बिहार के नालंदा जिले की बिहारशरीफ मंडल कारा में कैदी की रिहाई से जुड़ी एक गंभीर प्रशासनिक चूक सामने आई है। अदालत से जमानत एक बंदी को मिली थी, लेकिन जेल से दूसरे कैदी को रिहा कर दिया गया। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, दोनों बंदियों के नाम और पिता के नाम में समानता के कारण पहचान करने के दौरान गड़बड़ी हुई। इस चूक का पता उसी दिन नहीं चल सका, बल्कि करीब सात दिन बाद मामला सामने आया। इसके बाद जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया और रिहाई से जुड़े रिकॉर्ड की जांच शुरू की गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए जेल प्रशासन की रिपोर्ट और अनुशंसा के आधार पर तीन जेलकर्मियों को निलंबित कर दिया गया। इस घटना ने जेल में बंदियों की पहचान, जमानत के आदेशों के सत्यापन और रिहाई से पहले अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में सतीश चौहान उर्फ सतीश बिंद और चंद्रदीप चौहान उर्फ चंद्रदीप बिंद के नाम सामने आए हैं। बताया गया है कि सतीश चौहान अस्थावां थाना कांड संख्या 203/26 और 201/26 से जुड़े मामलों में बिहारशरीफ मंडल कारा में बंद थे। वहीं, चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना अस्थावां थाना कांड संख्या 362/25 के मामले में जेल में बंद था। रिपोर्ट के मुताबिक, सतीश चौहान के पिता का नाम भी चंद्रदीप बताया गया है। इसी तरह के नामों के कारण रिहाई के समय भ्रम पैदा होने की बात सामने आई है। आरोप है कि जमानत पाने वाले सतीश चौहान की जगह चंद्रदीप चौहान को जेल से बाहर जाने दिया गया। हालांकि, पहचान की प्रक्रिया में वास्तव में किस स्तर पर और किस वजह से गलती हुई, इसका अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
बताया जाता है कि यह घटना 24 सितंबर को हुई थी। उस दिन जमानत के आदेश के आधार पर बंदी को रिहा किया जाना था, लेकिन कथित तौर पर सही कैदी की पहचान सुनिश्चित नहीं हो सकी। जेल में बंदियों के नाम, पिता के नाम, संबंधित मुकदमों और अदालत के आदेश का मिलान करना रिहाई प्रक्रिया का अहम हिस्सा होता है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि यदि दस्तावेजों का सत्यापन किया गया था, तो गलत व्यक्ति जेल से बाहर कैसे चला गया। क्या रिहाई के समय केवल नाम के आधार पर पहचान की गई, या दूसरे पहचान विवरणों का भी मिलान हुआ था? क्या संबंधित बंदी के खिलाफ दर्ज सभी मामलों की स्थिति की जांच की गई थी? इन सवालों के जवाब जांच के बाद सामने आने की उम्मीद है।
इस घटना का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कथित तौर पर गलत कैदी के जेल से बाहर निकलने के बाद भी लगभग एक सप्ताह तक प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं मिली। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, एक अक्टूबर को सहायक प्रवेश शाखा के कक्षपाल नवीश कुमार की रिपोर्ट तैयार होने के बाद गड़बड़ी का पता चला। रिकॉर्ड की पड़ताल में यह सामने आया कि अदालत से जमानत पाने वाला सतीश चौहान जेल में ही बंद था, जबकि उसकी जगह दूसरा बंदी बाहर जा चुका था। इसके बाद जेल प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए रिहाई से संबंधित दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच शुरू की। इतने दिनों तक चूक का पता नहीं चलना भी प्रशासनिक निगरानी और रिकॉर्ड मिलान की व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े करता है।
