उत्तराखंड में 48 जातियों को SC में शामिल करने का मामला, हाई कोर्ट ने जारी किया नोटिस

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 48 जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने के फैसले पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। चार सप्ताह में जवाब देने के निर्देश दिए गए।

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को 48 जातियों को SC सूची में शामिल करने पर नोटिस जारी किया। याचिका में कहा गया कि संविधान के अनुसार सिर्फ राष्ट्रपति और संसद को यह अधिकार है। जवाब चार सप्ताह में मांगा गया।

Nainital: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को 48 जातियों को अनुसूचित जातियों (Scheduled Castes) की सूची में शामिल करने के मामले में नोटिस जारी किया है। अदालत ने सरकार से इस फैसले के पीछे के आधारों और तर्कों का जवाब मांगा है। यह कदम एक सामाजिक कार्यकर्ता की जनहित याचिका (Public Interest Litigation) के बाद उठाया गया है, जिसमें इस फैसले पर सवाल उठाए गए थे। अब अदालत सरकार के जवाब का इंतजार कर रही है।

हाई कोर्ट ने दिया चार सप्ताह का समय

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से 2013 और 2014 में 48 गैर अनुसूचित जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए गृह, कानून तथा समाज कल्याण और अधिकारिता के सचिवों, साथ ही उत्तराखंड के प्रमुख सचिव समाज कल्याण को नोटिस जारी किया है। अदालत ने उन्हें चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई छह जनवरी को होगी।

याचिका में उठाए गए मुख्य मुद्दे

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में 5 दिसंबर को हरिद्वार निवासी मीनू की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में कहा गया कि 2013 और 2014 में तत्कालीन प्रमुख सचिव समाज कल्याण द्वारा जारी शासनादेश को चुनौती दी जा रही है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 341 के अनुसार किसी भी जाति को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति और संसद को है।

याचिका में उच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था बहाल की जाए और राज्य सरकार द्वारा जातियों को शामिल करने के तरीके की वैधता की जांच की जाए।

विशेष न्यायालय की स्थापना नहीं हुई

याचिका में यह भी कहा गया है कि 26 जनवरी 2016 को जारी राज्य आदेश (Notification) के बावजूद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विशेष न्यायालयों की स्थापना नहीं की गई है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह संवैधानिक आदेश का उल्लंघन है और समाज कल्याण के मामले में उचित कार्रवाई नहीं हुई।

इस फैसले और याचिका के परिणाम का असर उत्तराखंड के सामाजिक और कानूनी ढांचे पर पड़ सकता है। यदि अदालत राज्य सरकार के आदेश को अस्वीकार करती है, तो 48 जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची से बाहर किया जा सकता है। वहीं, अगर सरकार का पक्ष मान्य होता है, तो यह जातियों के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को मान्यता देगा।

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