पत्नी को दूसरे के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखना ‘अवैध संबंध’ नहीं: पटना हाईकोर्ट ने खारिज की तलाक की अर्जी

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को दूसरे पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखना व्यभिचार का सबूत नहीं। तलाक के लिए ठोस प्रमाण जरूरी, जानिए 4 कानूनी आधार।
पत्नी को दूसरे के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखना ‘अवैध संबंध’ नहीं: पटना हाईकोर्ट ने खारिज की तलाक की अर्जी
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पटना हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद और तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि पत्नी को किसी दूसरे पुरुष के साथ कथित तौर पर आपत्तिजनक स्थिति में देख लेना अपने आप में व्यभिचार या अवैध संबंध का कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को आपत्तिजनक स्थिति में देखना और उसके साथ यौन संबंध स्थापित होना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाकर तलाक चाहता है तो केवल शक, अनुमान या अकेले मौखिक बयान के आधार पर यह आरोप साबित नहीं माना जा सकता। इसके लिए विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों की जरूरत होगी।

यह फैसला 3 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने मधुबनी परिवार न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) के तहत व्यभिचार और धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता को आधार बनाकर विवाह खत्म करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद माना कि पत्नी के खिलाफ लगाए गए व्यभिचार के आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुए।

मामला एक ऐसे दंपती का था, जिनकी शादी 2 जुलाई 2006 को हुई थी। शादी के करीब चार साल बाद वर्ष 2010 में उनके एक बेटे का जन्म हुआ। बाद में पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद शुरू हुआ। पति का आरोप था कि वर्ष 2013 में उसने अपनी पत्नी को अपनी बड़ी बहन के पति यानी अपने जीजा के साथ कथित आपत्तिजनक स्थिति में देखा था। पति ने इसे पत्नी के अवैध संबंध का आधार माना और इसी आरोप के आधार पर तलाक की मांग की।

पति के मुताबिक, कथित घटना के बाद पत्नी वैवाहिक घर से चली गई और इसके बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ता गया। पति ने अदालत में यह तर्क दिया कि पत्नी का दूसरे पुरुष के साथ संबंध वैवाहिक विश्वास का उल्लंघन है और उसे इस आधार पर विवाह समाप्त करने की अनुमति मिलनी चाहिए। लेकिन परिवार न्यायालय ने गवाहों और उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद तलाक देने से इनकार कर दिया। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की।

पटना हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही कि किसी महिला या पुरुष को किसी दूसरे व्यक्ति के साथ ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में देखना और दोनों के बीच यौन संबंध स्थापित होना एक ही बात नहीं है। अदालत ने माना कि व्यभिचार का आरोप लगाने वाले पक्ष को ऐसे साक्ष्य पेश करने होंगे, जिनसे यह स्थापित हो सके कि वास्तव में विवाह के बाद जीवनसाथी ने किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वेच्छा से यौन संबंध बनाए थे। केवल परिस्थितियों को देखकर लगाया गया अनुमान पर्याप्त नहीं होगा।

अदालत ने इस मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान दिया। पति ने कथित घटना के तुरंत बाद न तो पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और न ही कोई सनहा दर्ज कराया। अदालत के सामने यह भी आया कि उसने तत्काल अपने वैवाहिक रिश्तेदारों को भी घटना की शिकायत नहीं की थी। इसके अलावा पति के माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों की ओर से भी ऐसा कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया, जो उसके आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि कर सके।

यही वजह रही कि हाईकोर्ट ने केवल पति के आरोप को व्यभिचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यभिचार जैसी घटना का प्रत्यक्ष प्रमाण हर मामले में मिलना आसान नहीं होता। इसलिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर भी इसे साबित किया जा सकता है, लेकिन परिस्थितियों की पूरी और विश्वसनीय कड़ी होनी चाहिए। यदि परिस्थितियां केवल संदेह पैदा करती हैं और उससे आगे जाकर यह साबित नहीं करतीं कि वास्तव में यौन संबंध स्थापित हुआ था, तो तलाक का आधार स्वतः तैयार नहीं हो जाता।

