सोमी अली ने क्यों शुरू किया एनजीओ? घरेलू हिंसा और मानव तस्करी के खिलाफ सालों से कर रहीं काम

अभिनेत्री से सामाजिक कार्यकर्ता बनीं सोमी अली ने घरेलू हिंसा, मानव तस्करी और शोषण के पीड़ितों की मदद के लिए NGO ‘No More Tears’ शुरू किया। उन्होंने बताया कि

अभिनेत्री से सामाजिक कार्यकर्ता बनीं सोमी अली ने घरेलू हिंसा, मानव तस्करी और शोषण के पीड़ितों की मदद के लिए कई साल काम किया है। वह एक एनजीओ भी चलाती हैं। 

एंटरटेनमेंट न्यूज़: अभिनेत्री से सामाजिक कार्यकर्ता बनीं सोमी अली (Somy Ali) लंबे समय से घरेलू हिंसा, मानव तस्करी और शोषण के खिलाफ काम कर रही हैं। फिल्मों में अभिनय के बाद उन्होंने सामाजिक कार्यों को अपनी प्राथमिकता बनाया और पीड़ितों की मदद के लिए एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) शुरू किया। अब उन्होंने घरेलू हिंसा को लेकर समाज की सोच, पीड़ितों की चुनौतियों और युवाओं की भूमिका पर खुलकर बात की है।

सोमी अली को 'तीसरा कौन', 'चुप', 'यार गद्दार', 'आंदोलन', 'माफिया' और 'आओ प्यार करें' जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है। हालांकि, बाद के वर्षों में उन्होंने मनोरंजन जगत से दूरी बना ली और सामाजिक कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया। उनका कहना है कि घरेलू हिंसा और शोषण जैसी समस्याओं पर केवल चर्चा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़ितों को वास्तविक सहायता और सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराना जरूरी है।

हर दिन मिलती हैं करीब 30 मदद की कॉल

अक्टूबर को कई जगह Domestic Violence Awareness Month यानी घरेलू हिंसा जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। सोमी अली का कहना है कि घरेलू हिंसा ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर केवल एक महीने ध्यान दिया जाए। उनके संगठन को कथित तौर पर हर दिन करीब 30 कॉल मिलती हैं, जिससे पता चलता है कि पीड़ितों को सालभर मदद की जरूरत होती है।

उनके मुताबिक, अक्टूबर का महत्व इसलिए है क्योंकि इस महीने दुनिया घरेलू हिंसा के खिलाफ अपनी आवाज को ज्यादा मजबूती से उठाती है। लेकिन उनके संगठन की हेल्पलाइन पर आने वाली समस्याएं किसी कैलेंडर या जागरूकता अभियान तक सीमित नहीं हैं। सोमी का मानना है कि हिंसा और शोषण झेल रहे लोगों के लिए सहायता की जरूरत हर दिन बनी रहती है। इसलिए जागरूकता के साथ-साथ हेल्पलाइन, सुरक्षित स्थान, कानूनी सहायता और भावनात्मक सहयोग जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं।

सिर्फ जागरूकता से नहीं बदलती पीड़ित की जिंदगी

सोमी अली ने घरेलू हिंसा के खिलाफ जागरूकता अभियानों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना, लेकिन कहा कि केवल प्रतीकात्मक समर्थन पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक, असली चुनौती उस समय शुरू होती है जब कोई पीड़ित व्यक्ति हिंसक या शोषणकारी माहौल से बाहर निकलने का फैसला करता है। ऐसे मामलों में पीड़ित को सुरक्षित आवास, आर्थिक सहायता, कानूनी सलाह और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सहयोग की जरूरत पड़ सकती है। कई मामलों में परिवार, आर्थिक निर्भरता, बच्चों की जिम्मेदारी, सामाजिक दबाव या सुरक्षा का डर व्यक्ति को हिंसक रिश्ते से बाहर निकलने से रोक सकता है।

इसी वजह से सोमी का जोर इस बात पर है कि जागरूकता अभियानों को व्यावहारिक सहायता से जोड़ना चाहिए। उनके अनुसार, किसी पीड़ित को यह भरोसा दिलाना महत्वपूर्ण है कि मदद मांगने के बाद वह अकेला नहीं रहेगा।

अपने अनुभवों से मिली एनजीओ शुरू करने की प्रेरणा

सोमी अली ने बताया कि एनजीओ शुरू करने के पीछे उनके अपने अनुभव और उन महिलाओं की कहानियां भी रही हैं, जिन्हें उन्होंने करीब से देखा। उनका कहना है कि बचपन में उन्होंने ऐसी परिस्थितियों को महसूस किया, जिसने उन्हें आगे चलकर इस दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने खास तौर पर उन महिलाओं की समस्याओं का जिक्र किया जो दूसरे देशों से आकर किसी नए देश में रहती हैं। ऐसी महिलाओं के लिए भाषा, इमिग्रेशन या वीजा संबंधी स्थिति और वापस भेजे जाने का डर कई बार उन्हें मदद मांगने से रोक सकता है।

उनके मुताबिक, ऐसे लोगों के लिए ऐसी जगह की जरूरत होती है जहां उनकी परिस्थितियों को समझा जाए और बिना किसी डर के सहायता उपलब्ध कराई जाए।

युवाओं को स्वस्थ रिश्तों की शिक्षा देने की अपील

सोमी अली ने युवाओं की भूमिका को भी बेहद महत्वपूर्ण बताया। उनका मानना है कि हिंसा को रोकने की शुरुआत स्वस्थ और सम्मानजनक रिश्तों की समझ से हो सकती है। युवाओं को यह समझना जरूरी है कि रिश्तों में नियंत्रण, डराना, अपमानित करना या हिंसा सामान्य व्यवहार नहीं है। उन्होंने समाज से अपील की कि जब कोई व्यक्ति पहली बार हिंसा या शोषण की बात करे तो उसकी बात को गंभीरता से लिया जाए। पीड़ितों को संदेह की नजर से देखने के बजाय उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सोमी के अनुसार, मदद का शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन किसी हिंसक अनुभव से उबरने की प्रक्रिया कहीं लंबी होती है। इसलिए पीड़ितों को तत्काल मदद के साथ लंबे समय तक भावनात्मक और सामाजिक सहयोग की भी जरूरत पड़ सकती है।

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