4 साल में 111 सांसद-विधायकों ने बदली पार्टी, नागालैंड सबसे आगे; ADR रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े

ADR की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 से 2026 के बीच 111 सांसद और विधायक चुनाव जीतने के बाद दूसरी पार्टियों में गए। 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक हैं।

ADR की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 से 2026 के बीच 111 सांसद और विधायक चुनाव जीतने के बाद दूसरी पार्टियों में चले गए। इनमें 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं। नागालैंड में सबसे अधिक 32 मामले सामने आए।

नई दिल्ली: Association for Democratic Reforms (ADR) और National Election Watch की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक 2022 से 2026 के बीच चुनाव जीतने के बाद 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने अपनी राजनीतिक पार्टी बदली। इनमें 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं। रिपोर्ट में 2022 से 2026 के दौरान हुए चुनावों और उपचुनावों के आधार पर दल-बदल के मामलों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, दल-बदल के मामले 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सामने आए। नागालैंड 32 मामलों के साथ सबसे ऊपर रहा, जबकि पश्चिम बंगाल में 20, तेलंगाना में 9, गोवा और पंजाब में 8-8, महाराष्ट्र और मेघालय में 6-6 तथा मणिपुर में 5 जनप्रतिनिधियों ने पार्टी बदली। अकेले नागालैंड और पश्चिम बंगाल में कुल मामलों का लगभग 47 प्रतिशत दर्ज किया गया।

111 जनप्रतिनिधियों में 78 विधायक

ADR के विश्लेषण में पार्टी बदलने वाले 111 जनप्रतिनिधियों में सबसे बड़ा हिस्सा विधायकों का रहा। कुल 78 विधायक, 26 लोकसभा सदस्य और 7 राज्यसभा सदस्य इस सूची में शामिल हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक 78 विधायकों में से 70 ने चुनाव जीतने के बाद सीधे पार्टी बदली, जबकि 8 ने इस्तीफे या अयोग्यता जैसी प्रक्रियाओं के बाद उपचुनाव लड़ा और दोबारा निर्वाचित होने के बाद दूसरी पार्टी में चले गए।

यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है, जब चुनाव के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों के पार्टी बदलने और उसके विधानसभा या संसद में राजनीतिक समीकरणों पर असर को लेकर लगातार चर्चा होती रही है।

नागालैंड में सबसे ज्यादा दल-बदल

ADR के मुताबिक नागालैंड में 32 जनप्रतिनिधियों ने पार्टी बदली, जो इस अवधि के कुल 111 मामलों का करीब 29 प्रतिशत है। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 20 मामले सामने आए, जो कुल का लगभग 18 प्रतिशत है।

इसके अलावा तेलंगाना में 9, गोवा में 8, पंजाब में 8, महाराष्ट्र में 6, मेघालय में 6 और मणिपुर में 5 दल-बदल के मामले दर्ज किए गए।

इन आंकड़ों के मुताबिक नागालैंड और पश्चिम बंगाल में हुए कुल 52 दल-बदल मामले, देशभर में दर्ज 111 मामलों का करीब 47 प्रतिशत हैं।

NDPP से सबसे ज्यादा प्रतिनिधि बाहर गए

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि किन राजनीतिक दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने सबसे ज्यादा पार्टी बदली। Nationalist Democratic Progressive Party (NDPP) से 25 जनप्रतिनिधि दूसरी पार्टियों में गए। यह कुल दल-बदल मामलों का करीब 23 प्रतिशत है।

इसके बाद All India Trinamool Congress (AITC) के 20 और Indian National Congress (INC) के 19 प्रतिनिधियों ने पार्टी बदली।

इसके अलावा Bharat Rashtra Samithi (BRS) के 9, Aam Aadmi Party (AAP) और Nationalist Congress Party (NCP) के 7-7, Shiv Sena (UBT) के 6, Janata Dal (United) के 5 और National People's Party (NPP) के 4 प्रतिनिधियों ने भी पार्टी बदली।

NDPP, AITC और कांग्रेस से पार्टी बदलने वाले प्रतिनिधियों की संयुक्त संख्या 64 रही। यह कुल 111 मामलों का करीब 58 प्रतिशत है।

NPF में सबसे ज्यादा नेता शामिल हुए

ADR की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पार्टी बदलने वाले जनप्रतिनिधियों में से सबसे ज्यादा लोगों ने किन दलों का रुख किया।

Naga People's Front (NPF) में 32 नेता शामिल हुए। इसके बाद BJP में 29 और Nationalist Citizens Party of India (NCPI) में 20 नेता गए।

