स्कंद षष्ठी 2026 का व्रत 22 फरवरी को रखा गया है, जो संतान प्राप्ति और संतान के सुख-समृद्ध जीवन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस व्रत में माता गौरी और भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। श्रद्धापूर्वक व्रत करने से परिवार में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और मानसिक शांति मिलती है।
Skanda Sashti 2026 Vrat: आज, 22 फरवरी 2026 को पूरे भारत में स्कंद षष्ठी का व्रत मनाया जा रहा है, जो संतान सुख और संतान के खुशहाल जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन भक्त माता गौरी और भगवान कार्तिकेय की पूजा करते हैं। पूजा विधि में मंत्रजाप, सात्विक भोजन और संयम का पालन शामिल है। व्रत पूरे दिन रखा जाता है और अगले दिन पारण किया जाता है। इसका उद्देश्य परिवार में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखना और आध्यात्मिक संतोष प्राप्त करना है।
संतान प्राप्ति और स्कंद षष्ठी व्रत महत्व
फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि, 22 फरवरी 2026 को स्कंद षष्ठी का व्रत रखा गया है। यह व्रत विशेष रूप से संतान प्राप्ति और संतान के सुख-समृद्ध जीवन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। हिंदू धर्म में माता गौरी और भगवान कार्तिकेय की पूजा का यह दिन विशेष महत्व रखता है। भगवान कार्तिकेय को स्कंद, मुरुगन और सुब्रह्मणयम के नाम से भी जाना जाता है।
भक्तजन मानते हैं कि यदि संतान की कामना रखने वाले दंपत्ती या माता श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करें, तो उनकी इच्छाएं पूरी होती हैं और संतान का जीवन सुखमय और स्वास्थ्यपूर्ण रहता है। यह व्रत धार्मिक विश्वास और पारंपरिक रीति-रिवाजों का प्रतीक भी है, जो परिवार में सकारात्मक ऊर्जा और सौहार्द बनाए रखने में मदद करता है।
स्कंद षष्ठी पूजा तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, स्कंद षष्ठी 22 फरवरी से शुरू होकर 23 फरवरी सुबह 09:09 तक रहेगी। इस दिन पूजा करने के लिए कई शुभ मुहूर्त हैं, जिनका पालन करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। प्रमुख मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- पूजा शुभ मुहूर्त: सुबह 05:12 से 06:03
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:12 से 12:58
- विजय मुहूर्त: दोपहर 02:29 से 03:14
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:14 से 06:39
इन मुहूर्तों के दौरान पूजा करने से व्रत अधिक प्रभावकारी माना जाता है। भक्तगण इन समयों में मंत्रजाप और आराधना करके अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं।
स्कंद षष्ठी पूजा विधि
व्रत के दिन सुबह उठकर सबसे पहले स्नान करना चाहिए और साफ कपड़े पहनकर पूजा की तैयारी करनी चाहिए। सूर्य देव को जल अर्पित करें और फिर पूजाघर में चौकी स्थापित करके भगवान कार्तिकेय की मूर्ति या तस्वीर रखें। भगवान को गंगाजल से स्नान कराएं, चंदन का तिलक लगाएं और पीले रंग के फूल, फल, भोग, धूप आदि अर्पित करें।
इसके बाद भगवान कार्तिकेय के मंत्रों का जाप करें और पूजा के अंत में आरती करें। व्रत के दौरान विशेष रूप से सात्विक भोजन का सेवन किया जाना चाहिए, जैसे फल, दूध, मेवे और हल्का भोजन। अनाज या तामसिक पदार्थों से परहेज करें। इस दिन किसी की निंदा न करें और पूरे दिन संयमित रहना आवश्यक है। व्रत का पारण अगले दिन नियमपूर्वक किया जाता है।

स्कंद षष्ठी व्रत के नियम और सावधानियां
इस व्रत का पालन करते समय नियमों का ध्यान रखना जरूरी है। भक्तजन इस दौरान सात्विक भोजन करें और तामसिक और अस्वास्थ्यकर भोजन से परहेज करें। व्रत के दिन किसी भी तरह की बुराई, झगड़ा या निंदा से दूर रहना चाहिए। पूजा और जप-तप करते समय मन को केवल भगवान की भक्ति में एकाग्र करना चाहिए।
इसके अलावा, पूजा स्थल स्वच्छ और शांत होना चाहिए। माता-पिता अपने बच्चों को व्रत और पूजा की प्रक्रिया में शामिल कर सकते हैं, ताकि उन्हें भी धार्मिक संस्कारों का अनुभव हो। घर में आग या हल्की वस्तुएं इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतें।
संतान सुख और आध्यात्मिक महत्व
स्कंद षष्ठी का व्रत न केवल संतान प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि यह आध्यात्मिक दृष्टि से भी लाभकारी है। इस व्रत से भक्त अपने मन को शुद्ध करते हैं, मानसिक तनाव को दूर करते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। व्रत के दौरान संयम, साधना और जप-तप करने से आत्मशक्ति बढ़ती है और जीवन में संतुलन आता है।
साथ ही, यह व्रत पारिवारिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। माताएं और दंपत्ती इस दिन सामूहिक रूप से पूजा और व्रत रखकर परिवार में सौहार्द और भाईचारे को बढ़ाते हैं। बच्चे और युवा इस व्रत में शामिल होकर सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों को सीखते हैं, जिससे समाज में धार्मिक चेतना और परंपराओं की समझ बढ़ती है।








