असम विधानसभा चुनाव में JMM को कोई सीट नहीं मिली, लेकिन पार्टी ने इसे अपनी राजनीतिक शुरुआत बताया। हेमंत सोरेन ने कहा कि सीमित संसाधनों में 16 सीटों पर चुनाव लड़कर JMM ने राज्य में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
रांची:झारखंड की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने इस बार असम विधानसभा चुनाव में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की। पार्टी ने कुल 16 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व इस चुनाव को अपनी राजनीतिक रणनीति की शुरुआत मान रहा है।
चुनाव नतीजों के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री और JMM नेता हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सीमित संसाधनों और बिना किसी बड़े गठबंधन के पार्टी ने असम में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। उन्होंने इसे भविष्य के विस्तार की दिशा में पहला कदम बताया।
हेमंत सोरेन ने बताया ‘संगठन विस्तार की शुरुआत’
हेमंत सोरेन ने कहा कि पहली बार चुनाव लड़ते हुए दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रहना और सात सीटों पर 15 हजार से अधिक वोट हासिल करना पार्टी के लिए सकारात्मक संकेत हैं। उनके मुताबिक यह दिखाता है कि असम में खासकर चाय जनजाति समुदाय के बीच JMM की पहचान बननी शुरू हो गई है।
उन्होंने यह भी कहा कि यह सिर्फ शुरुआत है और आने वाले वर्षों में संगठन को और मजबूत किया जाएगा।
कांग्रेस और JMM आमने-सामने
दिलचस्प बात यह रही कि जिन 16 सीटों पर JMM ने चुनाव लड़ा, उनमें से 13 सीटों पर उसका मुकाबला कांग्रेस से भी था। जबकि झारखंड में दोनों दल गठबंधन सहयोगी हैं।

इन 13 सीटों में से तीन सीटों पर JMM कांग्रेस से आगे रही, जबकि बाकी 10 सीटों पर कांग्रेस को ज्यादा वोट मिले। हालांकि कई सीटों पर दोनों दलों के वोट मिलाकर भी विजेता उम्मीदवार को हराने की स्थिति नहीं बन पाई।
विश्लेषकों का मानना है कि इससे यह संकेत मिलता है कि विपक्षी वोटों का बंटवारा हुआ, लेकिन JMM का मुख्य उद्देश्य फिलहाल जीत से ज्यादा अपनी राजनीतिक पहचान बनाना था।
किन सीटों पर JMM ने बेहतर प्रदर्शन किया
- गोसाईगांव सीट
गोसाईगांव सीट पर JMM उम्मीदवार फेडरिकसन हांसदा को 21 हजार से ज्यादा वोट मिले और पार्टी दूसरे स्थान पर रही। यहां कांग्रेस तीसरे नंबर पर चली गई। यदि कांग्रेस और JMM के वोट एक साथ होते, तो मुकाबला काफी करीबी हो सकता था।
- मजबत सीट
मजबत सीट पर प्रीति रेखा बारला ने करीब 29 हजार वोट हासिल किए। यहां भी JMM दूसरे स्थान पर रही, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके।
- भेरगांव सीट
भेरगांव सीट पर प्रभात दास पनिका को लगभग 22 हजार वोट मिले। यहां JMM तीसरे स्थान पर रही और कांग्रेस चौथे नंबर पर पहुंच गई।
हालांकि बाकी अधिकांश सीटों पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई, लेकिन कुछ क्षेत्रों में उसे उम्मीद से बेहतर समर्थन मिला।
असम में JMM की रणनीति क्या थी?
असम चुनाव में JMM ने पारंपरिक तरीके से बड़ा संगठन खड़ा करने के बजाय स्थानीय सामाजिक संगठनों और क्षेत्रीय नेटवर्क के सहारे चुनाव लड़ा। पार्टी ने विशेष रूप से चाय जनजाति समुदाय के मुद्दों को केंद्र में रखा।
JMM महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य के अनुसार, पार्टी ने केवल 15 दिनों के प्रचार अभियान में 1.5 प्रतिशत वोट हासिल किए, जो पहली कोशिश के हिसाब से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उन्होंने दावा किया कि पार्टी ने जिन मुद्दों को उठाया, उन्हें बाद में अन्य राजनीतिक दलों ने भी अपने घोषणापत्र और प्रचार में शामिल किया।
चाय बागान मजदूरों के मुद्दे पर फोकस
JMM ने चुनाव प्रचार के दौरान चाय बागान मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। पार्टी ने दैनिक मजदूरी को 250 रुपए से बढ़ाकर 500 रुपए करने का वादा किया था।
इसके अलावा पार्टी ने लेबर सेस का 20 प्रतिशत हिस्सा मजदूरों को नकद देने और चाय जनजाति समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाने की मांग भी उठाई।
JMM का कहना है कि बाद में कांग्रेस और बीजेपी ने भी इन मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल किया। पार्टी इसे अपनी वैचारिक सफलता मान रही है।
जय भारत पार्टी की क्या भूमिका रही?
असम में JMM के चुनाव अभियान के पीछे स्थानीय संगठन “जय भारत पार्टी” की अहम भूमिका रही। चुनाव लड़ने वाले अधिकांश उम्मीदवार और कार्यकर्ता इसी संगठन से जुड़े थे।
जय भारत पार्टी के सचिव जूना कुजूर ने कहा कि भविष्य में भी यही संगठन असम में राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाएगा। उनके मुताबिक JMM केवल राजनीतिक समर्थन और आर्थिक सहयोग देगा, जबकि जमीनी संगठन स्थानीय स्तर पर ही संचालित होगा।
उन्होंने साफ कहा कि असम की राजनीति में स्थानीय पहचान ज्यादा प्रभावी है और झारखंड आधारित राजनीतिक छवि के साथ लंबे समय तक सफलता पाना आसान नहीं होगा।
क्या JMM असम में संगठन बनाएगी?
इस सवाल पर JMM नेतृत्व ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया है। सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि पार्टी का चुनाव चिन्ह और पहचान JMM की होगी, जबकि संगठनात्मक ढांचा स्थानीय सहयोगियों के जरिए आगे बढ़ेगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि JMM फिलहाल असम में सीधे बड़ा संगठन खड़ा करने के बजाय क्षेत्रीय समूहों के साथ मिलकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहती है।
भविष्य की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?
असम चुनाव में जीत न मिलने के बावजूद JMM इसे राजनीतिक निवेश के तौर पर देख रही है। पार्टी का फोकस फिलहाल उन समुदायों में अपनी पहचान बनाने पर है, जिनकी सामाजिक और सांस्कृतिक जड़ें झारखंड और पूर्वोत्तर भारत के चाय बागान क्षेत्रों से जुड़ी हैं।
हालांकि आने वाले वर्षों में यह साफ होगा कि JMM असम में केवल प्रतीकात्मक मौजूदगी बनाए रखती है या फिर वास्तव में क्षेत्रीय राजनीति में मजबूत खिलाड़ी बनने की दिशा में आगे बढ़ती है।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि चुनावी हार के बावजूद JMM असम में अपने लिए संभावनाओं का नया रास्ता तलाशने की कोशिश कर रही है।










