सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस फैसले को असंवैधानिक और गैर-कानूनी बताते हुए अपनी असहमति जाहिर की।
नई दिल्ली: देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision यानी SIR) को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वी. गोपाल गौड़ा ने इस प्रक्रिया को लेकर सर्वोच्च अदालत के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने फैसले को असंवैधानिक, गैर-कानूनी और अलोकतांत्रिक करार देते हुए इसे वापस लेने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं।
उनके बयानों के बाद चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाताओं के अधिकार और न्यायपालिका की जिम्मेदारी को लेकर बहस फिर चर्चा में आ गई है। हालांकि, पूर्व न्यायाधीश के ये आरोप उनके व्यक्तिगत विचार हैं और इन्हें किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
SIR पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को वापस लेने की मांग
पूर्व न्यायाधीश वी. गोपाल गौड़ा ने विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर अदालत के रुख पर असहमति जताई है। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग ने न्यायिक कार्यवाही के दौरान तथ्यों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया, जिसके कारण अदालत का फैसला प्रभावित हुआ। इसी आधार पर उन्होंने सर्वोच्च अदालत से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने और उसे वापस लेने की मांग की है।
गौड़ा के अनुसार, मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे किसी भी पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार प्रभावित न हो। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने या नागरिकों की पात्रता निर्धारित करने के मामले में पूरी पारदर्शिता बरती जानी चाहिए।
हालांकि, किसी अदालत के फैसले को असंवैधानिक बताना एक गंभीर कानूनी दावा है। इसकी अंतिम वैधानिक स्थिति का निर्धारण संबंधित न्यायिक प्रक्रिया और लागू संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही किया जा सकता है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखी टिप्पणी
SIR विवाद के बीच वी. गोपाल गौड़ा ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका की भी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की कार्रवाई लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिकों के मतदान अधिकारों को नुकसान पहुंचा सकती है। अपने बयान में उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के लिए बेहद कठोर शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन पर लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाया।
यह टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है, जब विपक्षी दलों के कुछ नेता भी SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष की ओर से मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा की मांग की जाती रही है। हालांकि, आयोग के खिलाफ लगाए गए आरोपों और प्रक्रिया की वैधानिकता के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी अधिकारी पर आरोप लगना अपने आप में उसके गलत आचरण का प्रमाण नहीं है। इन दावों का मूल्यांकन संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के बयान का किया समर्थन
पूर्व न्यायाधीश गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणियों का भी समर्थन किया। जस्टिस भुइयां ने मतदाता अधिकारों और SIR प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर चिंता जताई थी। गौड़ा का मानना है कि संवैधानिक अधिकारों और लोकतंत्र से जुड़े विषयों पर चर्चा करना अनुचित नहीं है, भले ही संबंधित मुद्दा न्यायिक विचाराधीन हो।
दूसरी ओर, पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणियों को लेकर सवाल उठाए थे। इस पर गौड़ा ने गवई के रुख की आलोचना करते हुए उनके पुराने न्यायिक आचरण का भी उल्लेख किया। उन्होंने सवाल किया कि चुनाव आयोग के फैसलों में अन्य निर्वाचन आयुक्तों की भूमिका और सहमति से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान क्यों नहीं दिया गया। इस बहस ने न्यायाधीशों की सार्वजनिक टिप्पणियों, न्यायिक मर्यादा और विचाराधीन मामलों पर अभिव्यक्ति की सीमाओं को लेकर भी चर्चा को जन्म दिया है।
क्या है SIR और इसका उद्देश्य?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची की व्यापक समीक्षा करने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और उसमें पात्र मतदाताओं के नाम शामिल होने के साथ-साथ अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना है। भारत में मतदाता सूची का रखरखाव चुनावी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और संबंधित नियम मतदाता पंजीकरण तथा सूची के पुनरीक्षण के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं। SIR के समर्थकों का तर्क है कि नियमित और व्यापक समीक्षा से मतदाता सूची की शुद्धता बेहतर हो सकती है। वहीं, आलोचकों की चिंता है कि यदि दस्तावेजों की जांच, पात्रता के निर्धारण या आपत्तियों के निपटारे में कमियां रह जाती हैं, तो पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं।












