H-1B वीजा पर जेडी वेंस की टिप्पणी से विवाद, भारत ने जताई आपत्ति; आठ टेक कंपनियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया निलंबित

जेडी वेंस ने H-1B कर्मचारियों को ‘बंधुआ मजदूर’ कहा तो भारत ने कड़ी आपत्ति जताई। अमेरिका ने आठ कंपनियों की PERM प्रक्रिया रोकी, जिससे ग्रीन कार्ड पर असर

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की H-1B कर्मचारियों पर टिप्पणी के बाद भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है। इसी बीच अमेरिका ने आठ बड़ी टेक कंपनियों की PERM प्रक्रिया निलंबित की, जिससे पात्र विदेशी कर्मचारियों के ग्रीन कार्ड आवेदन प्रभावित हो सकते हैं।

वॉशिंगटन; अमेरिका में विदेशी पेशेवरों को रोजगार देने वाली वीजा व्यवस्था को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने H-1B वीजा पर काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों को ‘फॉरेन इंडेंचर्ड सर्वेंट्स’ यानी बंधुआ मजदूरों जैसा बताया। भारत के विदेश मंत्रालय ने इस शब्दावली पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे अनुचित और बेहद आपत्तिजनक करार दिया। भारत ने कहा कि भारतीय पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था, तकनीकी नवाचार, अनुसंधान और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिकी प्रशासन ने आठ बड़ी प्रौद्योगिकी और आईटी सेवा कंपनियों की रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया से जुड़ी PERM सुविधा निलंबित कर दी है। अमेरिकी अधिकारियों ने इन कंपनियों पर विदेशी कर्मचारियों की भर्ती व्यवस्था के संभावित दुरुपयोग और अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार पर असर पड़ने के आरोप लगाए हैं। हालांकि, कंपनियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अभी अंतिम रूप से सिद्ध नहीं माना जा सकता। 

जेडी वेंस ने H-1B कर्मचारियों पर क्या कहा?

8 अक्टूबर को व्हाइट हाउस में वीजा व्यवस्था से जुड़े कथित दुरुपयोग पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी ने पिछले वर्ष लगभग 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, जबकि इसी अवधि में उसे करीब 6,300 H-1B वीजा और लगभग 3,000 ग्रीन कार्ड का लाभ मिला।

वेंस ने इन आंकड़ों के आधार पर दावा किया कि कंपनी ने अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता दी। उन्होंने H-1B वीजा पर काम करने वाले लोगों को ‘इंडेंचर्ड सर्वेंट्स’ कहा और कंपनियों से अमेरिकी नागरिकों को नौकरी देने को प्राथमिकता देने की मांग की। उनका तर्क था कि रोजगार खोने पर H-1B वीजा धारकों की अमेरिका में रहने की स्थिति प्रभावित हो सकती है, जिससे वे अपने नियोक्ता पर अधिक निर्भर हो जाते हैं। 

हालांकि, वेंस के दावे में बताए गए छंटनी और वीजा आंकड़े अपने आप में यह साबित नहीं करते कि प्रत्येक विदेशी कर्मचारी ने किसी अमेरिकी कर्मचारी की जगह ली। इसके लिए संबंधित पदों, नियुक्तियों, वेतन और कर्मचारियों की स्थिति की अलग-अलग जांच जरूरी है।

भारत ने बयान को बताया बेहद आपत्तिजनक

भारत के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को वेंस की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस तरह की शब्दावली अनुचित है और भारतीय पेशेवरों के योगदान की अनदेखी करती है। मंत्रालय ने विशेष रूप से उस ऐतिहासिक और औपनिवेशिक संदर्भ का उल्लेख किया, जो ‘इंडेंचर्ड सर्वेंट्स’ शब्दावली से जुड़ा है।

भारत ने कहा कि अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित और कुशल हैं। वे केवल अपनी आजीविका के लिए काम नहीं करते, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नवाचार प्रणाली में भी योगदान देते हैं।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रतिभा की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही से दोनों देशों को लाभ होता है। भारतीय पेशेवर अमेरिकी कंपनियों को तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराते हैं, जिससे अनुसंधान, उत्पादकता, प्रतिस्पर्धा और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिल सकता है। मंत्रालय ने कहा कि ऐसे कदम भारत और अमेरिका की साझा महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने में मददगार नहीं हैं। 

आठ कंपनियों की PERM प्रक्रिया पर रोक

अमेरिकी श्रम विभाग ने आठ कंपनियों की Permanent Labor Certification यानी PERM प्रक्रिया को निलंबित करने की घोषणा की है। इस सूची में माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट, इन्फोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो, HCL और कैपजेमिनी शामिल हैं।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इन कंपनियों से जुड़ी जांच के बीच विभाग फिलहाल उनके नए PERM आवेदन स्वीकार नहीं करेगा और लंबित आवेदनों की प्रक्रिया भी रोक दी गई है। प्रशासन का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य रोजगार प्रमाणन प्रणाली में संभावित अनियमितताओं की जांच करना और अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है। 

इस फैसले से खासकर उन विदेशी कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिनके नियोक्ता उनके लिए रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड का आवेदन कर रहे हैं। भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई कर्मचारी लंबे समय तक H-1B वीजा पर काम करने के बाद स्थायी निवास पाने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं।

H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड में क्या अंतर है?

