सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि यदि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाता है, तो भी वह अन्य सरकारी सुविधाओं का हकदार बना रहेगा।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूची (Voter List) और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटा दिया जाता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह राशन जैसी अन्य वैधानिक सरकारी सुविधाओं से स्वतः वंचित हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी पश्चिम बंगाल के निवासी मोहिबुल्ला मंडल द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान की। याचिका में उन्होंने आशंका जताई थी कि मतदाता सूची से नाम हटने की स्थिति में उनका राशन कार्ड रद्द या निलंबित किया जा सकता है, जिससे उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत मिलने वाला सब्सिडी वाला राशन प्रभावित होगा।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया था कि पश्चिम बंगाल के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग द्वारा जून में जारी आदेश के आधार पर उनके राशन कार्ड को रद्द, निलंबित या समाप्त नहीं किया जाए। उन्होंने यह भी मांग की कि मतदाता सूची से नाम हटाने के खिलाफ दायर उनकी अपील पर अंतिम निर्णय आने तक उन्हें सरकारी राशन मिलता रहे।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता सूची और सरकारी कल्याणकारी योजनाएं अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं के अंतर्गत संचालित होती हैं। केवल मतदाता सूची से नाम हटने के आधार पर किसी नागरिक को अन्य वैधानिक लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
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मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट भी जाता है, तब भी वह कानून के तहत उपलब्ध अन्य सरकारी लाभों का पात्र हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में बदलाव का सीधा प्रभाव राशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर नहीं पड़ता।
यह टिप्पणी उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिनके नाम मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान हटाए जाने की आशंका है। हालांकि, यह एक मौखिक टिप्पणी थी और अदालत ने इस संबंध में कोई विस्तृत अंतिम कानूनी फैसला जारी नहीं किया।
हाई कोर्ट जाने की दी स्वतंत्रता
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने के बजाय याचिकाकर्ता को राहत के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता दी। अदालत ने कहा कि इस मामले में उपयुक्त राहत देने का अधिकार हाई कोर्ट के पास है। इसलिए याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को संबंधित उच्च न्यायालय में जाने की अनुमति प्रदान की गई।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित अपीलीय प्राधिकरण को भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर अपील पर संभव हो तो दो महीने के भीतर निर्णय लिया जाए। अदालत ने कहा कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर विवाद का समाधान नहीं होता है या याचिकाकर्ता संतुष्ट नहीं होते, तो वे आगे उचित कानूनी राहत के लिए हाई कोर्ट का रुख कर सकते हैं।