अब सवाल यह है कि कानून की नजर में ‘अवैध संबंध’ या व्यभिचार को तलाक का आधार बनाने के लिए आखिर किन बातों की जरूरत होती है। इस फैसले से चार अहम कानूनी बातें समझी जा सकती हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण आधार यह है कि आरोप केवल शक या संदेह पर आधारित नहीं होना चाहिए। जिस पक्ष की ओर से व्यभिचार का आरोप लगाया जा रहा है, उसे आरोप के समर्थन में विश्वसनीय सामग्री पेश करनी होती है। केवल यह कहना कि पति या पत्नी किसी दूसरे व्यक्ति के करीब थे, उनके बीच संबंध थे या उन्हें संदिग्ध परिस्थिति में देखा गया, अपने आप में पर्याप्त नहीं है।

दूसरा आधार यह है कि विवाह के दौरान जीवनसाथी और किसी अन्य व्यक्ति के बीच स्वैच्छिक यौन संबंध का तथ्य स्थापित होना चाहिए। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) में व्यभिचार को तलाक का आधार माना गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर तरह की दोस्ती, बातचीत, मुलाकात या किसी व्यक्ति के साथ अकेले पाए जाने को व्यभिचार मान लिया जाए। अदालत तथ्य और साक्ष्य देखकर यह तय करती है कि आरोप वास्तव में वैवाहिक संबंध के बाहर यौन संबंध स्थापित होने तक पहुंचता है या नहीं।

तीसरा आधार परिस्थितिजन्य साक्ष्य की विश्वसनीय कड़ी है। कई मामलों में कथित अवैध संबंध का प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में अदालत परिस्थितियों को एक साथ देखकर निष्कर्ष निकाल सकती है। लेकिन हर परिस्थिति का आपस में जुड़ना और आरोप को विश्वसनीय तरीके से साबित करना जरूरी है। पटना हाईकोर्ट ने जिस पुराने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया, उसमें भी यही सिद्धांत सामने आया था कि व्यभिचार परिस्थितिजन्य साक्ष्य से साबित हो सकता है, लेकिन केवल संभावना या हवा में लगाया गया आरोप पर्याप्त नहीं है।

चौथा आधार आरोप की पुष्टि करने वाली स्वतंत्र या सहायक सामग्री है। यदि किसी पति या पत्नी का दावा है कि उसने अपने जीवनसाथी को किसी अन्य व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक परिस्थिति में देखा, तो अदालत यह भी देख सकती है कि घटना के बाद क्या किया गया, क्या तत्काल शिकायत की गई, क्या कोई गवाह मौजूद था, क्या कोई अन्य परिस्थिति आरोप की पुष्टि करती है और क्या उपलब्ध साक्ष्य एक-दूसरे से मेल खाते हैं। इस मामले में अदालत ने विशेष रूप से यह देखा कि कथित घटना के बाद पुलिस या परिवार के सामने तत्काल शिकायत नहीं की गई थी और आरोप की पुष्टि करने वाला ठोस समर्थन भी सामने नहीं आया।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि पत्नी या पति का किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध होना तलाक का आधार नहीं बन सकता। हिंदू विवाह अधिनियम के तहत व्यभिचार आज भी तलाक का वैध आधार है। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, लेकिन इसे वैवाहिक कानून के तहत तलाक का आधार बनाए रखा गया है। इसलिए आपराधिक अपराध और वैवाहिक विवाद में व्यभिचार की कानूनी स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है।

पटना हाईकोर्ट के इस फैसले का सबसे अहम संदेश यही है कि तलाक जैसे गंभीर मामले में किसी व्यक्ति के चरित्र पर लगाए गए आरोप को सिर्फ संदेह के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। विवाह को समाप्त करने का फैसला गंभीर कानूनी परिणाम पैदा करता है। इसलिए अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों की विश्वसनीयता और आरोप की वास्तविकता पर विचार करना होता है।

इस मामले में पति ने व्यभिचार के साथ-साथ क्रूरता का आधार भी लिया था। लेकिन हाईकोर्ट के सामने क्रूरता से जुड़े आरोप भी मुख्य रूप से उसी वैवाहिक विवाद और कथित अवैध संबंध के आरोपों से जुड़े थे। जब मूल आरोप ही पर्याप्त साक्ष्य से साबित नहीं हुआ तो उससे जुड़े क्रूरता के दावे को भी तलाक देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना गया। अदालत ने परिवार न्यायालय के निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

