MBBS दाखिला फर्जीवाड़ा: एक PPO नंबर पर चार दावेदार, स्वतंत्रता सेनानी प्रमाणपत्रों की जांच अब यूपी तक पहुंची

देहरादून MBBS दाखिला फर्जीवाड़े में चार अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में एक ही PPO नंबर मिला। उत्तराखंड के बाद अब यूपी के रिकॉर्ड भी खंगाले जा रहे हैं।
MBBS दाखिला फर्जीवाड़ा: एक PPO नंबर पर चार दावेदार, स्वतंत्रता सेनानी प्रमाणपत्रों की जांच अब यूपी तक पहुंची
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उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के जरिए एमबीबीएस में दाखिले से जुड़े कथित फर्जीवाड़े की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे दस्तावेजों में की गई गड़बड़ियों की नई कड़ियां सामने आ रही हैं। देहरादून में सामने आए इस मामले में जांच एजेंसियों को चार अलग-अलग अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में एक ही पेंशन भुगतान आदेश यानी PPO नंबर इस्तेमाल किए जाने की जानकारी मिली है। खास बात यह है कि शुरुआती जांच में यह PPO नंबर उत्तराखंड के उपलब्ध स्वतंत्रता सेनानी रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रहा है। अब जांच का दायरा उत्तर प्रदेश तक बढ़ा दिया गया है और वहां के स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़े PPO नंबर तथा अभिलेखों से भी इसका मिलान कराया जा रहा है।

मामला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित श्रेणी के उन प्रमाणपत्रों से जुड़ा है, जिनके आधार पर चार अभ्यर्थियों ने एमबीबीएस में दाखिला लिया था। जांच में सामने आया कि चारों मामलों में जिस स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर वर्मा का नाम इस्तेमाल किया गया, उससे संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में भी कई महत्वपूर्ण विसंगतियां मिलीं। पहले जिला प्रशासन की जांच में धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह का नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारियों से संबंधित संरक्षित पंजिका में नहीं मिला था। इसके बाद चारों प्रमाणपत्र निरस्त किए गए और एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने संबंधित चार एमबीबीएस दाखिले भी रद्द कर दिए।

अब जांच में सामने आया है कि चारों अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में जिस PPO नंबर का इस्तेमाल किया गया, वह एक ही है। यानी अलग-अलग अभ्यर्थियों के लिए तैयार किए गए स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों में समान पेंशन भुगतान आदेश संख्या दर्ज की गई। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि यह नंबर किस रिकॉर्ड से लिया गया, इसे प्रमाणपत्रों में किसने दर्ज किया और क्या इसके पीछे किसी वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी के दस्तावेज का इस्तेमाल किया गया था।

जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिन दस्तावेजों में धर्मवीर का नाम दर्ज किया गया, उनके संदर्भ में संबंधित ताम्रपत्र के रिकॉर्ड में भी नाम नहीं मिला। ऐसे में जांच एजेंसियों के सामने यह सवाल है कि प्रमाणपत्र तैयार करने के दौरान स्वतंत्रता सेनानी से जुड़े मूल दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ था। अब अधिकारियों की ओर से उत्तराखंड के रिकॉर्ड के साथ उत्तर प्रदेश के उपलब्ध रिकॉर्ड का भी मिलान कराया जा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि PPO नंबर या अन्य विवरण कहीं किसी दूसरे राज्य के वास्तविक रिकॉर्ड से तो नहीं उठाए गए।

इस मामले में जिला प्रशासन की शुरुआती जांच में चार अभ्यर्थियों के पते और पारिवारिक विवरण को लेकर भी गंभीर विसंगतियां सामने आई थीं। जांच अधिकारियों को कुछ अभ्यर्थी और उनके परिवार आवेदन में दिए गए पते पर नहीं मिले। स्थानीय स्तर पर पूछताछ में भी दर्ज पते पर उनके रहने की पुष्टि नहीं हुई। कुछ मामलों में आवेदन में दिए गए मोबाइल नंबर भी संबंधित अभ्यर्थियों या परिवार के सदस्यों के बजाय अन्य लोगों से जुड़े पाए गए थे।

