आसाराम केस में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- निर्दोष लोग बंद दरवाजे नहीं खोजते

Asaram केस में राजस्थान हाईकोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखते हुए कहा कि निर्दोष लोग कभी अंधेरे और बंद दरवाजों में शरण नहीं खोजते।

राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम की उम्रकैद बरकरार रखते हुए फैसले में पीड़िता की पीड़ा, विश्वासघात और न्याय के सिद्धांतों पर विस्तृत टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि निर्दोषता कभी अंधेरे और बंद दरवाजों की तलाश नहीं करती।

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग दुष्कर्म मामले में Asaram की उम्रकैद की सजा बरकरार रखते हुए 92 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया। अदालत ने अपने निर्णय में पीड़िता की मानसिक पीड़ा, सामाजिक दबाव और विश्वासघात को गहराई से रेखांकित करते हुए कहा कि निर्दोष लोग कभी अंधेरे और बंद दरवाजों में शरण नहीं खोजते।

हाईकोर्ट ने फैसले में लिखी भावनात्मक टिप्पणी

राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने आसाराम से जुड़े नाबालिग दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की बेंच ने फैसले की शुरुआत बेहद भावुक शब्दों से की।

अदालत ने कहा कि पीड़िता का जन्म 4 जुलाई को हुआ था, जो स्वतंत्रता का प्रतीक दिन माना जाता है, लेकिन 15 अगस्त 2013 की रात उसकी स्वतंत्रता, गरिमा और मासूमियत छीन ली गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस व्यक्ति को वह बच्ची भगवान मानती थी, उसी ने उसके विश्वास को तोड़ा।

‘निर्दोषता कभी बंद दरवाजे नहीं खोजती’

फैसले में अदालत ने बचाव पक्ष की उन दलीलों को खारिज किया, जिनमें घटना का कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं होने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कहा कि घटना के समय कमरे में केवल आरोपी और पीड़िता मौजूद थे। दरवाजा अंदर से बंद था और लाइट बंद कर दी गई थी।

खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे हालात में तीसरे गवाह की मांग करना पीड़िता के साथ अन्याय होगा। अदालत ने कहा कि कोई निर्दोष व्यक्ति अंधेरे और बंद दरवाजों में किसी लड़की को अकेले नहीं बुलाता।

पीड़िता की चुप्पी और मानसिक आघात पर टिप्पणी

कोर्ट ने फैसले में यह भी कहा कि पीड़िता आरोपी को भगवान मानकर उसके पास गई थी, लेकिन वही स्थान उसके लिए डर और उत्पीड़न की जगह बन गया। अदालत ने रेप को केवल शारीरिक अपराध नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और पहचान को तोड़ने वाला अपराध बताया।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह की घटनाएं पीड़िता के जीवन को हमेशा के लिए “पहले” और “बाद” में बांट देती हैं। अदालत ने यह भी माना कि सामाजिक शर्म और डर के कारण पीड़िताएं अक्सर चुप रहने को मजबूर हो जाती हैं।

बचाव पक्ष की दलीलों को किया खारिज

फैसले में अदालत ने बचाव पक्ष द्वारा उठाई गई “50 करोड़ की साजिश” वाली दलील को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि यह पूर्व नियोजित साजिश होती तो शिकायतकर्ता तुरंत स्थानीय स्तर पर मामला दर्ज करा सकते थे, लेकिन उन्होंने लंबी प्रक्रिया अपनाई, जो डर और असमंजस की स्थिति को दर्शाती है।

अदालत ने यह भी कहा कि गवाहों की छोटी-मोटी विसंगतियां उन्हें झूठा साबित नहीं करतीं। कोर्ट के अनुसार, याददाश्त कोई स्थिर तस्वीर नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती मानवीय स्मृति होती है।

81 पन्नों की जिरह के बाद भी बयान नहीं बदला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि बचाव पक्ष के वकीलों ने पीड़िता से लंबी और कड़ी जिरह की, जो रिकॉर्ड में 81 पन्नों तक दर्ज है। इसके बावजूद पीड़िता अपने मुख्य बयान पर कायम रही।

कोर्ट ने इसे उसकी गवाही की विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण आधार माना। साथ ही अदालत ने कहा कि आरोपी की कैद केवल शारीरिक सीमाओं तक है, जबकि पीड़िता की मानसिक पीड़ा उम्रभर चलने वाली सजा जैसी है, जिसका कोई अंत नहीं होता।

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