वास्तु शास्त्र में पंचतत्वों का क्या महत्व? What is the importance of five elements in Vastu Shastra?

वास्तु शास्त्र में पंचतत्वों का क्या महत्व? What is the importance of five elements in Vastu Shastra?
Last Updated: 11 मार्च 2024

वास्तु शास्त्र में पंचतत्वों का क्या महत्व? What is the importance of five elements in Vastu Shastra?

वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार, वास्तु अनुरूप भवन में रहने से मनुष्य को परम सुख, समृद्धि, बुद्धि और उर्वरता प्राप्त होती है। इस संरचना का निर्माण पांच तत्वों - अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि का संयोजन है। हालाँकि इनमें से प्रत्येक तत्व स्वतंत्र रूप से मौजूद है, जब एक साथ लाया जाता है, तो उनकी सामूहिक ऊर्जा लाभकारी प्रभाव डालती है। आइए आज वास्तु के गूढ़ रहस्यों को समझते हुए पंचतत्वों के बारे में विस्तृत चर्चा करते हैं। हम सभी जानते हैं कि प्रकृति की शक्तियाँ अनंत हैं। इन्हीं शक्तियों के माध्यम से सृष्टि का निर्माण, विकास और स्थायित्व होता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पांच महान तत्व हैं, जिनमें से प्रत्येक में अद्वितीय विशेषताएं हैं। इनका प्रभाव हमारे जीवन में देखा जा सकता है। यदि किसी भवन की संरचना इन पांच तत्वों के अनुरूप बनाई जाती है, तो उसमें रहने वालों की आंतरिक ऊर्जा संतुलित रहेगी, जिससे उनकी भलाई और समृद्धि होगी।

 

**अंतरिक्ष (आकाश):**

अंतरिक्ष का प्रतिनिधित्व आकाशीय पिंड बृहस्पति और देवता ब्रह्मा द्वारा किया जाता है। यह तत्व व्यक्तियों को सुनने की शक्ति प्रदान करता है। भवन का ईशान कोण और मध्य भाग अंतरिक्ष तत्व से प्रभावित होता है। इसलिए, इस क्षेत्र को साफ, खुला और प्रकाशयुक्त रखा जाना चाहिए ताकि इस स्थान से लाभकारी सूक्ष्म ऊर्जाएं भवन में प्रवेश कर सकें। यह क्षेत्र ध्यान, आत्मनिरीक्षण, प्रार्थना कक्ष और योग के लिए आदर्श है। बौद्धिक विकास, मानसिक शांति या आध्यात्मिक समृद्धि के लिए इस दिशा को बनाए रखना आवश्यक है।

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**पृथ्वी (पृथ्वी):**

पृथ्वी उस आधार के रूप में कार्य करती है जिस पर अन्य तीन तत्व - जल, अग्नि और वायु - कार्य करते हैं। यह मनुष्य को सूंघने की क्षमता प्रदान करता है। दक्षिण-पश्चिमी (नैऋत्य) क्षेत्र में पृथ्वी तत्व की प्रधानता होने के कारण इस क्षेत्र में भारी एवं पर्याप्त निर्माण शुभ रहता है। इस दिशा में शयनकक्ष होना लाभकारी होता है। इस दिशा में मोटी और भारी दीवारें सकारात्मक परिणाम लाती हैं। इस दिशा में भारी वस्तुएं भी रखनी चाहिए। इस दिशा में पृथ्वी तत्व के कमजोर होने से पारिवारिक रिश्तों में असुरक्षा की भावना आती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार जल निकासी के लिए दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम दिशा सर्वोत्तम मानी जाती है, इसलिए इसी दिशा में शौचालय का निर्माण कराना उचित रहता है।

**जल (जल):**

घर की उत्तरी और उत्तरपूर्वी दिशा जल तत्व से जुड़ी होती है। हैंडपंप, भूमिगत जल टैंक, दर्पण या पारदर्शी कांच जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। वर्षा जल एवं स्वच्छ जल का प्रवाह ईशान कोण में होना चाहिए। पूर्व दिशा बाथरूम के लिए अच्छी मानी जाती है और उत्तर-पूर्वी दिशा सेप्टिक टैंक के लिए फायदेमंद होती है। जल तत्व के कमजोर होने से परिवार में कलह का भय रहता है।

 

**अग्नि (अग्नि):**

सूर्य और मंगल प्रमुख ग्रह होने के कारण, इन्हें अग्नि तत्व का प्राथमिक प्रभावक माना जाता है। भवन के दक्षिणपूर्वी कोने (अग्नि) पर अग्नि तत्व का प्रभुत्व है। इसलिए भवन में आग से संबंधित सभी गतिविधियाँ, जैसे कि रसोई और बिजली के मीटर, इसी कोने में रखे जाने चाहिए। भवन में संतुलित अग्नि तत्व वित्तीय सुरक्षा की भावना पैदा करता है।

 

**वायु (वायु):**

भवन की उत्तर-पश्चिमी (वायव्य) दिशा में वायु तत्व का प्रभुत्व है। इस तत्व के स्वामी देवता वरुण हैं। वास्तु में इस दिशा को संचार की दिशा भी माना जाता है। इसलिए, भवन में कमजोर वायु तत्व के कारण सामाजिक रिश्ते खराब होते हैं और सम्मान में कमी आती है। अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु को बढ़ावा देने के लिए भवन के पूर्वी, उत्तरपूर्वी, उत्तरी और पश्चिमी दिशाओं में वेंटिलेशन प्रदान किया जाना चाहिए।

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