9 साल बाद भी विस्थापन का इंतजार, बिरिगुड़ा के परिवारों ने मांगा ‘विस्थापित व्यक्ति’ का दर्जा

ओडिशा के बिरिगुड़ा में करीब 124 परिवार वर्षों से पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। RPDSC ने मामले की जांच के लिए उपसमिति बनाने और दो महीने मे रिपोर्ट देने का फैसला

ओडिशा के बिरिगुड़ा में करीब 124 परिवार लंबे समय से पुनर्वास और विस्थापित व्यक्ति का दर्जा मिलने का इंतजार कर रहे हैं। आदित्य एल्युमिना परियोजना से जुड़े भूमि विवाद पर RPDSC ने उपसमिति बनाने और दो महीने में रिपोर्ट देने का फैसला किया है।

रायगढ़ा: ओडिशा के बिरिगुड़ा कॉलोनी में रहने वाले प्रभावित परिवार करीब दो दशक से पुनर्वास और पुनर्स्थापन के अधिकारों के लिए प्रशासनिक फैसले का इंतजार कर रहे हैं। आदित्य एल्युमिना परियोजना के लिए प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण से जुड़ा यह मामला एक बार फिर प्रशासनिक स्तर पर चर्चा में आया है। परिवारों की मुख्य मांग है कि उन्हें औपचारिक रूप से ‘विस्थापित व्यक्ति’ यानी Displaced Persons (DPs) का दर्जा दिया जाए और विस्थापन से पहले पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति के तहत मिलने वाले लाभ सुनिश्चित किए जाएं।

RPDSC बैठक में फिर उठा पुराना मामला

बिरिगुड़ा पुनर्वास का मुद्दा रायगढ़ा के जिला परिषद सम्मेलन कक्ष में आयोजित पुनर्वास एवं परिधीय विकास सलाहकार समिति (RPDSC) की पांचवीं बैठक में सामने आया। बैठक की अध्यक्षता दक्षिणी संभाग, ब्रह्मपुर के आरडीसी ने की। इसमें कोरापुट और रायगढ़ा के जिलाधिकारी, कोरापुट लोकसभा क्षेत्र के सांसद, दोनों जिलों के विधायक तथा समिति के अन्य सदस्य शामिल हुए।

बैठक में बिरिगुड़ा कॉलोनी के प्रतिनिधियों ने कहा कि परिवारों की मांगों का अंतिम समाधान किए बिना उन्हें परियोजना से जुड़ी जरूरतों के लिए कॉलोनी खाली करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए। परिवारों का कहना है कि उनका पुनर्वास इतिहास कई दशक पुराना है और मौजूदा विवाद केवल भूमि अधिग्रहण का नहीं, बल्कि उनके कानूनी और पुनर्वास अधिकारों का भी है।

1975 में 45 परिवारों को बसाया गया था

बिरिगुड़ा कॉलोनी के प्रतिनिधि बिपिन कुमार मंडिंगा द्वारा समिति को दिए गए लिखित ज्ञापन के अनुसार, वर्तमान बस्ती की कहानी वर्ष 1975 से जुड़ी है। उस समय सरकार की पुनर्वास प्रक्रिया के तहत मूल बिरिगुड़ा गांव से करीब 45 परिवारों को हटाकर वर्तमान कॉलोनी में बसाया गया था।

परिवारों का कहना है कि बाद में सरकार ने उन्हें कृषि भूमि और घर बनाने के लिए जमीन उपलब्ध कराई। कृषि भूमि के लिए कथित तौर पर पट्टे जारी किए गए, लेकिन आवासीय जमीन के मामले में उन्हें ऐसे दस्तावेज दिए गए जिन्हें वे औपचारिक पट्टे के समान नहीं मानते। इसी वजह से आज उनकी भूमि स्थिति और पुनर्वास अधिकारों को लेकर विवाद बना हुआ है।

1.77 एकड़ सरकारी जमीन पर बसी है कॉलोनी

प्रशासनिक रिकॉर्ड में बिरिगुड़ा कॉलोनी की स्थिति को लेकर अलग जानकारी सामने आती है। 17 अप्रैल 2013 को कोरापुट के उप-कलेक्टर कार्यालय में हुई बैठक की कार्यवाही के अनुसार, कॉलोनी करीब 1.77 एकड़ सरकारी जमीन पर बसी हुई है। यह भूमि बिरिगुड़ा गांव के खाता नंबर 81 और प्लॉट नंबर 414 तथा 415 में दर्ज थी और इसे ‘पतित’ श्रेणी की सरकारी जमीन बताया गया था।

रिकॉर्ड के मुताबिक, वर्ष 2008 में किए गए संयुक्त सर्वेक्षण में कॉलोनी में 114 परिवार पाए गए थे। फरवरी 2013 तक यह संख्या बढ़कर 124 परिवार हो गई थी। इसी अवधि में आदित्य एल्युमिना परियोजना के अधिकारियों ने परियोजना के लिए इस 1.77 एकड़ जमीन को आवश्यक बताते हुए सरकारी जमीन के हस्तांतरण के लिए अनुरोध किया था।

