ईर्ष्या का फल। विक्रम-बैताल की कहानी

ईर्ष्या का फल। विक्रम-बैताल की कहानी
Last Updated: Thu, 16 Feb 2023

बेताल ने विक्रमादित्य को नई कहानी सुनानी शुरू कर दी। चित्रकूट में राजा उग्रसेन का शासन था। उनके पास एक चतुर तोता था। राजा ने तोता से पूछा, “ मित्र, तुम्हारी नजर में मेरे लिए उपयुक्त वधू कौन होगी?” तोते ने उत्तर दिया, “ वैशाली की राजकुमारी आपके लिए उपयुक्त वधू होगी। उसका नाम माधवी है। वह वहां की सभी कन्याओं में सबसे सुंदर है।” राजा ने तुरंत वैशाली के राजा को विवाह का प्रस्ताव भिजवाया, जिसे राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। धूमधाम से दोनों का विवाह हुआ और वह सुख पूर्वक रहने लगे।

जैसे राजा के पास तोता था ऐसे ही माधवी के पास भी एक मैना थी। माधवी के साथ वह भी चित्रकूट आ गई थी। धीरे-धीरे तोता मैना दोनों की दोस्ती हो गई।1 दिन मैना ने तोते को एक कहानी सुनाई। मैना ने कहा एक समय की बात है, एक धनी व्यापारी था। उसकी चंचला नाम की एक पुत्री थी चंचला बहुत सुंदर थी इसके साथ-साथ बुद्धिमान भी बहुत थी। उसके पिता को उसका यह स्वभाव पसंद नहीं था इसलिए उसके प्रभाव को बदलने की उसने बहुत कोशिश की, परंतु ऐसा नहीं हुआ। राजा ने एक सुंदर वर ढूंढ कर उसका विवाह कर दिया।

चंचला का पति एक व्यापारी था। व्यापार के चलते वह अधिकांश बाहर ही रहा करता था। 1 दिन चंचला के पिता ने उसका हाल जानना चाहा इसलिए उसने एक दूत चंचला के घर भेजा। जब वह दूत चंचला के घर पहुंचा, तब चंचला का पति काम से बाहर गया हुआ था। चंचला ने दूत का स्वागत किया। तथा उसे भोजन कराया, वह दूत देखने में बहुत सुंदर था दोनों एक दूसरे को पसंद आ गए और उन में प्रेम संबंध स्थापित हो गया। जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे उनका प्रेम गहरा होता चला गया जिसके परिणाम स्वरूप वह दूत चंचला के पति से ईर्ष्या करने लगा। चंचला को यह डर सताने लगा कि कहीं इन सब के बारे में उसके पति को पता ना चल जाए। उसने एक योजना बनाई।

चंचला ने एक दिन अपने प्रेमी को शरबत में जहर मिलाकर अपने प्रेमी को पिला दिया। उसके प्रेमी ने बिना किसी शंका के वह शरबत पी लिया और तुरंत उसकी मृत्यु हो गई। चंचला ने उसके मृत शरीर को घसीटकर एक कोने में छिपा दिया। जब उसका पति घर लौटा तो उसे कुछ आभास नहीं हुआ। भोजन करते समय चंचला चिल्लाई, “ मदद, के लिए अड़ोसी पड़ोसी शोर सुनकर उसके घर पर इकट्ठे हो गए। उन्होंने मृत दूत को देखा और सिपाहियों को खबर कर दी। उसके पति की पेशी राजा के सामने हुई। राज्य में  हत्या के लिए मृत्युदंड ही मिलता था। जब चंचला के पति को फांसी के लिए ले जा रहे थे तभी चोर वहां आया और राजा का अभिवादन कर बोला, “महाराज, मैं एक चोर हूं। जिस रात हत्या हुई, मै चोरी के इरादे से अंदर छिपा बैठा था। मैंने देखा कि इस व्यक्ति की पत्नी ने शरबत में जहर मिलाकर इसे पिलाया, जिससे इसकी तुरंत मृत्यु हो गई। कृपया आप इस निर्दोष व्यक्ति को छोड़ दें।”

राजा ने निर्दोष पति को छोड़कर चंचला को मृत्यु दंड दे दिया। बेताल ने पल भर रुक कर राजा से पूछा,” राजन! आपके विचार में दुर्भाग्य का दायित्व किस पर है?” विक्रमादित्य ने उत्तर दिया,” चंचला के पिता ही इस दुर्भाग्य के जिम्मेदार हैं। यदि उन्होंने चंचला के पति को चंचला की आदतों के बारे में बताया होता तो वह सावधान रहता और अपनी पत्नी को ऐसे अकेले नहीं छोड़ता।” राजा के सत्य वचन सुनकर बेताल मुस्कुराया। उसने कहा,” अच्छा, मैं फिर चला ” यह कहता हुआ वह उड़कर पीपल के पेड़ पर चला गया।

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