उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में अयोध्या में एक बयान के दौरान संभल और बांग्लादेश का जिक्र करते हुए बाबर और डीएनए की बात की, जिससे सियासी पारा बढ़ गया है। मुख्यमंत्री ने अपने बयान में बाबर का नाम लेकर एक बार फिर धर्म और इतिहास को चुनावी मुद्दा बना दिया हैं।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हालिया बयान, जिसमें उन्होंने संभल हिंसा और बांग्लादेश का जिक्र करते हुए बाबर और डीएनए की बात की, ने राज्य की सियासत में एक नया मोड़ ला दिया है। उनका यह बयान खासतौर पर आगामी विधानसभा चुनावों की सियासी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। योगी ने अपने बयान के जरिए धर्म और सनातन मुद्दे को और अधिक प्रमुखता दी, जो इस बार के चुनावी एजेंडे में बड़ा स्थान ले सकता हैं।
सीएम योगी का यह कदम 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए संभावित दिशा को निर्धारित करता है। उनका लक्ष्य राज्य को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बना कर तीसरी बार सत्ता में वापसी करना है। यह साफ संकेत है कि आगामी चुनाव भी सनातन धर्म और धार्मिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमेंगे, जिससे राजनीति का माहौल और अधिक गरमाने की संभावना हैं।
क्या हैं सीएम योगी का 'मिशन-27'?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अयोध्या में दिया गया बयान सियासी हलकों में गर्मा गया है। गुरुवार को रामकथा पार्क में रामायण मेले के उद्घाटन के दौरान उन्होंने 500 साल पहले बाबर के समय से लेकर संभल हिंसा और बांग्लादेश तक के घटनाक्रमों को जोड़ते हुए यह कहा कि इन घटनाओं में शामिल लोगों का "डीएनए एक ही है"। इस बयान को उन्होंने हिन्दू वोटों को एकजुट करने के एक सशक्त संकेत के रूप में पेश किया।
सीएम योगी ने अपने बयान में अयोध्या, संभल और बांग्लादेश को जोड़ते हुए धार्मिक मुद्दों को प्रमुखता दी और यह स्पष्ट किया कि वह आगामी चुनावी रण में बहुसंख्यक हिन्दू मतदाताओं को साधने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनका यह कदम 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए धर्म आधारित राजनीति को और अधिक मजबूत करने की ओर इशारा करता हैं।
UP में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सियासी घमासान तेज
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सियासी घमासान तेज हो चुका है, और इसमें प्रमुख मुद्दा धर्म और जातिवाद के आधार पर वोटबैंक की राजनीति है। बीजेपी जहां धर्म आधारित राजनीति के जरिए हिन्दू मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) का ध्यान पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) वोटबैंक पर है। इन दोनों दलों के बीच अब मुस्लिम वोटों को लेकर भी गहमागहमी शुरू हो गई है, जिसमें सपा और कांग्रेस एक-दूसरे को मुस्लिमों के सबसे बड़े हितैषी के रूप में पेश करने की होड़ में हैं।
इसकी एक झलक हाल ही में संभल को लेकर देखने को मिली, जब सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने संभल के बहाने कांग्रेस पर हमला बोला, तो कांग्रेस नेता राहुल और प्रियंका गांधी तुरंत 4 दिसंबर को संभल के लिए रवाना हो गए। यह स्पष्ट है कि समाजवादी पार्टी नहीं चाहती कि मुस्लिम वोटों को लेकर कांग्रेस आगे बढ़े, क्योंकि इससे सपा की राह मुश्किल हो सकती हैं।
सपा, मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ दलितों को भी अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है, और इस रणनीति को अखिलेश यादव ने पूरी तरह से अपना लिया है। समाजवादी पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि 2027 के चुनाव में PDA का गठबंधन मजबूत रहे और वह बीजेपी के धर्म कार्ड से टक्कर ले सके।इस प्रकार, उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव धर्म आधारित राजनीति और PDA के गठबंधन के बीच एक कड़ा मुकाबला होता दिख रहा है, जो आगामी महीनों में और भी गरमाने की संभावना हैं।