पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मी तेज, ममता बनर्जी के खिलाफ नए सियासी समीकरण के संकेत

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले CPM और जनता उन्नयन पार्टी की मुलाकात ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी। संभावित गठबंधन ममता बनर्जी के लिए चुनौती बन सकता है।

पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले CPM नेता मोहम्मद सलीम और जनता उन्नयन पार्टी के हुमायूं कबीर के बीच मुलाकात हुई। संभावित गठबंधन ममता बनर्जी की TMC के लिए चुनौती बन सकता है और विपक्षी समीकरण बदल सकते हैं।

West Bengal: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सामने विपक्षी खेमे में नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। इसी कड़ी में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) की पश्चिम बंगाल यूनिट के सचिव मोहम्मद सलीम और जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर के बीच हुई मुलाकात ने सियासी चर्चाओं को और तेज कर दिया है। इस बैठक के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ चुनावी ‘खेला’ की तैयारी हो रही है।

यह मुलाकात ऐसे समय पर हुई है जब सभी राजनीतिक दल चुनाव से पहले अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। सीट बंटवारे, संभावित गठबंधन और वोट बैंक की गणित पर लगातार मंथन चल रहा है।

न्यू टाउन के होटल में हुई अहम बैठक

सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम और जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर के बीच यह मुलाकात कोलकाता के न्यू टाउन इलाके के एक होटल में हुई। दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत चली। इस बैठक को लेकर राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या दोनों पार्टियां चुनाव से पहले किसी गठबंधन की ओर बढ़ रही हैं।

मोहम्मद सलीम ने इस मुलाकात के बाद कहा कि चुनाव में सीट बंटवारे के प्रस्ताव पर CPM के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट में चर्चा की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी फैसले से पहले फ्रंट के भीतर विचार-विमर्श जरूरी है।

लेफ्ट फ्रंट के भीतर चर्चा का संकेत

मोहम्मद सलीम ने कहा कि हुमायूं कबीर से हुई बातचीत को लेफ्ट फ्रंट के सामने रखा जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि लेफ्ट फ्रंट में चर्चा के बाद फ्रंट से बाहर की वामपंथी पार्टियों से बात होगी और फिर इंडियन सेक्युलर फ्रंट यानी ISF से संवाद किया जाएगा।

गौरतलब है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में CPM के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट ने ISF के साथ गठबंधन किया था। हालांकि उस चुनाव में लेफ्ट फ्रंट को कोई सीट नहीं मिली थी। ISF के नेता नौशाद सिद्दीकी उस समय बीजेपी के अलावा इकलौते विपक्षी विधायक बने थे।

हुमायूं कबीर की सियासी पृष्ठभूमि

हुमायूं कबीर पहले तृणमूल कांग्रेस के विधायक रह चुके हैं। हाल के दिनों में उन्होंने मुर्शिदाबाद जिले में एक नई बाबरी मस्जिद की नींव रखी थी, जिसके बाद राज्य की राजनीति में हलचल देखने को मिली थी। इस कदम के बाद से ही वे लगातार चर्चा में बने हुए हैं।

जनता उन्नयन पार्टी के जरिए कबीर राज्य की राजनीति में एक अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी पार्टी खासतौर पर मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर जोर देती रही है।

‘इरादे समझने के लिए थी मुलाकात’

मोहम्मद सलीम ने साफ किया कि यह मुलाकात किसी औपचारिक गठबंधन की घोषणा के लिए नहीं थी। उन्होंने कहा कि यह बैठक हुमायूं कबीर के इरादों और राजनीतिक मकसद को समझने के लिए की गई थी।

सलीम ने कहा कि कई पार्टियां अभी तक चुनाव के लिए सीट बंटवारे पर अंतिम फैसला नहीं ले पाई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह यह जानना चाहते थे कि कबीर आगे क्या करना चाहते हैं और उनकी राजनीतिक दिशा क्या है।

शिष्टाचार मुलाकात या सियासी संकेत

वहीं, हुमायूं कबीर ने भी इस मुलाकात को शिष्टाचार बैठक बताया। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि चुनाव को लेकर गठबंधन पर बातचीत हुई है। कबीर ने कहा कि उन्होंने मोहम्मद सलीम से अपील की है कि गठबंधन बनाने की प्रक्रिया 15 फरवरी तक पूरी कर ली जाए।

यह बयान इस ओर इशारा करता है कि जनता उन्नयन पार्टी चुनाव से पहले किसी बड़े राजनीतिक समझौते के पक्ष में है। कबीर का मानना है कि समय रहते गठबंधन तय हो जाना चाहिए ताकि चुनावी रणनीति को मजबूती से लागू किया जा सके।

AIMIM से भी बातचीत की संभावना

हुमायूं कबीर ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) से भी गठबंधन को लेकर बातचीत कर सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी का लक्ष्य मौजूदा सरकार को हराना और राज्य के लोगों को एक पारदर्शी सरकार देना है।

कबीर के इस बयान से साफ है कि जनता उन्नयन पार्टी विपक्षी खेमे को मजबूत करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रही है।

ममता बनर्जी की TMC के लिए चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर CPM और जनता उन्नयन पार्टी के बीच गठबंधन होता है, तो इसका सीधा असर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पर पड़ सकता है। खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में TMC को नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।

हुमायूं कबीर की पार्टी मुख्य रूप से मुस्लिम वोट बैंक पर फोकस कर रही है। मुस्लिम समझे जाने वाले वोट लंबे समय से TMC का मजबूत आधार रहे हैं। ऐसे में अगर इन वोटों में बंटवारा होता है, तो TMC की स्थिति कमजोर हो सकती है।

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