देहरादून। उत्तराखंड वन विभाग में वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी रंजन कुमार मिश्रा की लेवल-17 यानी एपेक्स स्केल पर पदोन्नति और पोस्टिंग को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। इस मामले में आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की ओर से उत्तराखंड के मुख्य सचिव को कानूनी नोटिस भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि रंजन कुमार मिश्रा ने वर्ष 2017 से अचल संपत्ति विवरण यानी IPR दाखिल नहीं किया, इसके बावजूद उन्हें उच्चतम वेतन स्तर पर पदोन्नति का लाभ दिया गया। नोटिस में इस पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराने, पदोन्नति की समीक्षा करने और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की मांग की गई है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के लिए संपत्ति का वार्षिक विवरण दाखिल करना सेवा संबंधी महत्वपूर्ण दायित्वों में शामिल है। केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के दस्तावेजों में भी अधिकारियों की वार्षिक अचल संपत्ति विवरणी समय पर जमा कराने की व्यवस्था का उल्लेख है। सरकारी निर्देशों के मुताबिक यह विवरण प्रत्येक कैलेंडर वर्ष के लिए अगले वर्ष 31 जनवरी तक दाखिल किया जाना चाहिए। नियमों के अनुपालन में कमी को लेकर विभागीय कार्रवाई का प्रावधान भी बताया गया है।
कानूनी नोटिस में दावा किया गया है कि रंजन कुमार मिश्रा के नाम से वर्ष 2017 के बाद के IPR रिकॉर्ड को लेकर सवाल खड़े होते हैं। इसमें विशेष रूप से वर्ष 2023, 2024, 2025 और 2026 के निर्धारित समय पर संपत्ति विवरण उपलब्ध नहीं होने का उल्लेख किया गया है। नोटिस में केंद्रीय सरकारी IPR स्टेटस मॉड्यूल में की गई कथित खोज का हवाला देते हुए कहा गया है कि लंबे समय से विवरण दाखिल नहीं किए जाने के बावजूद अधिकारी के करियर में आगे बढ़ने की प्रक्रिया जारी रही। हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि संबंधित विभागीय रिकॉर्ड और जांच के बाद ही हो सकेगी।
पूरे विवाद का केंद्र यही सवाल है कि यदि किसी अधिकारी के वार्षिक संपत्ति विवरण से संबंधित रिकॉर्ड में लगातार कमी थी, तो पदोन्नति से पहले इस स्थिति की जांच किस स्तर पर की गई। कानूनी नोटिस में इसी बिंदु को उठाते हुए चयन समिति और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल किए गए हैं। नोटिस के अनुसार दिसंबर 2025 में हुई चयन समिति की बैठक में कथित तौर पर IPR से संबंधित स्थिति को पर्याप्त रूप से विचार में नहीं लिया गया और इसके बावजूद अधिकारी को पदोन्नति के लिए उपयुक्त माना गया।
नोटिस में यह भी आरोप लगाया गया है कि अधिकारी को पदोन्नति के लिए इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट उपलब्ध कराया गया, जबकि उनके IPR दाखिल करने की स्थिति पर सवाल मौजूद थे। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोप और किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा दोष सिद्ध किया जाना दो अलग-अलग बातें हैं। फिलहाल उपलब्ध जानकारी कानूनी नोटिस में लगाए गए आरोपों और जांच की मांग से संबंधित है। अंतिम स्थिति संबंधित दस्तावेजों की जांच और सरकार अथवा सक्षम जांच एजेंसी के निष्कर्ष के बाद ही स्पष्ट होगी।
अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के लिए संपत्ति विवरण का महत्व केवल औपचारिक कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। वार्षिक संपत्ति विवरण में अधिकारी द्वारा रखी गई या अर्जित की गई अचल संपत्तियों की जानकारी दी जाती है। इसका उद्देश्य अधिकारियों की संपत्ति से संबंधित पारदर्शिता बनाए रखना और सेवा आचरण के नियमों का पालन सुनिश्चित करना है। केंद्र सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपने वार्षिक संपत्ति विवरण जमा करें।
DoPT के एक आधिकारिक वार्षिक प्रतिवेदन में यह भी दर्ज है कि अधिकारियों के लिए अगले वेतन स्तर पर नियुक्ति के लिए IPR दाखिल करना अनिवार्य किए जाने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य पदोन्नति और उच्च वेतन स्तर पर नियुक्ति की प्रक्रिया में संपत्ति विवरण की स्थिति को भी ध्यान में रखना है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी के IPR को लेकर रिकॉर्ड में लंबे समय से कमी का आरोप है, तो उस स्थिति में पदोन्नति प्रक्रिया के दौरान रिकॉर्ड की जांच होना स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।
उत्तराखंड वन विभाग में सामने आया यह विवाद इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि लेवल-17 को प्रशासनिक और वेतन संरचना में अत्यंत वरिष्ठ स्तर माना जाता है। ऐसे पदों पर नियुक्ति या पदोन्नति सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा होती है और इसमें सेवा रिकॉर्ड, वरिष्ठता, उपलब्ध पद, प्रदर्शन मूल्यांकन, सतर्कता संबंधी स्थिति तथा अन्य निर्धारित मानकों की जांच की जाती है। इसलिए कानूनी नोटिस में उठाए गए सवालों का संबंध केवल एक अधिकारी की पदोन्नति से नहीं, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता से भी जोड़ा जा रहा है।