जांच में यह भी सामने आया था कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र के लिए आवश्यक दस्तावेजों की प्रक्रिया में कई कमियां थीं। सामान्य तौर पर आवेदन के साथ आवेदक का फोटो, स्वतंत्रता सेनानी का मूल प्रमाणपत्र या कार्ड, पेंशन से संबंधित दस्तावेज, पहचान और निवास प्रमाण तथा स्वतंत्रता सेनानी के साथ संबंध दर्शाने वाले दस्तावेज जरूरी होते हैं। लेकिन चारों मामलों की जांच में कई आवश्यक दस्तावेजों के स्थान पर दूसरे कागजात लगाए जाने की बात सामने आई।

मामले की जांच अब केवल फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले लोगों तक सीमित नहीं है। एसआईटी इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि आवेदन जमा होने से लेकर प्रमाणपत्र जारी होने तक सरकारी स्तर पर किन-किन अधिकारियों और कर्मचारियों ने फाइल की जांच की थी। एसआईटी ने एसडीएम सदर और एडीएम कार्यालय की संबंधित पत्रावलियां अपने कब्जे में लेकर उनकी जांच शुरू की है। उद्देश्य यह पता लगाना है कि जिन दस्तावेजों में विसंगतियां थीं, वे सरकारी सत्यापन की प्रक्रिया से गुजरने के बाद प्रमाणपत्र के रूप में कैसे जारी हो गए।

जांच के दौरान संबंधित पटवारी से भी पूछताछ की जा चुकी है। एसआईटी यह देख रही है कि आवेदन में दर्ज तथ्यों की पहली जांच किस स्तर पर हुई थी और रिपोर्ट में क्या जानकारी दी गई। इसके बाद फाइल किन अधिकारियों के पास पहुंची और किस स्तर पर प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पूरी हुई, इसका रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है। जांच एजेंसी के लिए यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि आवेदन में मौजूद दस्तावेज पहले से ही संदिग्ध थे, तो उनके सत्यापन की प्रक्रिया में उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी अलग-अलग स्तर पर तय हो सकती है। हालांकि किसी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी अभी जांच का विषय है और अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

इस पूरे मामले में एसआईटी का गठन 19 सितंबर को किया गया था। देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमेन्द्र सिंह डोबाल ने एसपी जया बलोनी के नेतृत्व में विशेष जांच दल बनाया था। एसआईटी को फर्जी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र तैयार कराने और उनके आधार पर एमबीबीएस में दाखिला लेने से जुड़े पूरे नेटवर्क की जांच का जिम्मा दिया गया है। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि अभ्यर्थियों तक ऐसे दस्तावेज किस माध्यम से पहुंचे और इन्हें तैयार कराने में किन लोगों की भूमिका थी।

एसआईटी ने मेडिकल कॉलेजों से भी दाखिले के दौरान जमा कराए गए दस्तावेज अपने कब्जे में लिए हैं। 21 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, एसआईटी की टीमों ने मेडिकल कॉलेज श्रीनगर और मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी पहुंचकर संबंधित रिकॉर्ड की जांच की थी। छुट्टी के दिन कार्यालय खुलवाकर अभ्यर्थियों द्वारा दाखिले के समय जमा किए गए दस्तावेज भी लिए गए थे। इसके साथ ही अलग-अलग दस्तावेजों में दर्ज पतों का सत्यापन कराया जा रहा है, क्योंकि कुछ मामलों में अभ्यर्थियों ने अलग-अलग पते दर्ज कराए थे।

