अमेरिकी कंपनी Marathon Fusion ने परमाणु तकनीक की मदद से पारे को सोने में बदलने का दावा किया है। कंपनी के अनुसार, उसके प्रयोग में उत्पादन दर CERN के 2025 में सामने आए रिकॉर्ड से दस गुना अधिक रही। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है और बड़े पैमाने पर उत्पादन को लेकर सवाल बने हुए हैं।
सितंबर के प्रयोग में स्थिर सोना तैयार करने का दावा
पारे से सोना बनाने की कोशिश सदियों से होती रही है। सैन फ्रांसिस्को स्थित Marathon Fusion ने 21 अक्टूबर 2026 को बताया कि सितंबर में किए गए एक प्रयोग में पारे से स्थिर सोना तैयार हुआ। हालांकि, कंपनी ने प्रयोग में तैयार किए गए सोने की कुल मात्रा और इस प्रक्रिया की लागत की पूरी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की है।
Marathon Fusion ने सोशल मीडिया पर अपने प्रयोग की जानकारी देते हुए कहा कि उसकी तकनीक ने यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संस्थान CERN के 2025 में सामने आए रिकॉर्ड से दस गुना अधिक उत्पादन दर हासिल की है।
कंपनी ने कुछ वैज्ञानिक माप भी साझा किए हैं। इनमें पारे के एक खास रूप से सोना बनने के संकेत मिलने की बात कही गई है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं होता कि प्रयोग के दौरान सोने की कुल कितनी मात्रा तैयार हुई।
इस दावे की अभी स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि भी नहीं हुई है। इसलिए इसे बड़े पैमाने पर सोना बनाने में मिली सफलता मानना अभी जल्दबाजी होगी।
Nuclear Transmutation से पारे के सोने में बदलने की प्रक्रिया
Marathon Fusion जिस तकनीक पर काम कर रही है, उसे Nuclear Transmutation कहा जाता है। इसमें परमाणु के केंद्र की बनावट बदलकर एक तत्व को दूसरे तत्व में बदला जाता है।
इस प्रक्रिया में पहले Nuclear Fusion से तेज गति वाले न्यूट्रॉन पैदा किए जाते हैं। ये न्यूट्रॉन पारे के Mercury-198 नामक आइसोटोप से टकराते हैं। इस प्रतिक्रिया से रेडियोधर्मी Mercury-197 बन सकता है।
Mercury-197 समय के साथ बदलकर Gold-197 में परिवर्तित हो जाता है। Gold-197 सोने का स्थिर आइसोटोप है।
इस प्रक्रिया में पारा सीधे Nuclear Fusion में शामिल होकर सोना नहीं बनता। Fusion से निकलने वाले न्यूट्रॉन इस बदलाव में मदद करते हैं। सोना बनने की वास्तविक प्रक्रिया परमाणु रूपांतरण है।
एक गीगावाट थर्मल पावर से सालाना दो टन सोने का अनुमान
Marathon Fusion के वैज्ञानिकों ने जुलाई 2025 में arXiv पर एक रिसर्च पेपर अपलोड किया था। इसमें अनुमान लगाया गया कि भविष्य का एक उपयुक्त Fusion Power Plant हर एक गीगावाट थर्मल पावर पर सालाना करीब दो टन सोना तैयार कर सकता है।
हालांकि, यह आंकड़ा कंप्यूटर सिमुलेशन पर आधारित है। कंपनी ने अभी किसी चालू व्यावसायिक प्लांट में इतनी मात्रा में सोना तैयार करके नहीं दिखाया है।
कंपनी जिस छोटे रिएक्टर पर काम करने की बात कर रही है, उसकी प्रस्तावित Fusion क्षमता एक किलोवाट है। यह एक गीगावाट से दस लाख गुना कम है। ऐसे में प्रयोगशाला के नतीजों को सीधे औद्योगिक उत्पादन से नहीं जोड़ा जा सकता।
CERN के रिकॉर्ड से उत्पादन दर की तुलना
CERN ने 2025 में बताया था कि Large Hadron Collider में 2015 से 2018 के बीच लगभग 86 अरब सोने के परमाणु केंद्र बने थे।
यह संख्या बड़ी लग सकती है, लेकिन सोने की कुल मात्रा सिर्फ 29 पिकोग्राम थी। इतनी मात्रा का सोना सामान्य आंखों से दिखाई भी नहीं देगा।
CERN का प्रयोग सोने के व्यावसायिक उत्पादन के लिए नहीं था। वहां परमाणु कणों के व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा था।
Marathon Fusion ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि उसने अपनी उत्पादन दर की तुलना CERN के किस मापदंड से की है।
उत्पादन के बाद रेडियोधर्मिता और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां
इस तकनीक में एक प्रमुख समस्या सही प्रकार का पारा जुटाना है। प्राकृतिक पारे में Mercury-198 की हिस्सेदारी लगभग दस प्रतिशत होती है, जबकि कंपनी की गणना में 90 प्रतिशत तक शुद्ध Mercury-198 इस्तेमाल करने की बात कही गई है।
पारा जहरीला भी होता है। बड़ी मात्रा में इसके इस्तेमाल के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था जरूरी होगी।
एक अन्य समस्या रेडियोधर्मिता है। उत्पादन के दौरान दूसरे रेडियोधर्मी पदार्थ भी बन सकते हैं। कंपनी के सिमुलेशन के अनुसार, तैयार मिश्रण को कुछ सुरक्षा मानकों तक पहुंचने में कई साल लग सकते हैं। इसकी सफाई और सुरक्षित भंडारण पर अतिरिक्त खर्च आएगा।
सोने की लागत और व्यावसायिक उत्पादन पर सवाल
फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि इस तकनीक से सोना सस्ता हो जाएगा। Marathon Fusion का अनुमान है कि भविष्य में बिजली बनाने वाले Fusion Plants सोना बेचकर अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं।
हालांकि, अभी यह साबित होना बाकी है कि इस तरीके से बाजार में बिकने लायक मात्रा और गुणवत्ता में सोना तैयार किया जा सकता है।
इसके लिए कंपनी को प्रयोग की पूरी जानकारी, उत्पादन लागत और सोने की शुद्धता से जुड़े आंकड़े सामने रखने होंगे। स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि यह तकनीक केवल प्रयोगशाला तक सीमित रहेगी या भविष्य में सोना बनाने का नया तरीका बन सकेगी।






