छत्तीसगढ़ की गीता नरोटे ने पिता की हत्या के बाद पढ़ाई छोड़ दी और बाद में माओवादी संगठन में शामिल हो गईं। सरेंडर के बाद उन्होंने 10वीं की परीक्षा पास की और अब नर्सिंग की पढ़ाई करना चाहती हैं।
Success Story: छत्तीसगढ़ के बस्तर की गीता नरोटे की जिंदगी में कई मुश्किल मोड़ आए। पिता की हत्या के बाद उन्हें 6वीं कक्षा में पढ़ाई छोड़नी पड़ी और बाद में माओवादी संगठन में शामिल होना पड़ा। अब सरेंडर के बाद उन्होंने शिक्षा का रास्ता चुना है। 10वीं की ओपन स्कूल परीक्षा पास करने के बाद गीता आगे नर्सिंग की पढ़ाई करना चाहती हैं।
पिता की हत्या के बाद छूटी पढ़ाई, परिवार की जिम्मेदारी आई
गीता नरोटे महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के दूरदराज आदिवासी गांव गुरेकासा की रहने वाली हैं। जब वह 6वीं कक्षा में पढ़ रही थीं, तब उनके पिता की हत्या हो गई। परिवार की बड़ी बेटी होने के कारण पिता की मौत के बाद चार छोटी बहनों की जिम्मेदारी भी उनके सामने आ गई।
कम उम्र में परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी आने के कारण उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। उनका गांव जंगल क्षेत्र में था, जहां माओवादी गतिविधियां होती थीं। गीता के मुताबिक, गांव में माओवादी बैठकें करते थे और स्थानीय लोगों को कई बार उन्हें खाना-पानी देना पड़ता था।
स्कूल छोड़ने के करीब एक साल बाद गीता को माओवादी समर्थक होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। वह करीब दो साल बाद जेल से बाहर आईं। रिहाई के बाद दोबारा गिरफ्तारी का डर उनके मन में बना रहा। गीता ने पीटीआई को बताया कि इसी डर के चलते वह 2004 में माओवादी समूह में शामिल हो गईं।
संगठन में 'डॉ. चंपा' के नाम से हुई पहचान
माओवादी संगठन में रहते हुए गीता ने मेडिकल टीम के साथ काम किया। वह दूरदराज के इलाकों में लोगों के इलाज और अन्य सहायता से जुड़े काम करती थीं। इसी दौरान उन्हें 'डॉ. चंपा' के नाम से जाना जाने लगा।
36 वर्षीय गीता ने पिछले साल अक्टूबर में छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के जगदलपुर में सरेंडर किया था। उनके साथ 210 अन्य माओवादियों ने भी आत्मसमर्पण किया था। इन लोगों का नेतृत्व सीनियर कैडर रुपेश कर रहे थे।
सरेंडर के बाद गीता को अपनी औपचारिक पढ़ाई दोबारा शुरू करने का मौका मिला। उन्होंने स्टेट ओपन स्कूल से 10वीं कक्षा की परीक्षा दी और इसे पास कर लिया।
किताबें खरीदीं और टाइम-टेबल बनाकर की पढ़ाई
गीता के मुताबिक, सरेंडर करने वाले कैडर्स ने बस्तर रेंज के IG और अन्य अधिकारियों से पढ़ाई में मदद की मांग की थी। अधिकारियों ने सहायता का भरोसा दिया। सरेंडर पॉलिसी के तहत उन्हें सरकार की ओर से 50-50 हजार रुपये मिले, जिनमें से कुछ रकम का इस्तेमाल किताबें खरीदने और पढ़ाई शुरू करने में किया गया।
पढ़ाई के दौरान गीता और उनके साथियों ने एक तय टाइम-टेबल का पालन किया। परीक्षा की तैयारी के लिए उन्होंने पिछले वर्षों के मॉडल प्रश्न-पत्रों का भी अभ्यास किया। तेलंगाना के पूर्व माओवादी कैडर सेतु उर्फ श्याम ने भी पढ़ाई में समूह की मदद की। वह संगठन में शिक्षक के तौर पर काम करते थे और गीता के साथ ही सरेंडर कर चुके थे।
संगठन से बाहर की जिंदगी के बारे में गीता ने कहा कि यह उनके लिए बिल्कुल अलग अनुभव है। यहां उन्हें बाहरी समाज को देखने और समझने का अवसर मिल रहा है।
अब नर्सिंग पढ़कर लोगों की सेवा करना चाहती हैं
गीता ने अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखने की इच्छा जताई है। संगठन में मेडिकल टीम के साथ काम करने का अनुभव होने के कारण वह नर्सिंग कोर्स करना चाहती हैं। उनका लक्ष्य मेडिकल क्षेत्र में काम करते हुए लोगों की सेवा करना है।
बस्तर के पुलिस अधीक्षक शलभ कुमार सिन्हा ने बताया कि सरेंडर करने वाले कैडर्स ने जब 10वीं की ओपन स्कूल परीक्षा देने और पढ़ाई जारी रखने की इच्छा जताई, तो उन्हें आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई गई।
उन्होंने बताया कि सरकार की सरेंडर और पुनर्वास नीति के तहत इन कैडर्स को जरूरी सुविधाएं दी जा रही हैं। उनके अनुसार, शिक्षा सरेंडर करने वाले कैडर्स को बाहरी समाज से जुड़ने और भविष्य में रोजगार या अन्य काम के अवसर तलाशने में मदद कर सकती है।