नोटिस भेजने वाले अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने कथित तौर पर मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार नोटिस में केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI से स्वतंत्र जांच कराने का अनुरोध भी किया गया है। इसके साथ ही पदोन्नति की समीक्षा, संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही और उपलब्ध रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की मांग की गई है। संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड की जांच के लिए अन्य सक्षम एजेंसियों से पड़ताल कराने का आग्रह भी नोटिस में किए जाने की जानकारी है।
नोटिस में कथित रूप से यह सवाल भी उठाया गया है कि अगर लंबे समय तक IPR दाखिल नहीं किया गया था तो इस संबंध में विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं हुई। केंद्र सरकार के उपलब्ध नियमों और निर्देशों में वार्षिक संपत्ति विवरण दाखिल करने की बाध्यता स्पष्ट रूप से दर्ज है। आधिकारिक दस्तावेज में कहा गया है कि समय पर संपत्ति विवरण नहीं देना अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार बन सकता है।
वन विभाग जैसे संवेदनशील विभाग में वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति और पदोन्नति का सीधा संबंध प्रशासनिक व्यवस्था से होता है। आईएफएस अधिकारी वन संरक्षण, वन्यजीव प्रबंधन, पर्यावरणीय मामलों, वन भूमि से जुड़े प्रशासन और कई महत्वपूर्ण सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भूमिका निभाते हैं। इसलिए वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति के दौरान सेवा रिकॉर्ड और नियमों के पालन को लेकर उठने वाले सवालों को गंभीरता से देखा जाता है।
कानूनी नोटिस में 45 दिनों के भीतर कार्रवाई किए जाने की मांग किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसमें कथित रूप से संबंधित दस्तावेजों को सुरक्षित रखने, स्वतंत्र जांच कराने और पदोन्नति प्रक्रिया की समीक्षा करने की मांग की गई है। साथ ही यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की मांग की गई है।
इस मामले में सबसे अहम पहलू अब यह होगा कि उत्तराखंड सरकार और वन विभाग संबंधित IPR रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति को किस तरह स्पष्ट करते हैं। यदि रिकॉर्ड में वास्तव में 2017 के बाद लगातार IPR दाखिल नहीं किए जाने की बात सामने आती है, तो यह भी जांच का विषय होगा कि संबंधित अधिकारी की पदोन्नति के समय इन रिकॉर्ड को किस स्तर पर देखा गया था। दूसरी ओर, यदि विभाग के पास ऐसे दस्तावेज या रिकॉर्ड मौजूद हैं जो कानूनी नोटिस में लगाए गए आरोपों से अलग तस्वीर पेश करते हैं, तो सरकार की ओर से उसका स्पष्टीकरण भी मामले की दिशा तय करेगा।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता, संपत्ति विवरण और अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर लगातार जोर दिया जा रहा है। अखिल भारतीय सेवाओं के लिए संपत्ति विवरण जमा करने की व्यवस्था लंबे समय से लागू है और केंद्र के आधिकारिक निर्देशों में इसकी समयबद्धता पर जोर दिया गया है।
उपलब्ध दस्तावेजों से यह भी स्पष्ट होता है कि आईएफएस अधिकारियों के प्रशासनिक रिकॉर्ड में संपत्ति विवरण से जुड़ी जानकारी महत्वपूर्ण मानी जाती है। केंद्र सरकार के IFS संबंधी दस्तावेजों में भी संपत्ति विवरण से संबंधित प्रमाणन और रिकॉर्ड को सेवा मूल्यांकन प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है।
फिलहाल इस पूरे मामले में किसी सक्षम जांच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट सामने नहीं आई है। इसलिए रंजन कुमार मिश्रा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अंतिम निष्कर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा। कानूनी नोटिस में लगाए गए आरोपों की जांच के बाद ही यह तय हो सकेगा कि IPR दाखिल करने से संबंधित नियमों का वास्तव में उल्लंघन हुआ था या नहीं और यदि हुआ था तो पदोन्नति प्रक्रिया पर उसका क्या प्रभाव पड़ना चाहिए था।
मुख्य सचिव को भेजे गए कानूनी नोटिस ने फिलहाल उत्तराखंड वन विभाग की वरिष्ठ स्तर की प्रशासनिक प्रक्रिया को सवालों के घेरे में ला दिया है। अब नजर सरकार की प्रतिक्रिया, संबंधित रिकॉर्ड की जांच और इस बात पर रहेगी कि क्या पदोन्नति प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा होती है। यदि जांच शुरू होती है तो IPR रिकॉर्ड, चयन समिति की कार्यवाही, इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट और पदोन्नति से जुड़े सभी दस्तावेज उसके प्रमुख आधार बन सकते हैं।