मामले में पत्नी की ओर से भी पति के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार पत्नी ने पति पर उसे जहर देकर नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट ने इन आरोपों को भी केवल आरोप के आधार पर स्वीकार नहीं किया। इससे यह कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि वैवाहिक विवाद में पति या पत्नी, दोनों में से कोई भी पक्ष गंभीर आरोप लगा सकता है, लेकिन अदालत में आरोप को तथ्य साबित करने के लिए साक्ष्य जरूरी होते हैं।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पारिवारिक विवादों में अक्सर पति-पत्नी एक-दूसरे के चरित्र पर आरोप लगाते हैं। किसी तीसरे व्यक्ति से बातचीत, फोन पर संपर्क, साथ दिखाई देना या किसी सामाजिक परिस्थिति में साथ होना अपने आप में व्यभिचार साबित नहीं करता। अदालत प्रत्येक मामले के तथ्य, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्य को अलग-अलग देखती है। इसलिए किसी भी रिश्ते को केवल अनुमान के आधार पर ‘अवैध संबंध’ कहना कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं है।

इसी तरह ‘आपत्तिजनक स्थिति’ जैसे शब्द भी अपने आप में कोई कानूनी निष्कर्ष नहीं हैं। अदालत को यह देखना होता है कि वास्तव में हुआ क्या था। यदि कोई पक्ष दावा करता है कि उसने अपने जीवनसाथी को किसी दूसरे व्यक्ति के साथ ऐसी स्थिति में देखा, तो उस दावे को आगे बढ़ाकर यह साबित करना होगा कि दोनों के बीच वैवाहिक संबंध के बाहर यौन संबंध स्थापित हुए थे। केवल संदिग्ध परिस्थिति इस कानूनी कसौटी को पूरा नहीं करती।

पटना हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जाता। यदि परिस्थितियों की एक मजबूत और विश्वसनीय श्रृंखला उपलब्ध हो और उससे किसी अन्य तार्किक निष्कर्ष की संभावना बेहद कम रह जाए, तो अदालत परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर भी व्यभिचार के निष्कर्ष तक पहुंच सकती है। लेकिन इस मामले में ऐसी कड़ी प्रस्तुत नहीं की जा सकी।

इस मामले में मधुबनी परिवार न्यायालय ने 4 अप्रैल 2024 को पति की तलाक याचिका खारिज की थी। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के फैसले की समीक्षा की और पाया कि निचली अदालत ने उपलब्ध गवाहों और साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए सही निष्कर्ष निकाला था। इसलिए पति की अपील भी खारिज कर दी गई।

कानूनी रूप से इस फैसले को एक सरल उदाहरण से समझें तो सिर्फ यह कहना कि ‘मैंने अपनी पत्नी को दूसरे पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखा’ पर्याप्त नहीं है। इसके साथ यह भी साबित करना होगा कि दोनों के बीच वैवाहिक संबंध के बाहर स्वैच्छिक यौन संबंध स्थापित हुआ था। यदि इस दावे की पुष्टि करने वाली परिस्थितियां, गवाह या अन्य विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, तो अदालत केवल अनुमान के आधार पर व्यभिचार नहीं मानेगी।

यानी पटना हाईकोर्ट ने तलाक के मामले में यह रेखा साफ कर दी है कि शक और सबूत एक समान नहीं हैं। किसी रिश्ते को लेकर संदेह हो सकता है, कोई परिस्थिति असहज या संदिग्ध लग सकती है, लेकिन कानूनी फैसला उस संदेह से आगे जाकर उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर ही होगा। यही कारण है कि पति की अपील खारिज करते हुए परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा गया।

इस फैसले का व्यापक असर वैवाहिक मुकदमों में दिखाई दे सकता है, क्योंकि अदालतों में तलाक के मामलों में व्यभिचार के आरोप अक्सर लगाए जाते हैं। ऐसे मामलों में आरोप लगाने वाले पक्ष को यह समझना होगा कि केवल चरित्र पर सवाल उठाना या संदिग्ध परिस्थिति बताना पर्याप्त नहीं है। अदालत के सामने प्रमाण की गुणवत्ता और विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण होगी।

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