H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। इसका उपयोग तकनीक, इंजीनियरिंग, विज्ञान और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में किया जाता है। यह अस्थायी कार्य वीजा है, जिसकी सामान्य प्रारंभिक अवधि तीन वर्ष तक होती है और कुछ शर्तों के तहत इसे बढ़ाया जा सकता है।

इसके विपरीत, ग्रीन कार्ड अमेरिका में स्थायी निवास का दर्जा देता है। रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के कई मामलों में PERM प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण शुरुआती चरण है। इस प्रक्रिया के तहत नियोक्ता को यह साबित करना होता है कि संबंधित पद के लिए उपलब्ध और योग्य अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा की गई है और विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन या कामकाजी परिस्थितियों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।

PERM प्रक्रिया निलंबित होने का अर्थ यह नहीं है कि प्रभावित कंपनियों के सभी मौजूदा H-1B वीजा स्वतः रद्द हो गए हैं। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि PERM पर रोक अपने आप मौजूदा H-1B वीजा धारकों और उनके आश्रितों की वैध स्थिति को प्रभावित नहीं करती। हालांकि, पात्र कर्मचारियों के ग्रीन कार्ड आवेदन में देरी या अन्य कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं। 

H-1B वीजा धारकों में भारतीयों की बड़ी हिस्सेदारी

H-1B कार्यक्रम भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका में रोजगार का एक प्रमुख माध्यम रहा है। रॉयटर्स की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, H-1B वीजा की मंजूरियों में भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी लगभग 71 प्रतिशत थी। इससे स्पष्ट होता है कि इस व्यवस्था में बदलाव का भारतीय तकनीकी कर्मचारियों पर विशेष प्रभाव पड़ सकता है। 

हालांकि, वीजा पाने वाले सभी भारतीय एक ही स्थिति में नहीं होते। कुछ नए कर्मचारी होते हैं, जबकि अन्य पहले से अमेरिका में काम कर रहे होते हैं और अपने रोजगार या वीजा की स्थिति में बदलाव अथवा विस्तार के लिए आवेदन करते हैं। इसलिए वीजा आवेदन की कुल संख्या को नई नियुक्तियों की संख्या मानना सही नहीं होगा।

माइक्रोसॉफ्ट ने अपने पक्ष में क्या कहा?

वेंस के आरोपों के बाद माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी वीजा प्रक्रिया का बचाव किया। कंपनी के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष में उसके लगभग 6,000 H-1B आवेदनों में से करीब 80 प्रतिशत मौजूदा कर्मचारियों के वीजा की अवधि बढ़ाने या उनकी स्थिति में बदलाव से संबंधित थे। कंपनी ने कहा कि ये आवेदन नए कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए नहीं किए गए थे।

माइक्रोसॉफ्ट ने यह भी कहा कि नए कर्मचारियों से जुड़े शेष आवेदन उन लोगों के लिए थे, जो पहले से अमेरिका में कानूनी रूप से मौजूद थे। कंपनी के मुताबिक, इस श्रेणी के कर्मचारी उसके अमेरिकी कार्यबल का लगभग एक प्रतिशत थे। माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि वह वीजा नियमों का पालन करती है और समान काम करने वाले कर्मचारियों को तुलनीय वेतन देती है।

कंपनी का पक्ष इस बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमेरिकी प्रशासन ने संभावित अनियमितताओं की जांच का हवाला दिया है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में प्रत्येक कंपनी के खिलाफ आरोपों के विस्तृत निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

भारतीय आईटी क्षेत्र और द्विपक्षीय संबंधों पर असर

PERM प्रक्रिया पर रोक से भारतीय आईटी कंपनियों के अमेरिका स्थित कर्मचारियों की स्थायी निवास योजनाओं में अनिश्चितता बढ़ सकती है। लंबे समय से ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे कर्मचारियों के लिए आवेदन प्रक्रिया में देरी परिवार, रोजगार और भविष्य की योजना को प्रभावित कर सकती है।

कंपनियों के लिए भी विदेशी प्रतिभा की भर्ती और कर्मचारियों को लंबे समय तक बनाए रखना एक अहम व्यावसायिक मुद्दा है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि घरेलू रोजगार के अवसरों और श्रम बाजार के नियमों की रक्षा करना उसकी प्राथमिकता है।

भारत ने इस विवाद पर नजर बनाए रखने की बात कही है। आने वाले समय में कंपनियों की जांच, अमेरिकी श्रम विभाग के फैसलों और दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत से यह स्पष्ट होगा कि PERM पर रोक कितने समय तक लागू रहती है और प्रभावित कर्मचारियों के आवेदन किस तरह आगे बढ़ते हैं।

फिलहाल, इस पूरे मामले में दो अलग मुद्दों को समझना जरूरी है—H-1B वीजा पर काम करने वाले कर्मचारियों की मौजूदा स्थिति और स्थायी निवास के लिए PERM प्रक्रिया। मौजूदा वीजा अपने आप रद्द नहीं हुए हैं, लेकिन ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में शामिल पात्र कर्मचारियों के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है।

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