पश्चिम बंगाल में 15 वर्षों से सत्ता में रहने के बाद तृणमूल कांग्रेस इस बार विधानसभा चुनाव में न केवल अपनी सरकार बचाने, बल्कि लगातार चौथी बार सत्ता हासिल करने की चुनौती का सामना कर रही है।
कोलकाता: भारत के प्रमुख राजनीतिक राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जहां लगातार चौथी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस बार आक्रामक अभियान के साथ चुनावी मुकाबले को और कठिन बना रही है।
करीब डेढ़ दशक से राज्य की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाए हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक गठबंधन के सहारे चुनावी मैदान में है, जबकि भाजपा संगठनात्मक ताकत, राष्ट्रीय मुद्दों और भ्रष्टाचार के आरोपों को मुख्य हथियार बना रही है।
टीएमसी का भरोसा कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक गठबंधन पर
तृणमूल कांग्रेस का चुनावी अभियान मुख्य रूप से उन योजनाओं पर आधारित है, जिनका सीधा लाभ राज्य के ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को मिला है। लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, और स्वास्थ्य साथी जैसी योजनाओं ने महिलाओं, छात्रों और गरीब परिवारों के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत की है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि इन योजनाओं के कारण जमीनी स्तर पर समर्थन बना हुआ है। इसके अलावा टीएमसी ने बंगाली भाषा और सांस्कृतिक पहचान को भी चुनावी मुद्दा बनाया है, जिससे क्षेत्रीय भावनाओं को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
चुनाव से पहले पार्टी ने बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए लगभग एक-तिहाई विधायकों को बदल दिया है। टीएमसी ने 291 सीटों के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं और इसे पीढ़ी परिवर्तन और संगठन को मजबूत करने की रणनीति बताया जा रहा है।

भाजपा की आक्रामक रणनीति और संगठन पर जोर
भाजपा इस चुनाव में अपने मजबूत संगठन और बूथ स्तर तक फैले नेटवर्क पर भरोसा कर रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया था, जिसके बाद से उसने राज्य में अपना ढांचा और मजबूत किया है। भाजपा के चुनावी अभियान में विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। इसके साथ ही पार्टी लगातार राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार, कट मनी, और प्रशासनिक पक्षपात के आरोप लगा रही है।
केंद्रीय नेतृत्व की लगातार रैलियां और प्रचार अभियान यह दिखाते हैं कि भाजपा इस बार सत्ता हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का आक्रामक रुख चुनाव को त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले में बदल सकता है।
नए दलों की एंट्री से मुकाबला और जटिल
इस चुनाव में एक नया राजनीतिक मोड़ तब आया जब पूर्व टीएमसी नेता हुमायूं कबीर ने अपनी नई पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया। उन्होंने घोषणा की कि उनकी पार्टी 182 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी और कुछ सीटों पर अन्य दलों के साथ तालमेल भी हो सकता है। कबीर खुद मुर्शिदाबाद जिले की रेजिनगर और नाओदा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।
पहले वह भरतपुर सीट से विधायक रह चुके हैं। उनकी एंट्री से खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटों के बंटवारे की संभावना बढ़ गई है, जिससे टीएमसी और भाजपा दोनों के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। चुनावी माहौल में मतदाता सूची, पहचान सत्यापन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े मुद्दे भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। विपक्ष इन प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि सत्तारूढ़ दल का कहना है कि चुनाव पूरी तरह नियमों के अनुसार हो रहे हैं।









