बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत की पकड़ मजबूत, खाड़ी देशों से डील पर फोकस

भारत वैश्विक मंच पर मजबूत Global Partner बनकर उभर रहा है। EU, अमेरिका के बाद अब खाड़ी देशों के साथ FTA की पहल से भारत की व्यापार और कूटनीतिक ताकत बढ़ती दिख रही

बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत की भूमिका मजबूत हो रही है। EU और अमेरिका के बाद अब खाड़ी देशों के साथ FTA की दिशा में कदम भारत को भरोसेमंद global partner के रूप में स्थापित कर रहा है।

New Delhi: दुनिया के आर्थिक और राजनीतिक नक्शे पर भारत की भूमिका तेजी से बदल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अब केवल एक उभरता हुआ बाजार नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद global partner के रूप में देखा जा रहा है। यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों में गति आने के बाद अब खाड़ी देश भी भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते के लिए आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं है, बल्कि भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था, आत्मविश्वासी विदेश नीति और दीर्घकालिक रणनीति का नतीजा है।

खाड़ी देशों के साथ FTA की ओर बड़ा कदम

भारत और खाड़ी सहयोग परिषद यानी GCC के बीच मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में एक अहम कदम उठने जा रहा है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की मौजूदगी में दोनों पक्ष एक ऐसी रूपरेखा पर हस्ताक्षर करने वाले हैं, जो आने वाली वार्ताओं का दायरा, तरीका और प्राथमिकताएं तय करेगी। इस पहल को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि लगभग दो दशक से यह प्रक्रिया ठंडी पड़ी हुई थी।

खाड़ी सहयोग परिषद में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन शामिल हैं। भारत पहले ही UAE के साथ मुक्त व्यापार समझौता लागू कर चुका है और ओमान के साथ Comprehensive Economic Partnership Agreement पर भी हस्ताक्षर हो चुके हैं। अब पूरे समूह के साथ समझौता भारत की व्यापार नीति का अगला बड़ा अध्याय माना जा रहा है।

ऊर्जा से आगे बढ़ते व्यापारिक रिश्ते

भारत और खाड़ी देशों के बीच व्यापार का आधार लंबे समय तक ऊर्जा रहा है। भारत अपने कच्चे तेल और गैस की जरूरतों का बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से पूरा करता है। सऊदी अरब और कतर भारत की ऊर्जा सुरक्षा के सबसे मजबूत स्तंभ रहे हैं। लेकिन अब यह रिश्ता केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं रहा।

भारत खाड़ी देशों को मोती, कीमती और अर्ध कीमती पत्थर, धातु, कृत्रिम आभूषण, बिजली उपकरण, लोहा, इस्पात और रसायन जैसे उत्पाद निर्यात करता है। हाल के आंकड़े बताते हैं कि भारत का निर्यात लगभग 57 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जबकि आयात 121 अरब डॉलर से अधिक है। कुल मिलाकर द्विपक्षीय व्यापार 178 अरब डॉलर से ऊपर जा चुका है, जो इस साझेदारी की गहराई को साफ दिखाता है।

भारतीय प्रवासी और आर्थिक सेतु

खाड़ी देश केवल व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि भारत के लिए मानवीय और सामाजिक स्तर पर भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। विदेश में रहने वाले लगभग तीन करोड़ भारतीयों में से बड़ी संख्या खाड़ी देशों में काम करती है। ये प्रवासी हर साल भारत में भारी मात्रा में remittance भेजते हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत सहारा देता है।

इन प्रवासी भारतीयों ने भारत और खाड़ी देशों के बीच एक जीवंत सेतु का काम किया है। यही कारण है कि दोनों पक्षों के रिश्ते केवल सरकारों तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों के स्तर पर भी मजबूत हैं।

क्यों अटकी थी प्रक्रिया

भारत और GCC के बीच पहले भी दो दौर की वार्ता हो चुकी थी, लेकिन 2008 के बाद यह प्रक्रिया रुक गई। शुल्क में कटौती, निवेश सुरक्षा और समूह की आंतरिक प्राथमिकताओं पर मतभेद के चलते बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई। अब निवेश संधि और व्यापार समझौते को अलग अलग रास्ते पर रखकर गतिरोध तोड़ने की कोशिश की गई है।

इसके साथ ही वैश्विक परिस्थितियां भी बदल चुकी हैं। supply chain diversification, ऊर्जा सुरक्षा और नए बाजारों की तलाश ने सभी देशों को नए विकल्पों की ओर देखने के लिए मजबूर किया है।

EU और America के बाद खाड़ी की बारी

भारत ने हाल के महीनों में यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं में उल्लेखनीय प्रगति दिखाई है। यही वजह है कि खाड़ी देशों के साथ नई पहल को एक बड़े रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। अब भारत व्यापार समझौतों को केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि उन्हें geopolitical tool के रूप में भी इस्तेमाल कर रहा है।

आज की दुनिया में ताकत का मतलब सिर्फ सैन्य क्षमता नहीं रह गया है। बाजार, ऊर्जा मार्ग और आपूर्ति शृंखलाएं ही असली शक्ति बन चुकी हैं। जो देश इन क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करता है, वही भविष्य में निर्णायक भूमिका निभाएगा।

भारत की बदलती व्यापार नीति

लंबे समय तक भारत की व्यापार नीति सतर्क और कई बार संकोची रही है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। वैश्विक शक्ति बनने के लिए भारत को अपने बाजार खोलने होंगे और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ गहरे रिश्ते बनाने होंगे। खाड़ी क्षेत्र इसमें एक स्वाभाविक साथी है क्योंकि यहां ऊर्जा है, पूंजी है, निवेश की क्षमता है और भारत के लिए काम करने वाली विशाल जनशक्ति भी मौजूद है।

यह समझौता भारत को पश्चिम एशिया में रणनीतिक रूप से और मजबूत करेगा। यही वह क्षेत्र है जहां चीन भी बंदरगाहों, ऊर्जा परियोजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के जरिए अपनी पकड़ बढ़ा रहा है।

सावधानी भी उतनी ही जरूरी

हालांकि इस उत्साह के बीच सावधानी बरतना भी जरूरी है। मुक्त व्यापार समझौते का मतलब है अपने बाजार को विदेशी उत्पादों के लिए खोलना। अगर घरेलू उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हुए, तो सस्ता आयात कई सेक्टरों पर दबाव डाल सकता है। इसलिए सरकार के लिए जरूरी है कि वह केवल समझौते पर हस्ताक्षर करने की जल्दी न करे, बल्कि घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाने पर भी उतना ही ध्यान दे।

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