राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की प्रमुख विजया राहतकर ने बुधवार को प्रोटेक्शन ऑफिसर्स के राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मुश्किल में फंसी महिलाओं तक व्यवस्था को खुद पहुंचना चाहिए, न कि उन्हें मदद के लिए व्यवस्था के पीछे भागने को मजबूर होना पड़े।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष विजया राहतकर ने महिला सुरक्षा और घरेलू हिंसा के मामलों में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और प्रभावी बनाने पर जोर दिया है। बुधवार को सुरक्षा अधिकारियों (Protection Officers) के एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जरूरतमंद महिलाओं को सरकारी व्यवस्था तक पहुंचने के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए। इसके बजाय व्यवस्था को खुद उनके पास पहुंचना चाहिए।
राहतकर ने कहा कि संकट में फंसी महिला को सबसे पहले यह भरोसा मिलना चाहिए कि वह अकेली नहीं है और सरकारी सिस्टम उसके साथ खड़ा है। उन्होंने Protection Officers को घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में शुरुआती सहायता और कानूनी प्रक्रिया से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बताया।
Protection Officers की भूमिका क्यों अहम?
Protection Officers की नियुक्ति राज्य सरकारों की ओर से घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत की जाती है। घरेलू हिंसा का सामना कर रही महिलाओं के लिए ये अधिकारी शुरुआती स्तर पर सहायता उपलब्ध कराने, मामले की जानकारी लेने और संबंधित सेवाओं तक पहुंच बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विजया राहतकर ने कहा कि किसी महिला को सुरक्षा या न्याय पाने के लिए अलग-अलग सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की स्थिति नहीं होनी चाहिए। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें जरूरतमंद महिला तक सहायता समय पर और प्रभावी तरीके से पहुंच सके। उन्होंने Protection Officers से कहा कि वे अपनी जिम्मेदारी को केवल प्रशासनिक कार्य के रूप में न देखें, बल्कि इसे महिलाओं के जीवन और सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी समझें।
तकनीक के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी

NCW अध्यक्ष ने महिला सुरक्षा की व्यवस्था में तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार डिजिटल प्लेटफॉर्म, हेल्पलाइन, डेटा और ऑनलाइन सिस्टम सरकारी एजेंसियों की प्रतिक्रिया को तेज और बेहतर बना सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल तकनीक से महिला सुरक्षा की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। तकनीकी व्यवस्था को मानवीय संवेदनशीलता, सहानुभूति और डेटा आधारित निर्णय लेने की क्षमता के साथ जोड़ना जरूरी है।
उनका कहना था कि तकनीक प्रशासन को तेज बना सकती है, लेकिन संवेदनशीलता अपने आप पैदा नहीं कर सकती। इसलिए अधिकारियों को तकनीकी दक्षता के साथ पीड़ित महिला की स्थिति को समझने और उसकी जरूरत के अनुसार प्रतिक्रिया देने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।
महिला की सुरक्षा के साथ गरिमा भी जरूरी
विजया राहतकर ने कहा कि महिला सुरक्षा का मतलब केवल किसी महिला को तत्काल खतरे से बचाना नहीं है। इसके साथ उसकी गरिमा, अधिकार और भविष्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जहां किसी महिला की आवाज अनसुनी न हो, कोई महिला खुद को अकेला महसूस न करे और उसकी गरिमा से किसी भी परिस्थिति में समझौता न किया जाए।
उन्होंने Protection Officer के पद को केवल सरकारी जिम्मेदारी मानने के बजाय इसे भरोसे की भूमिका बताया। उनके मुताबिक इस काम के लिए कानून की जानकारी जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण भी है।
कालिदास की रचना 'अभिज्ञान शाकुंतलम्' का दिया उदाहरण
महिला सुरक्षा की भूमिका समझाने के लिए NCW प्रमुख ने संस्कृत कवि कालिदास की प्रसिद्ध रचना अभिज्ञान शाकुंतलम् का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि जब शकुंतला अपने अधिकार और न्याय की बात रखने के लिए राजा दुष्यंत के दरबार की ओर जाती हैं, तो वह अकेली नहीं होतीं। माता गौतमी उनके साथ खड़ी रहती हैं और उन्हें राजदरबार तक पहुंचने में सहयोग करती हैं।
राहतकर ने इसी प्रसंग को Protection Officer की भूमिका से जोड़ते हुए कहा कि संकट में फंसी महिला को अकेला छोड़ देना व्यवस्था की जिम्मेदारी पूरी करना नहीं है। उसे न्याय और सहायता के रास्ते तक पहुंचाने के लिए किसी भरोसेमंद व्यक्ति या अधिकारी का साथ जरूरी है।











