डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क को लेकर व्यापारियों की चिंता बढ़ गई है। व्यापारी संगठनों ने इस शुल्क को खत्म करने और प्रस्तावित व्यवस्था में बदलाव करने की मांग उठाई है। उनकी प्रमुख मांगों में ₹2,000 से अधिक के कुछ व्यापारी लेन-देन पर MDR लागू करने की सीमा की समीक्षा करना और जीरो MDR की सीमा को बढ़ाकर ₹1 लाख करना शामिल है। व्यापारियों का तर्क है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही व्यवस्था में बदलाव करते समय छोटे कारोबारियों की लागत, मुनाफे और भुगतान संबंधी जरूरतों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
UPI के जरिए किराना दुकानों, मेडिकल स्टोर, कपड़ों की दुकानों, रेस्तरां और दूसरे छोटे-बड़े कारोबारों में रोजाना भुगतान किया जाता है। ग्राहकों के लिए QR कोड स्कैन करके भुगतान करना आसान है, जबकि व्यापारियों को नकदी संभालने और खुले पैसे लौटाने जैसी परेशानियों से राहत मिलती है। ऐसे में शुल्क व्यवस्था में बदलाव का मुद्दा व्यापार जगत के लिए अहम हो गया है। व्यापारियों को आशंका है कि यदि डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर अतिरिक्त लागत आती है, तो कम मुनाफे पर काम करने वाले कारोबारियों के खर्च पर इसका असर पड़ सकता है।
MDR का पूरा नाम मर्चेंट डिस्काउंट रेट है। यह वह शुल्क है जो निर्धारित व्यवस्था के तहत व्यापारी से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने और उसे संसाधित करने से जुड़ी सेवाओं के लिए लिया जाता है। यह ग्राहक के UPI इस्तेमाल करने के शुल्क से अलग है। प्रस्तावित ढांचे के तहत पात्र व्यक्ति-से-व्यापारी यानी पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) लेन-देन में ₹2,000 से अधिक की राशि पर 0.4 प्रतिशत MDR निर्धारित किया गया है। ₹75,000 या उससे अधिक के पात्र लेन-देन पर शुल्क की अधिकतम सीमा ₹300 रखी गई है। हालांकि, इस व्यवस्था में कुछ श्रेणियों और छोटे व्यापारियों के लिए छूट का प्रावधान भी है।
व्यापारियों की मांग है कि ₹2,000 की सीमा की समीक्षा की जाए, ताकि कारोबारियों पर अतिरिक्त खर्च का बोझ कम किया जा सके। उनका कहना है कि अलग-अलग कारोबारों में लाभ का मार्जिन एक जैसा नहीं होता। किसी बड़े व्यापारी के लिए भुगतान पर लगने वाला शुल्क संभालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन कम मार्जिन पर सामान बेचने वाली छोटी दुकान के लिए बार-बार होने वाले डिजिटल लेन-देन की लागत महत्वपूर्ण हो सकती है। इसी वजह से व्यापारिक संगठनों की ओर से शुल्क व्यवस्था पर दोबारा विचार करने की मांग की जा रही है।
जीरो MDR की सीमा को ₹1 लाख करने की मांग भी इसी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। छोटे व्यापारियों को राहत देने के लिए निर्धारित सीमा यह तय करने में भूमिका निभाती है कि किस तरह के कारोबारी को शुल्क से छूट मिलेगी। व्यापारियों की मांग है कि इस सीमा को बढ़ाया जाए, जिससे ज्यादा छोटे कारोबारियों को बिना MDR के डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की सुविधा मिल सके। इस प्रस्ताव का उद्देश्य छोटे व्यवसायों को डिजिटल भुगतान से जोड़े रखना और उन्हें अतिरिक्त लागत की चिंता से बचाना है।
व्यापारियों की चिंता केवल शुल्क की राशि तक सीमित नहीं है। डिजिटल भुगतान अब ग्राहकों की खरीदारी की आदतों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। कई लोग नकदी रखने के बजाय सीधे मोबाइल से भुगतान करना पसंद करते हैं। यदि किसी व्यापारी को भुगतान स्वीकार करने के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़े, तो उसके लिए अपनी लागत का हिसाब नए सिरे से बनाना पड़ सकता है। हालांकि, शुल्क लागू होने का मतलब अपने आप यह नहीं है कि ग्राहक से अतिरिक्त राशि ली जा सकती है। सरकार की घोषित व्यवस्था के अनुसार, MDR का बोझ ग्राहक पर डालने की अनुमति नहीं है।
इस विषय पर व्यापारिक संगठनों और डिजिटल भुगतान क्षेत्र के बीच चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि UPI का इस्तेमाल छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक व्यापक रूप से होता है। छोटे कारोबारी डिजिटल भुगतान के माध्यम से ग्राहकों को सुविधाजनक विकल्प दे पाते हैं। ऐसे में नीति बनाते समय डिजिटल भुगतान प्रणाली के संचालन की लागत और व्यापारियों के हितों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
MDR व्यवस्था के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि भुगतान प्रणाली को सुरक्षित रखने, तकनीकी ढांचे को बेहतर बनाने, साइबर सुरक्षा और सेवाओं के विस्तार के लिए संसाधनों की जरूरत होती है। दूसरी ओर, व्यापारी शुल्क से कारोबार की लागत बढ़ने की आशंका जता रहे हैं। इस मुद्दे पर अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि नियम किस तरह लागू होते हैं, किन श्रेणियों को छूट मिलती है और छोटे व्यापारियों के लिए निर्धारित सीमा किस प्रकार काम करती है।












