क्या आपने कभी सोचा है कि रेत के लिए भी किसी की जान ली जा सकती है? दरअसल, अवैध रेत खनन का कारोबार इतना बड़ा हो चुका है कि इसे 'ब्राउन गोल्ड' कहा जाता है।
- मूवी रिव्यू: रिपोर्टिंग लाइव
- ऐक्टर: परिणीति चोपड़ा, देवेन भोजानी, अमोल पालेकर, शेखर सुमन, आदिल हुसैन, नासर, शाश्वत चटर्जी, पितोबाश त्रिपाठी, प्राची शाह, समीर कोचर, गीता अग्रवाल शर्मा
- श्रेणी: Hindi, Crime, Drama
- डायरेक्टर: ध्रुव त्रिपाठी
- अवधि: 1 Hrs 56 Min
एंटरटेनमेंट न्यूज़: परिणीति चोपड़ा, देवेन भोजानी, अमोल पालेकर, शेखर सुमन और आदिल हुसैन जैसे कलाकारों से सजी क्राइम ड्रामा फिल्म ‘रिपोर्टिंग लाइव’ 9 अक्टूबर 2026 को ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix पर रिलीज हो गई है। ध्रुव त्रिपाठी के निर्देशन में बनी यह फिल्म अवैध रेत खनन, भ्रष्टाचार और माफिया के खतरनाक गठजोड़ की कहानी पेश करती है।
फिल्म की पृष्ठभूमि में एक ऐसा कारोबार है, जिसे अक्सर विकास और निर्माण की जरूरतों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका अवैध रूप पर्यावरण और आम लोगों की जिंदगी के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। फिल्म एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दा उठाती है, हालांकि इसकी कहानी और पटकथा में कुछ कमियां भी नजर आती हैं।
क्या है ‘रिपोर्टिंग लाइव’ की कहानी?
‘रिपोर्टिंग लाइव’ की कहानी पत्रकार संध्या यादव (परिणीति चोपड़ा) के इर्द-गिर्द घूमती है। संध्या एक महत्वाकांक्षी और निडर पत्रकार है, जो सच्चाई सामने लाने के लिए जोखिम उठाने से पीछे नहीं हटती। उसके साथ कैमरामैन विनोद (देवेन भोजानी) भी काम करता है, जो उसकी पत्रकारिता की यात्रा में अहम भूमिका निभाता है।
कहानी उस समय नया मोड़ लेती है, जब एक गांव में पुल टूटने से कई स्कूली बच्चों की मौत हो जाती है। हादसे की रिपोर्टिंग करने पहुंची संध्या को पता चलता है कि इस दुर्घटना के पीछे अवैध रेत खनन का भी संबंध हो सकता है। जांच आगे बढ़ने पर उसे ऐसे तथ्यों का सामना करना पड़ता है, जो पूरे इलाके में फैले एक बड़े सिंडिकेट की ओर इशारा करते हैं।
अवैध खनन के कारण नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव, खेतों की बर्बादी और पुलों की सुरक्षा पर खतरे जैसे मुद्दे कहानी का हिस्सा बनते हैं। लेकिन इस कारोबार में प्रभावशाली लोगों की कथित भागीदारी के कारण कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं होता। संध्या के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सच सामने लाने और अपनी जान जोखिम में डालने के बीच का संघर्ष बन जाता है।

गंभीर मुद्दे पर आधारित है फिल्म
ध्रुव त्रिपाठी ने इस फिल्म के जरिए रेत माफिया और अवैध खनन के मुद्दे को केंद्र में रखा है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि प्राकृतिक संसाधनों का गैरकानूनी दोहन केवल पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि स्थानीय समुदायों की सुरक्षा और आजीविका को भी प्रभावित कर सकता है। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका विषय है। खोजी पत्रकारिता के माध्यम से कहानी उन खतरों को सामने लाती है, जिनका सामना भ्रष्टाचार और संगठित अवैध कारोबार की पड़ताल करने वाले पत्रकारों को करना पड़ सकता है।
हालांकि, कहानी में राजनीतिक संरक्षण और माफिया के प्रभाव जैसे पहलुओं की गहराई से पड़ताल की गुंजाइश थी। इस कारण फिल्म का सामाजिक संदेश प्रभावी होने के बावजूद कुछ जगह अधूरा महसूस होता है।
निर्देशन और पटकथा में कहां रह गई कमी?
ध्रुव त्रिपाठी ने अपने निर्देशन में कहानी को वास्तविकता के करीब रखने की कोशिश की है। फिल्म जरूरत से ज्यादा नाटकीय होने के बजाय अपने मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करती है। इसके बावजूद पटकथा को अधिक कसावदार बनाया जा सकता था। कहानी में आने वाले कुछ मोड़ पहले ही समझ में आ जाते हैं, जिससे रोमांच का प्रभाव कम हो जाता है। वहीं, भावनात्मक दृश्यों में भी वह गहराई नहीं बन पाती, जो दर्शकों को लंबे समय तक प्रभावित कर सके। गंभीर विषय के बावजूद कुछ घटनाओं का प्रभाव और मजबूत हो सकता था।
परिणीति चोपड़ा और देवेन भोजानी की एक्टिंग
अभिनय की बात करें तो परिणीति चोपड़ा एक खोजी पत्रकार के रूप में नजर आती हैं। उनका किरदार कहानी को आगे बढ़ाता है, लेकिन कुछ दृश्यों में उनसे अधिक तीव्र और प्रभावशाली अभिनय की उम्मीद रहती है। देवेन भोजानी फिल्म में खास तौर पर प्रभावित करते हैं। विनोद के किरदार में उनकी सहजता और अभिनय कहानी को मजबूती देते हैं। फिल्म में उनकी मौजूदगी कई दृश्यों को प्रभावशाली बनाती है।
अमोल पालेकर, शेखर सुमन, शाश्वत चटर्जी और आदिल हुसैन जैसे अनुभवी कलाकार भी फिल्म का हिस्सा हैं। हालांकि, उनकी प्रतिभा के अनुरूप किरदारों को पर्याप्त विस्तार नहीं मिल पाता। तकनीकी पक्ष कुल मिलाकर ठीक है और फिल्म के यथार्थवादी माहौल को बनाए रखने में मदद करता है।
देखें या नहीं ‘रिपोर्टिंग लाइव’?
‘रिपोर्टिंग लाइव’ की सबसे बड़ी ताकत उसका सामाजिक सरोकार है। फिल्म अवैध रेत खनन जैसे गंभीर विषय को खोजी पत्रकारिता की कहानी के जरिए दर्शकों तक पहुंचाती है। हालांकि, कमजोर पड़ती पटकथा, अनुमानित ट्विस्ट और कुछ कलाकारों की सीमित भूमिका इसके प्रभाव को कम करती है। अगर आपको सामाजिक मुद्दों पर आधारित क्राइम ड्रामा और पत्रकारिता से जुड़ी कहानियां पसंद हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है। लेकिन अगर आप लगातार रोमांच, अप्रत्याशित मोड़ और गहरे भावनात्मक दृश्यों की उम्मीद करते हैं, तो फिल्म आपको कुछ हद तक निराश कर सकती है।