मामले का खुलासा होने के बाद वास्तविक रूप से जमानत पाने वाले सतीश चौहान को दो अक्टूबर की सुबह विधिवत रिहा किया गया। दूसरी ओर, रिपोर्ट के मुताबिक, गलत पहचान के कारण जेल से बाहर निकले चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना ने भी उसी दिन स्थानीय अदालत में सरेंडर कर दिया। बताया गया है कि वह दोपहर करीब तीन बजे अदालत पहुंचा। इस तरह गड़बड़ी सामने आने के बाद दोनों बंदियों की स्थिति स्पष्ट हुई। हालांकि, इस घटनाक्रम ने रिहाई से पहले की जांच और जेल से बाहर जाने वाले बंदी की पहचान की पुष्टि करने की प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि चंद्रदीप चौहान के खिलाफ दो अलग-अलग आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें से एक मामले में उसे जमानत मिल चुकी थी, जबकि दूसरे मामले में जमानत लंबित होने की बात सामने आई। इसके बावजूद उसके जेल से बाहर निकलने का मामला सामने आया। इस बिंदु पर भी जांच की जरूरत है कि रिहाई के समय उसके खिलाफ दर्ज सभी मामलों की स्थिति किस तरह सत्यापित की गई थी। सामान्य तौर पर किसी बंदी की रिहाई के लिए संबंधित आदेशों और लंबित मामलों की स्थिति का सही मिलान आवश्यक होता है। यदि किसी बंदी के खिलाफ दूसरे मामले में हिरासत जारी रखने का आधार मौजूद हो, तो उस स्थिति की पुष्टि किए बिना रिहाई होना गंभीर प्रक्रिया संबंधी सवाल पैदा करता है। इस मामले में भी वास्तविक जिम्मेदारी और घटनाक्रम की पूरी तस्वीर जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होगी।
घटना सामने आने के बाद जेल अधीक्षक ने संबंधित ड्यूटीकर्मियों से स्पष्टीकरण मांगा। रिपोर्टों के अनुसार, जवाब और प्रारंभिक जांच के आधार पर जेल अधीक्षक ने मुख्यालय को अपनी रिपोर्ट भेजी। इसके बाद कारा महानिरीक्षक की ओर से तीन जेलकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने की कार्रवाई की गई। प्रकाशित जानकारी में निलंबित किए गए कर्मियों को जेल वार्डन बताया गया है। यह कार्रवाई प्रारंभिक जांच और जेल प्रशासन की अनुशंसा के आधार पर की गई है। अब यह स्पष्ट होना बाकी है कि रिहाई के दौरान किस कर्मचारी की क्या भूमिका थी, पहचान संबंधी दस्तावेजों की जांच किसने की थी और निगरानी की व्यवस्था में कहां कमी रह गई। निलंबन की कार्रवाई के बाद भी अंतिम जिम्मेदारी तय करने के लिए विभागीय जांच महत्वपूर्ण होगी।
इस मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर उच्चस्तरीय जांच की मांग भी उठने की खबर है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक स्थानीय कांग्रेस नेता ने वरिष्ठ अधिकारियों को आवेदन देकर घटना की जांच कराने की मांग की थी। मांग का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना बताया गया कि जमानत के आदेश के बाद गलत बंदी की रिहाई किन परिस्थितियों में हुई और निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ था या नहीं। जेल प्रशासन के लिए यह भी जांचना जरूरी होगा कि रिहाई से संबंधित रिकॉर्ड में नाम, पिता का नाम, मुकदमे की संख्या और अन्य पहचान विवरण किस तरह दर्ज थे और उनका मिलान कैसे किया गया।
जेल में बंद किसी व्यक्ति की रिहाई केवल एक औपचारिक कार्रवाई नहीं होती, बल्कि इसमें अदालत के आदेश, बंदी की पहचान, संबंधित मुकदमों की स्थिति और जेल रिकॉर्ड के बीच सटीक तालमेल जरूरी होता है। नाम या पिता के नाम में समानता होने पर अतिरिक्त सावधानी बरतना विशेष रूप से अहम हो जाता है, ताकि किसी दूसरे व्यक्ति को गलती से रिहा न कर दिया जाए। बिहारशरीफ मंडल कारा का यह मामला इसी व्यवस्था की जांच की आवश्यकता को सामने लाता है। यदि पहचान और दस्तावेजों के सत्यापन के लिए निर्धारित प्रक्रिया मौजूद थी, तो यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि उसके बावजूद गलती कैसे हुई और भविष्य में ऐसी चूक रोकने के लिए क्या बदलाव किए जाएंगे।
फिलहाल उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, वास्तविक जमानत पाने वाले सतीश चौहान को बाद में रिहा कर दिया गया, जबकि गलत तरीके से बाहर निकले चंद्रदीप चौहान ने अदालत में सरेंडर कर दिया। तीन जेलकर्मियों को निलंबित किया जा चुका है और मामले में जिम्मेदारी तय करने का प्रश्न जांच से जुड़ा हुआ है। जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि गलती केवल नामों की समानता के कारण हुई या रिहाई प्रक्रिया के दूसरे चरणों में भी लापरवाही बरती गई। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि जेलों में बंदियों की पहचान और रिहाई के समय रिकॉर्ड का सत्यापन कितना सटीक और जवाबदेह है।