विस्थापित व्यक्ति का दर्जा देने की मांग

कॉलोनी के निवासियों ने प्रशासन के सामने स्पष्ट मांग रखी कि यदि परियोजना के लिए उनकी बस्ती की जमीन ली जाती है और परिवारों को वहां से हटाया जाता है, तो उन्हें आधिकारिक तौर पर विस्थापित व्यक्ति माना जाना चाहिए।

परिवारों ने ओडिशा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति, 2006 के तहत मिलने वाले अधिकारों और सुविधाओं की मांग की है। इनमें पुनर्वास, आवास, रोजगार तथा अन्य संबंधित लाभ शामिल हैं। प्रभावित परिवारों का तर्क है कि केवल जमीन खाली कराने से पहले उनके पुनर्वास और भविष्य की आजीविका की व्यवस्था करना प्रशासन और परियोजना से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

2011 और 2013 में भी हुई थी चर्चा

बिरिगुड़ा का मामला नया नहीं है। कॉलोनी प्रतिनिधि द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार, 5 फरवरी 2011 को हुई एक आधिकारिक बैठक में भी इन परिवारों के पुनर्वास का मुद्दा उठाया गया था। उस समय पुनर्वास आवास और परिवारों को विस्थापित व्यक्ति के रूप में मान्यता देने से संबंधित प्रस्तावों पर चर्चा हुई थी।

इसके बाद 17 अप्रैल 2013 की बैठक में भी 1.77 एकड़ जमीन और वहां रहने वाले परिवारों के भविष्य पर विस्तार से विचार किया गया। बैठक के रिकॉर्ड के अनुसार, परियोजना अधिकारियों ने माना था कि परियोजना के लिए जमीन का अधिग्रहण जरूरी हो सकता है और इससे कॉलोनी के परिवार प्रभावित होंगे।

रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख था कि परियोजना अधिकारियों ने बिरिगुड़ा परिवारों को विस्थापित व्यक्ति घोषित करने तथा ओडिशा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति, 2006 के तहत रोजगार और अन्य लाभ देने के प्रस्ताव को स्वीकार करने पर सहमति जताई थी। इसके बावजूद प्रक्रिया अंतिम समाधान तक नहीं पहुंच सकी।

वर्षों बाद भी नहीं निकला अंतिम समाधान

परिवारों का कहना है कि प्रस्ताव और बैठकों के बावजूद वास्तविक पुनर्वास प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इस वजह से प्रभावित परिवारों के बीच असमंजस बना हुआ है। वे यह जानना चाहते हैं कि परियोजना के लिए भूमि लेने की स्थिति में उन्हें किस आधार पर पुनर्वास मिलेगा और उनकी आजीविका तथा आवास की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी।

मामला दिसंबर 2023 में भी प्रशासन के सामने आया था। उस समय लक्ष्मीपुर के तहसीलदार ने जिला प्रशासन के निर्देश पर बिरिगुड़ा कॉलोनी का दौरा किया था। 22 दिसंबर 2023 की रिपोर्ट में करीब 124 परिवारों के 1.77 एकड़ क्षेत्र में रहने का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में हाउस साइट रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (ROR) जारी करने से संबंधित पहलू भी सामने आया था।

अब बनेगी विशेष उपसमिति

मामले को लंबे समय तक लंबित रहने को लेकर RPDSC बैठक में चिंता जताई गई। बैठक में आरडीसी ने मामले को तेजी से सुलझाने के लिए एक उपसमिति गठित करने की बात कही।

इस उपसमिति में कोरापुट और रायगढ़ा के जिलाधिकारी, विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी तथा संबंधित उप-कलेक्टर शामिल होंगे। समिति बिरिगुड़ा कॉलोनी की भूमि, परिवारों की संख्या, पुनर्वास की स्थिति और विस्थापित व्यक्ति के दर्जे से जुड़े सभी पहलुओं की जांच करेगी।

प्रस्तावित उपसमिति को दो महीने के भीतर अपनी सिफारिशें सौंपने का निर्देश दिया गया है। इसके बाद सिफारिशों को मंजूरी के लिए आगे बढ़ाया जाएगा और अंतिम निर्णय के लिए मामला फिर RPDSC के सामने रखा जाएगा।

परिवारों को अब अंतिम फैसले की उम्मीद

बिरिगुड़ा के परिवारों के लिए यह केवल जमीन का मामला नहीं है। दशकों से चले आ रहे पुनर्वास विवाद ने उनके आवास, आजीविका और भविष्य की सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े किए हैं। अब उपसमिति के गठन के बाद प्रभावित परिवारों को उम्मीद है कि उनके मामले में स्पष्ट और समयबद्ध फैसला लिया जाएगा।

यदि प्रशासन उन्हें विस्थापित व्यक्ति के रूप में मान्यता देता है, तो पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति के तहत मिलने वाले अधिकारों का रास्ता साफ हो सकता है। वहीं, परियोजना के लिए जमीन खाली कराने से पहले परिवारों की मांगों और कानूनी अधिकारों पर अंतिम निर्णय होना इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण चरण होगा।

फिलहाल प्रशासनिक प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हुई है और आने वाले दो महीनों में उपसमिति की रिपोर्ट यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है कि बिरिगुड़ा के परिवारों को लंबे इंतजार के बाद पुनर्वास और विस्थापन से जुड़े अधिकार मिलते हैं या नहीं।

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