संसद से वक्फ संशोधन विधेयक का पारित होना महज एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि एनडीए गठबंधन की नई राजनीतिक दिशा का स्पष्ट संकेत बनकर उभरा है। मोदी सरकार की तीसरी पारी में, जहां बीजेपी लोकसभा में अकेले बहुमत से वंचित है।
नई दिल्ली: वक्फ संशोधन विधेयक का संसद के दोनों सदनों से पारित होना न केवल एक अहम कानूनी बदलाव है, बल्कि यह एनडीए गठबंधन की राजनीतिक एकजुटता और अंदरूनी समीकरणों में बदलाव का भी संकेत देता है। मौजूदा समय में, जब मोदी सरकार तीसरी बार सत्ता में है लेकिन लोकसभा और राज्यसभा में बीजेपी के पास अकेले बहुमत नहीं है, ऐसे में इस विधेयक का पारित होना सहयोगी दलों के बीच बेहतर समन्वय और मजबूत गठबंधन की ओर इशारा करता है।
क्या है इस विधेयक का बड़ा राजनीतिक संदेश?
वक्फ संशोधन बिल, जो धार्मिक रूप से संवेदनशील विषयों की श्रेणी में आता है, जैसे कि अनुच्छेद 370, तीन तलाक, और समान नागरिक संहिता—उसका इस तरह से पारित होना न सिर्फ कानून मंत्रालयों के आत्मविश्वास को बढ़ाता है, बल्कि यह दर्शाता है कि अब सरकार अपने वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए गठबंधन के भीतर नई शक्ति-संरचना तैयार कर चुकी है।
तीन प्रमुख संकेत जो वक्फ विधेयक से मिले
विपक्ष की रणनीति पर चोट: अब यह स्पष्ट हो गया है कि एनडीए के सहयोगी दल केवल वैचारिक मतभेदों के आधार पर सरकार से दूरी नहीं बनाएंगे, जिससे विपक्ष की वह उम्मीद कमजोर हो गई है कि सरकार अंदरूनी विरोध से अस्थिर हो सकती है। समान नागरिक संहिता की राह तैयार: सरकार अब अपने दीर्घकालिक वैचारिक एजेंडों को भी सही समय पर आगे बढ़ाने की स्थिति में है। वक्फ विधेयक ने एक तरह से समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों की जमीन तैयार कर दी है।
आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों की संभावनाएं बढ़ीं: सहयोगी दलों का बढ़ता विश्वास सरकार को आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों को लागू करने में भी सहयोगी बना सकता है।
गठबंधन की सीमाओं में एनडीए के सहयोगी
मोदी सरकार ने बड़ी चतुराई से एनडीए के सहयोगी दलों को गठबंधन की परिधि में रखते हुए उन्हें राजनीतिक विकल्पों की सीमित गुंजाइश में बाँध दिया है।लोजपा, जिसने 2002 में गुजरात दंगों के मुद्दे पर वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लिया था, ने इस बार बिहार चुनाव से पहले वक्फ बिल का समर्थन किया।टीडीपी, जो पहले अल्पसंख्यक संवेदनशीलता को लेकर भाजपा से दूरी बना चुकी थी, उसने भी अब समर्थन देकर वापसी की राह मजबूत की है।
जेडीयू, जो बिहार में मुस्लिम वोटों पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए सतर्क रहती है, ने भी वक्फ बिल को समर्थन देकर संकेत दे दिया कि नीतीश कुमार अब वैचारिक सख्ती के बजाय राजनीतिक अनुकूलता को प्राथमिकता दे रहे हैं।
विधेयक में बदलाव के नाम पर भरोसा बना
बीजेपी के सहयोगियों ने विधेयक को समर्थन देने से पहले कुछ संशोधनों की मांग की थी, खासकर पूर्वव्यापी प्रभाव और राज्य वक्फ परिषदों में राज्य सरकारों की भूमिका को लेकर। सरकार ने इन मुद्दों पर सहयोगी दलों की बातों को सुना और संशोधन के जरिए उन्हें संतुष्ट किया, जिससे विधेयक को व्यापक समर्थन मिल सका।