शुभेंदु अधिकारी के पीए हत्याकांड में बड़ा मोड़: नाम की गलतफहमी में गिरफ्तार हुआ युवक, CBI जांच के बाद मिली राहत

मुख़्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के PA हत्याकांड में गलतफहमी के चलते राज सिंह को गिरफ्तार किया गया। CBI जांच में क्लीनचिट मिलने के बाद वह 10 दिन बाद घर लौट आया।

Suvendu Adhikari के PA हत्याकांड में नाम की गलतफहमी के चलते गिरफ्तार राज सिंह को CBI जांच में राहत मिली। 10 दिन हिरासत में रहने के बाद वह घर लौटा और फर्जी एनकाउंटर का डर होने की बात कही।

बलिया: पश्चिम बंगाल में वरिष्ठ भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक (PA) चंद्रनाथ रथ की हत्या के मामले में बड़ा मोड़ सामने आया है। उत्तर प्रदेश के बलिया निवासी राज सिंह ने दावा किया है कि उन्हें केवल नाम की समानता के कारण संदिग्ध शूटर समझकर गिरफ्तार कर लिया गया था।

करीब 10 दिन तक पुलिस, सीआईडी और बाद में सीबीआई की हिरासत में रहने के बाद अदालत ने उन्हें राहत दे दी। घर लौटने के बाद राज सिंह और उनके परिवार ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

अयोध्या से हिरासत, फिर कोलकाता ले जाया गया

राज सिंह के अनुसार, उन्हें 10 मई को अयोध्या से हिरासत में लिया गया था, जहां वे धार्मिक दर्शन के लिए गए थे। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि उन्हें किस मामले में पकड़ा गया है।

राज सिंह ने कहा कि पूछताछ के दौरान उन पर लगातार दबाव बनाया गया और हत्या कबूल करने के लिए डराया-धमकाया गया।

उन्होंने कहा, “मैं लगातार कहता रहा कि मेरा इस मामले से कोई संबंध नहीं है, लेकिन मेरी बात नहीं सुनी गई।”

डर था कहीं फर्जी एनकाउंटर न हो जाए

राज सिंह ने बताया कि कोलकाता ले जाने के बाद उन्हें सबसे ज्यादा डर अपनी सुरक्षा को लेकर था। भाषा की समस्या और लगातार पूछताछ के कारण वे मानसिक तनाव में आ गए थे।

उन्होंने कहा कि उन्हें आशंका थी कि कहीं उन्हें झूठे मामले में फंसा कर फर्जी एनकाउंटर का शिकार न बना दिया जाए।

राज सिंह के मुताबिक, बाद में सीबीआई अधिकारियों ने उनसे अलग तरीके से पूछताछ की और उन्हें भरोसा दिलाया कि अगर वे निर्दोष हैं तो उनके साथ अन्याय नहीं होगा।

सीसीटीवी फुटेज और खरीदारी के बिल बने अहम सबूत

पूछताछ के दौरान राज सिंह ने अपने पक्ष में कई सबूत पेश किए। उन्होंने बताया कि जिस दिन हत्या हुई, उस दिन वे अपने शहर में मौजूद थे और कई स्थानों पर गए थे।

उन्होंने सीबीआई को:

  • अस्पताल की सीसीटीवी फुटेज
  • कपड़ों की खरीदारी के बिल
  • शोरूम और मॉल के रिकॉर्ड
  • अन्य स्थानीय लोकेशन के सबूत

उपलब्ध कराए। जांच एजेंसियों ने इन साक्ष्यों की पुष्टि के बाद उन्हें राहत दी।

“मुख्य आरोपी कोई और था”

राज सिंह और उनके परिवार का दावा है कि पुलिस को किसी “राजकुमार सिंह” नामक व्यक्ति की तलाश थी, लेकिन नाम की समानता के कारण उन्हें हिरासत में ले लिया गया।

परिवार का कहना है कि इस गलती ने पूरे परिवार को मानसिक और सामाजिक रूप से प्रभावित किया।

मां का दर्द: “मैं गली-गली बेटे की बेगुनाही साबित करती रही”

राज सिंह की मां जामवंती सिंह ने कहा कि बेटे की गिरफ्तारी के बाद उनका परिवार पूरी तरह टूट गया था।

उन्होंने बताया कि वे लगातार अधिकारियों के सामने बेटे की बेगुनाही साबित करने की कोशिश करती रहीं। उन्होंने कहा, “मैं हर जगह जाकर कहती रही कि मेरा बेटा निर्दोष है, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया और महिला पुलिसकर्मी की मौजूदगी के बिना उन्हें ले जाया गया।

बहन ने भी उठाए पुलिस कार्रवाई पर सवाल

राज सिंह की बहन दीपशिखा सिंह, जो प्रयागराज हाईकोर्ट में मौजूद थीं, ने कहा कि परिवार लगातार सबूत पेश करता रहा, लेकिन शुरुआती स्तर पर उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और स्थानीय चर्चाओं में उनके भाई को अपराधी की तरह पेश किया गया, जिससे परिवार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

दीपशिखा ने पुलिस से अपील की कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने से पहले पूरी जांच की जाए।

राजनीतिक भविष्य पर क्या बोले राज सिंह?

राज सिंह ने बताया कि पहले वे स्थानीय राजनीति में सक्रिय थे और ब्लॉक प्रमुख चुनाव लड़ने की चर्चा भी थी। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के बाद उन्होंने फिलहाल चुनावी राजनीति से दूरी बनाने की बात कही है।

उन्होंने कहा कि अब वे केवल जनता की सेवा करना चाहते हैं और भविष्य में जनता जैसा चाहेगी, उसी दिशा में आगे बढ़ेंगे।

चंद्रनाथ रथ हत्याकांड क्या है?

6 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम आने के दो दिन बाद भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, हमलावरों ने उत्तर 24 परगना जिले के मध्यमग्राम इलाके में उनकी कार को रोककर कई राउंड फायरिंग की थी। रथ को सीने और पेट में गोलियां लगी थीं।

इस हत्याकांड ने राज्य की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था और मामले की जांच बाद में केंद्रीय एजेंसियों को सौंप दी गई।

पुलिस और जांच एजेंसियों की भूमिका पर बहस

राज सिंह की रिहाई के बाद अब पुलिस कार्रवाई और जांच प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं जांच एजेंसियों की जवाबदेही और प्रक्रियागत सावधानी की आवश्यकता को उजागर करती हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी संदिग्ध की गिरफ्तारी से पहले पहचान और तकनीकी साक्ष्यों की पूरी पुष्टि बेहद जरूरी है, ताकि निर्दोष लोगों को मानसिक और सामाजिक नुकसान न उठाना पड़े।

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