनभर भगवान विष्णु के भजन और कीर्तन में भाग लेने से पुण्य बढ़ता है।
  • दान और सेवा: इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • अध्यक्षता: व्रती घर में पूजा स्थान को सजाकर परिवार के सदस्यों को भी व्रत और पूजा में शामिल कर सकते हैं।
  • ध्यान और प्रार्थना: दिनभर ध्यान और प्रार्थना करना और मन को शांत रखना व्रत का मुख्य उद्देश्य होता है।

इस प्रकार व्रत को मन और आत्मा की शुद्धि के साथ रखना चाहिए।

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