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गर्मी से खतरा! कब तक सह सकेगा इंसानी शरीर? नई रिसर्च से जानें

गर्मी से खतरा! कब तक सह सकेगा इंसानी शरीर? नई रिसर्च से जानें
अंतिम अपडेट: 22 घंटा पहले

कनाडा के ओटावा विश्वविद्यालय की रिसर्च में 12 स्वयंसेवकों को 42°C तापमान और 57% ह्यूमिडिटी में रखा गया ताकि यह जांचा जा सके कि शरीर कितनी गर्मी सहन कर सकता है।

New Delhi: देशभर में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है और जल्द ही लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि मनुष्य की अत्यधिक गर्मी सहन करने की सीमा पहले की तुलना में कम हो सकती है। यह जानकारी दुनिया में मनुष्यों की गर्मी सहन करने की सीमाओं को समझने में मदद कर सकती है और शहरों को बदलते जलवायु के अनुरूप ढालने में सहायक हो सकती है।

ओटावा विश्वविद्यालय की नई रिसर्च

कनाडा के ओटावा विश्वविद्यालय में किए गए एक अध्ययन में 12 स्वयंसेवकों को अत्यधिक गर्मी और उच्च आर्द्रता के संपर्क में रखा गया। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि कौन सा तापमान और नमी का स्तर मानव शरीर की थर्मोरेगुलेशन प्रणाली को प्रभावित करता है और किस स्तर पर शरीर का तापमान अस्थिर हो जाता है। प्रतिभागियों को 42 डिग्री सेल्सियस के तापमान और 57% ह्यूमिडिटी में रखा गया, जो लगभग 62 डिग्री सेल्सियस ह्यूमिडेक्स (यानी वास्तविक अनुभव किए गए तापमान) के बराबर था।

क्या कहता है रिसर्च का डेटा?

ओटावा विश्वविद्यालय के प्रमुख शोधकर्ता रॉबर्ट डी मीड ने बताया कि इस प्रयोग के परिणाम स्पष्ट थे। प्रतिभागियों का शरीर का तापमान लगातार बढ़ता रहा, और कई प्रतिभागी नौ घंटे तक इस गर्मी में टिक नहीं पाए। यह डेटा ‘थर्मल स्टेप प्रोटोकॉल’ की पहली प्रत्यक्ष मान्यता प्रदान करता है, जिसका उपयोग लगभग 50 वर्षों से मानव शरीर की गर्मी सहनशीलता की ऊपरी सीमाओं का अनुमान लगाने के लिए किया जाता रहा है।

बढ़ते तापमान पर की गई रिसर्च

‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया था कि 40.2 डिग्री सेल्सियस के कोर तापमान तक पहुंचने में लगभग 10 घंटे लगेंगे, जो हीट स्ट्रोक का संकेतक हो सकता है। इस रिसर्च में व्यक्तियों को नियंत्रित तरीके से धीरे-धीरे बढ़ते तापमान और आर्द्रता के संपर्क में रखा गया ताकि शरीर की गर्मी सहन करने की क्षमता का विश्लेषण किया जा सके।

भविष्य के लिए क्या संकेत देती है यह रिसर्च?

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन मनुष्यों की गर्मी सहन करने की सीमा को समझने में मदद कर सकता है, जिससे स्वास्थ्य नीतियों और सार्वजनिक सुरक्षा उपायों को बेहतर बनाया जा सकता है। यह शोध अत्यधिक गर्मी से होने वाले खतरों के प्रति सरकारों और प्रशासन को तैयार करने में मदद करेगा।

गर्मी और ह्यूमिडिटी का बढ़ता प्रभाव

अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक गर्मी और आर्द्रता का अनुभव करना आम होता जा रहा है। ओटावा विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य विज्ञान संकाय में फिजियोलॉजी के प्रोफेसर और सह-प्रमुख शोधकर्ता ग्लेन केनी ने कहा कि जलवायु मॉडल और शारीरिक डेटा को एकीकृत करके हम गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं की बेहतर भविष्यवाणी और तैयारी कर सकते हैं।

दक्षिण एशिया पर गहरा असर

लंदन के किंग्स कॉलेज के नेतृत्व में किए गए एक अन्य अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि दुनिया की लगभग 6% भूमि पर अत्यधिक गर्मी की स्थिति युवा वयस्कों के लिए असहनीय हो सकती है, जबकि वृद्ध लोगों को इससे और अधिक जोखिम होगा। ‘नेचर रिव्यूज अर्थ एंड एनवायरनमेंट’ में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, दक्षिण एशिया सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक होने की संभावना है।

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