Supreme Court of India ने बाईगेमी मामले में अहम फैसला देते हुए कहा कि सिर्फ दूसरी शादी की जानकारी होने से रिश्तेदारों पर केस नहीं चल सकता, जब तक उनकी सक्रिय भूमिका साबित न हो।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट बाईगेमी फैसला में Supreme Court of India ने स्पष्ट किया है कि पत्नी के रहते पति की दूसरी शादी की केवल जानकारी होने से उसके परिजनों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि रिश्तेदारों ने शादी कराने, उसे बढ़ावा देने या उसमें सक्रिय भूमिका निभाई, तब तक उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत केस नहीं बनता। यह फैसला पारिवारिक विवादों में झूठे या सामान्य आरोपों पर लगाम लगाने के रूप में देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बाईगेमी केस में रिश्तेदारों को राहत
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल पति की दूसरी शादी की जानकारी होने भर से उसके परिवार के सदस्यों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि रिश्तेदारों ने दूसरी शादी कराने में सक्रिय भूमिका निभाई है, तब तक उन पर बाईगेमी (द्विविवाह) के तहत केस नहीं चल सकता।

यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां वैवाहिक विवादों में पति के साथ पूरे परिवार को सामान्य आरोपों के आधार पर फंसाया जाता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए ठोस और स्पष्ट सबूत जरूरी हैं।
रिश्तेदारों पर आरोपों को लेकर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि पति पर जहां गंभीर आरोप जैसे मारपीट, दहेज उत्पीड़न और धोखाधड़ी लगाए गए थे, वहीं रिश्तेदारों के खिलाफ आरोप बहुत सामान्य और अस्पष्ट थे। किसी भी तरह का ठोस सबूत यह साबित नहीं करता कि उन्होंने दूसरी शादी को बढ़ावा दिया या उसमें भाग लिया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ जानकारी होना या परिवार का हिस्सा होना अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। बिना सक्रिय भूमिका या सहयोग के किसी को आरोपी बनाना कानून के दायरे में उचित नहीं माना जा सकता।
फैसले की अहम बातें और इसका प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश माना जा रहा है। इससे ऐसे मामलों में निर्दोष परिजनों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।
- केवल जानकारी होने पर रिश्तेदार आरोपी नहीं होंगे
- सक्रिय भूमिका या सहयोग का सबूत जरूरी
- सामान्य और अस्पष्ट आरोपों को अदालत ने खारिज किया
- आपराधिक जिम्मेदारी के लिए ठोस साक्ष्य अनिवार्य
- वैवाहिक विवादों में परिवार को बेवजह फंसाने पर रोक
यह फैसला न्याय व्यवस्था में स्पष्टता लाने और अनावश्यक कानूनी उत्पीड़न को रोकने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।








