सुप्रीम कोर्ट नफरती भाषण से जुड़े कई लंबित मामलों पर बुधवार को फैसला सुनाएगा। सुनवाई में धार्मिक संस्थाओं के नियमन और धार्मिक स्वतंत्रता पर भी अहम टिप्पणियां की गईं, जिसमें व्यवस्था और नियमों की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
New Delhi: सुप्रीम कोर्ट नफरती भाषण फैसला और धार्मिक संस्थाओं पर टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट बुधवार को 2021 से लंबित नफरती भाषण से जुड़ी याचिकाओं पर अपना निर्णय सुनाएगा। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि धार्मिक संस्थाओं के संचालन में व्यवस्था और नियम जरूरी हैं और अराजकता की स्थिति स्वीकार्य नहीं है। साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने पर भी जोर दिया गया, खासकर सबरीमाला जैसे मामलों की पृष्ठभूमि में।
नफरती भाषण मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला आज, धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन पर भी बड़ी टिप्पणी
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट बुधवार को नफरती भाषणों (हेट स्पीच) से जुड़े कई लंबित मामलों पर अपना फैसला सुनाने जा रहा है। कोर्ट की 29 अप्रैल की केस सूची के अनुसार, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ इस मामले में निर्णय सुनाएगी। ये याचिकाएं वर्ष 2021 से लंबित थीं, जिनमें पुलिस को स्वतः संज्ञान लेकर प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
जनवरी 2021 में अदालत ने संकेत दिया था कि वह इन याचिकाओं का निपटारा करेगी। इसके बाद केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत को बताया था कि निर्देशों का पर्याप्त पालन किया गया है, जिसके बाद मामले की सुनवाई पूरी कर ली गई थी। अब इस फैसले पर देशभर की निगाहें टिकी हुई हैं क्योंकि यह हेट स्पीच से जुड़े कानूनी ढांचे को स्पष्ट कर सकता है।
धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन और सार्वजनिक व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि किसी भी धार्मिक संस्था के प्रबंधन का अर्थ यह नहीं है कि वहां किसी प्रकार का ढांचा या नियम न हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि संचालन में अराजकता की अनुमति नहीं दी जा सकती और हर संस्था के लिए एक व्यवस्थित प्रणाली आवश्यक है।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह भी कहा कि धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सार्वजनिक स्थानों, जैसे सड़कों को बाधित नहीं किया जा सकता। हालांकि अदालत ने यह भी दोहराया कि धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर्गत पूजा-पद्धति का अधिकार सुरक्षित है, लेकिन यदि उससे पंथनिरपेक्ष गतिविधियों पर प्रभाव पड़ता है तो सरकार हस्तक्षेप कर सकती है।
सबरीमाला और धार्मिक परंपराओं से जुड़े मामलों की सुनवाई जारी
संविधान पीठ ने केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मुद्दों पर भी सुनवाई की। अदालत ने कहा कि धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप किए बिना भी व्यवस्था और नियम बनाए रखना आवश्यक है।
हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़े एक मामले में भी सूफी परंपरा और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन पर चर्चा हुई। अदालत ने यह रेखांकित किया कि धार्मिक स्थानों की आस्था और परंपरा महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके संचालन के लिए एक स्पष्ट ढांचा होना जरूरी है, ताकि व्यवस्था बनी रहे और किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो।










