नेशनल रिकॉर्ड बनाने वाले पोल वॉल्टर देव मीणा और कुलदीप कुमार की तस्वीरें चर्चा में हैं, जिनमें वे ई-रिक्शा में अपने पोल ले जाते दिखे। खिलाड़ियों की इस स्थिति ने खेल सुविधाओं और एथलीट्स को मिलने वाली व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रांची: भारत में खेल प्रतिभाओं और खेल सुविधाओं के बीच मौजूद अंतर एक बार फिर चर्चा में है। रांची में आयोजित राष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में नया रिकॉर्ड बनाने वाले भारतीय पोल वॉल्ट एथलीट Dev Kumar Meena और Kuldeep Kumar प्रतियोगिता खत्म होने के कुछ घंटों बाद ई-रिक्शा में अपने लंबे फाइबरग्लास पोल ढोते हुए दिखाई दिए।
इन तस्वीरों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और खेल जगत में भारतीय खिलाड़ियों की स्थिति और खेल प्रबंधन को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
नेशनल रिकॉर्ड के साथ कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए क्वालिफाई
रांची में आयोजित एथलेटिक्स फेडरेशन कप में देव मीणा और कुलदीप कुमार ने पुरुष पोल वॉल्ट स्पर्धा में 5.45 मीटर की समान ऊंचाई पार कर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।
यह उपलब्धि भारतीय एथलेटिक्स के लिए ऐतिहासिक मानी जा रही है।
दोनों खिलाड़ियों ने इस प्रदर्शन के साथ 2026 में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होने वाले 2026 Commonwealth Games के लिए भी क्वालिफाई किया।
हालांकि, इस बड़ी सफलता के कुछ घंटों बाद सामने आई तस्वीरों ने खेल व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी।
ई-रिक्शा में पोल ढोते दिखे खिलाड़ी
प्रतियोगिता के बाद दोनों खिलाड़ियों को अपने पोल स्वयं ई-रिक्शा में लादकर होटल ले जाना पड़ा।
तस्वीरों में साफ दिखाई दे रहा है कि कई फीट लंबे पोल ई-रिक्शा में मुश्किल से फिट हो पा रहे हैं और खिलाड़ी खुद उन्हें संभालते नजर आ रहे हैं।
यह दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और लोगों ने सवाल उठाया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों को बुनियादी सुविधाएं तक क्यों नहीं मिल रहीं।
बेहद संवेदनशील होते हैं पोल वॉल्ट के उपकरण
पोल वॉल्ट में इस्तेमाल होने वाले फाइबरग्लास पोल सामान्य खेल उपकरणों से बिल्कुल अलग होते हैं।
ये पोल काफी लंबे, महंगे और बेहद नाजुक होते हैं। इनमें हल्का सा दबाव, मोड़ या खरोंच भी खिलाड़ी के प्रदर्शन और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
इन्हें सुरक्षित तरीके से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए विशेष परिवहन और सावधानी की आवश्यकता होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में इन उपकरणों के लिए अलग परिवहन व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है।
पहले भी ट्रेन से उतारे जा चुके हैं खिलाड़ी
यह पहली बार नहीं है जब देव मीणा और उनके साथी खिलाड़ियों को ऐसी परेशानी का सामना करना पड़ा हो।
इसी वर्ष ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप से लौटते समय महाराष्ट्र के पनवेल रेलवे स्टेशन पर एक टिकट चेकर (TC) ने दोनों खिलाड़ियों को ट्रेन से उतार दिया था।
कारण यह बताया गया कि इतने लंबे पोल ट्रेन की बोगी में नहीं ले जाए जा सकते। इस घटना के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था।

खेल मंत्री ने लिया था संज्ञान
पनवेल रेलवे स्टेशन वाली घटना के बाद मध्य प्रदेश सरकार के खेल मंत्री Vishvas Sarang ने इस मामले का संज्ञान लिया था।
उन्होंने रेलवे अधिकारियों से बात कर खिलाड़ियों को खेल उपकरणों के साथ यात्रा की अनुमति सुनिश्चित करने की बात कही थी।
हालांकि, ताजा घटना से यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि क्या जमीनी स्तर पर खिलाड़ियों की जरूरतों के अनुरूप व्यवस्थाएं वास्तव में बदली हैं।
कैसे तय हुआ गोल्ड और सिल्वर?
दिलचस्प बात यह रही कि देव मीणा और कुलदीप कुमार दोनों ने समान ऊंचाई 5.45 मीटर पार की।
लेकिन प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार, कम प्रयासों में ऊंचाई पार करने वाले खिलाड़ी को विजेता माना जाता है।
इसी आधार पर देव मीणा को गोल्ड मेडल और कुलदीप कुमार को सिल्वर मेडल दिया गया।
कौन हैं देव कुमार मीणा?
मध्य प्रदेश के देवास जिले की खातेगांव तहसील के छोटे से गांव सिल्फोड़खेड़ा के रहने वाले 19 वर्षीय देव कुमार मीणा भारतीय एथलेटिक्स के उभरते सितारे माने जा रहे हैं।
- उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में लगातार शानदार प्रदर्शन किया है।
- फरवरी 2025 में उत्तराखंड नेशनल गेम्स में 5.32 मीटर की छलांग
- अप्रैल 2025 में नेशनल फेडरेशन सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 5.35 मीटर का रिकॉर्ड
- अब रांची में 5.45 मीटर के साथ नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड
देव का यह सफर ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने की प्रेरणादायक कहानी माना जा रहा है।
भारतीय खेल व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
इस घटना ने भारत में खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं और खेल प्रशासन की प्राथमिकताओं पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि खिलाड़ियों से केवल पदक जीतने की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें विश्वस्तरीय सुविधाएं और सम्मानजनक समर्थन भी मिलना चाहिए।
विशेषकर ऐसे खेलों में, जहां उपकरण बेहद तकनीकी और महंगे होते हैं, वहां प्रशासनिक सहयोग अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों के बाद हजारों लोगों ने खिलाड़ियों के समर्थन में प्रतिक्रिया दी।
कई यूजर्स ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को इस तरह संघर्ष करते देखना निराशाजनक है।
कुछ लोगों ने इसे भारत की खेल नीतियों और जमीनी व्यवस्थाओं के बीच मौजूद अंतर का उदाहरण बताया।
खेल विशेषज्ञों की राय
खेल विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में एथलेटिक्स जैसे खेलों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक सपोर्ट अभी भी चुनौती बना हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- खिलाड़ियों के उपकरणों के लिए अलग ट्रांसपोर्ट व्यवस्था होनी चाहिए
- रेलवे और एयरलाइंस में स्पोर्ट्स इक्विपमेंट नीति स्पष्ट हो
- राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को विशेष यात्रा सहायता मिले
- प्रतियोगिताओं के दौरान खेल संघों की जिम्मेदारी तय हो