इसके अलावा कांग्रेस में 9, शिवसेना में 8, NPP में 6 और People's Party of Arunachal (PPA) में 4 नेता शामिल हुए।

इस तरह NPF, BJP और NCPI ने मिलकर 111 में से 81 जनप्रतिनिधियों को अपने साथ जोड़ा। यह कुल दल-बदल मामलों का लगभग 73 प्रतिशत है।

कई राज्यों के राजनीतिक समीकरण बदले

ADR ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हाल के वर्षों में कुछ राज्यों में विधायकों के दल-बदल का सरकारों के गठन और राजनीतिक बदलावों पर असर पड़ा है।

रिपोर्ट के मुताबिक नागालैंड में 32 प्रतिनिधियों के पार्टी बदलने से राज्य में राजनीतिक ताकतों का संतुलन बदला। पश्चिम बंगाल में AITC से 20 प्रतिनिधियों के बाहर जाने का असर विपक्षी राजनीति के समीकरण पर पड़ा।

तेलंगाना में BRS के 9 विधायक कांग्रेस में शामिल हुए, जिससे विधानसभा में दोनों दलों की स्थिति प्रभावित हुई। रिपोर्ट के अनुसार इससे BRS की संख्या कम हुई और कांग्रेस की स्थिति मजबूत हुई।

गोवा में कांग्रेस के 8 विधायक BJP में शामिल हुए। वहीं मणिपुर में JD(U) के 5 विधायक BJP में गए। महाराष्ट्र में Shiv Sena (UBT) के 6 सांसद शिंदे गुट की शिवसेना में शामिल हुए।

चुनावी जनादेश और बाद का राजनीतिक बदलाव

ADR की रिपोर्ट का एक प्रमुख निष्कर्ष यह है कि कई राज्यों में चुनाव के समय मतदाताओं द्वारा बनाया गया राजनीतिक समीकरण बाद में दल-बदल के कारण बदल गया।

यहां चुनावी जनादेश और बाद के राजनीतिक घटनाक्रम के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। चुनाव में किसी पार्टी के टिकट पर जीतने वाला प्रतिनिधि यदि बाद में दूसरी पार्टी में जाता है, तो सदन में दलों की संख्या और राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि, किसी विशेष मामले में इसका संवैधानिक या कानूनी प्रभाव संबंधित परिस्थितियों और प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है।

क्या है भारत का दल-बदल विरोधी कानून?

भारत में दल-बदल से संबंधित प्रावधान संविधान की 10वीं अनुसूची में हैं। इसे आम तौर पर Anti-Defection Law कहा जाता है। यह प्रावधान 1985 में संविधान के 52वें संशोधन के जरिए जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के राजनीतिक दल बदलने से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता को रोकना था।

10वीं अनुसूची के तहत किसी राजनीतिक दल से संबंधित सदस्य के स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने या पार्टी निर्देश के विपरीत सदन में मतदान करने जैसी परिस्थितियों में अयोग्यता का प्रावधान है। हालांकि, इसमें कुछ संवैधानिक अपवाद भी हैं।

पार्टी विलय के लिए दो-तिहाई सदस्यों का प्रावधान

10वीं अनुसूची में पार्टी के विलय के लिए विशेष प्रावधान मौजूद है। संविधान के अनुसार, यदि संबंधित विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य विलय पर सहमत हों, तो उस स्थिति में दल-बदल के आधार पर अयोग्यता लागू नहीं होती।

मौजूदा कानून में पहले मौजूद ‘split’ यानी एक-तिहाई सदस्यों के अलग होने वाले अपवाद को 91वें संविधान संशोधन के बाद हटा दिया गया था। विलय का दो-तिहाई प्रावधान हालांकि बना हुआ है।

दल-बदल के आंकड़ों ने फिर उठाई बहस

ADR के नए आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब 2022 से 2026 के बीच कई राज्यों और संसद में पार्टी बदलने वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या ने राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित किया है।

रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक कुल 111 दल-बदल मामलों में सबसे अधिक संख्या नागालैंड और पश्चिम बंगाल की रही। वहीं NDPP, AITC और कांग्रेस से बाहर जाने वाले प्रतिनिधियों की संयुक्त संख्या 64 रही, जबकि NPF, BJP और NCPI में जाने वाले प्रतिनिधियों की संख्या 81 रही।

इन आंकड़ों से यह तथ्य सामने आता है कि चुनाव के बाद राजनीतिक दलों की सदन में संख्या हमेशा चुनाव परिणामों के समान नहीं रहती। हालांकि, प्रत्येक मामले में दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता लागू होती है या नहीं, यह संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और प्रक्रिया पर निर्भर करता है।

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