जांच में दस्तावेजों के डिजिटल रिकॉर्ड को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एमबीबीएस प्रवेश प्रक्रिया ऑनलाइन होने के कारण आवेदन के समय अपलोड किए गए दस्तावेज, मोबाइल नंबर, ईमेल और अन्य तकनीकी विवरणों का रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है। एसआईटी इन डिजिटल जानकारियों को भी खंगाल रही है। यदि अलग-अलग आवेदनों में किसी तरह की समानता या साझा डिजिटल कड़ी सामने आती है, तो इससे कथित फर्जी प्रमाणपत्र तैयार कराने वाले नेटवर्क तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।

मामले में पहले ही चार एमबीबीएस दाखिले रद्द किए जा चुके हैं। जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट के आधार पर चार स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों को निरस्त किया गया था। इसके बाद एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने चारों दाखिले भी रद्द कर दिए। विश्वविद्यालय के अनुसार ये सीटें रिक्त मानी जाएंगी और आगे की काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल की जा सकती हैं।

इस मामले में पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाने की भी जानकारी सामने आई थी। आरोप फर्जी दस्तावेजों के जरिए स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे का लाभ लेकर एमबीबीएस दाखिला हासिल करने से संबंधित हैं। पुलिस और प्रशासन की जांच के आधार पर संबंधित प्रमाणपत्रों को निरस्त किया जा चुका है। हालांकि किसी भी आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अदालत में साबित किया जाना बाकी है।

जांच के दौरान एक और गंभीर तथ्य सामने आने की बात कही गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, चार अलग-अलग परिवारों से संबंधित छात्रों के प्रमाणपत्रों में स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर की तस्वीर के स्थान पर कथित तौर पर AI से तैयार तस्वीर इस्तेमाल की गई थी। इस दावे की जांच भी दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर की जा रही है।

अब उत्तर प्रदेश के रिकॉर्ड की जांच इस मामले में एक महत्वपूर्ण अगला चरण बन गई है। यदि समान PPO नंबर किसी वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी के रिकॉर्ड से जुड़ा मिलता है, तो जांच एजेंसियों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि दस्तावेज तैयार करने वालों ने जानकारी कहां से हासिल की। दूसरी ओर यदि उत्तर प्रदेश समेत दूसरे राज्यों के रिकॉर्ड में भी यह नंबर नहीं मिलता है, तो प्रमाणपत्रों में इस्तेमाल किए गए विवरण की संदिग्धता और बढ़ सकती है। फिलहाल पुलिस ने इस बारे में अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है और रिकॉर्ड के मिलान की प्रक्रिया जारी है।

पूरे मामले की जांच अब तीन स्तरों पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है—फर्जी प्रमाणपत्र में इस्तेमाल दस्तावेजों की सत्यता, उन प्रमाणपत्रों के सरकारी सत्यापन की प्रक्रिया और एमबीबीएस दाखिले के दौरान जमा कराए गए रिकॉर्ड। इसके साथ ही पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि क्या यह किसी एक मामले तक सीमित था या इसी तरीके से दूसरे अभ्यर्थियों को भी लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। उपलब्ध जांच के आधार पर अभी इस संभावित दायरे पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।

फिलहाल चार एमबीबीएस दाखिले रद्द हो चुके हैं, संबंधित प्रमाणपत्र निरस्त किए जा चुके हैं और एसआईटी सरकारी कार्यालयों से लेकर मेडिकल कॉलेजों तक के रिकॉर्ड खंगाल रही है। एक ही PPO नंबर का चार अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में इस्तेमाल होना जांच की अहम कड़ी बन गया है। अब उत्तराखंड के साथ उत्तर प्रदेश के रिकॉर्ड का मिलान और सरकारी फाइलों की पड़ताल यह स्पष्ट करने में मदद करेगी कि कथित फर्जीवाड़े में दस्तावेज कहां तैयार हुए, सत्यापन में कहां चूक हुई और इसके पीछे कौन-कौन लोग शामिल थे।

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