बेगूसराय जिले के बछवाड़ा प्रखंड स्थित चमथा दियारा क्षेत्र में गंगा नदी का कटाव ग्रामीणों के लिए गंभीर चिंता का कारण बन गया है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद नदी के किनारों पर कटाव तेज होने से किसानों की उपजाऊ जमीन पर संकट मंडराने लगा है। कई स्थानों पर कटाव का खतरा खेतों से आगे बढ़कर रिहायशी इलाकों के करीब पहुंच रहा है। इससे स्थानीय परिवारों को एक बार फिर अपना घर और पुश्तैनी जमीन गंवाने का डर सताने लगा है। करीब तीन दशक पहले भी इस क्षेत्र के अनेक परिवारों को कटाव के कारण विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा था। अब मौजूदा हालात ने उनकी पुरानी चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया है।
ग्रामीणों के अनुसार, चमथा पंचायत-3 के पंचखुटी, चिरैयाटोक, वसुलियाटोल, नंबर गांव और विशनपुर के आसपास गंगा का कटाव लगातार जारी है। हरपाटे और चिरैयाटोक से वसुलियाटोल तक लगभग आठ किलोमीटर के क्षेत्र में नदी का कटाव होने की बात सामने आई है। स्थानीय लोगों का दावा है कि प्रतिदिन कई एकड़ जमीन नदी में समा रही है। यदि कटाव की रफ्तार पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो आने वाले दिनों में खेती की जमीन के साथ आबादी वाले इलाकों की सुरक्षा भी चुनौती बन सकती है।
गंगा के कटाव की यह समस्या ऐसे समय में सामने आई है, जब इलाके के लोग हाल में आई बाढ़ से हुए नुकसान से उबरने की कोशिश कर रहे हैं। चमथा पंचायत-1, पंचायत-2, पंचायत-3, विशनपुर और दादुपुर सहित आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया था। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 60 हजार की आबादी बाढ़ से प्रभावित हुई थी। कई परिवारों को अपने घर छोड़कर ऊंचे स्थानों पर शरण लेनी पड़ी थी। बाढ़ का पानी निकलने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि अब स्थिति सामान्य होगी, लेकिन गंगा के कटाव ने उनके सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।
चमथा दियारा क्षेत्र में खेती बड़ी संख्या में परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार है। यहां के किसान अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं। खेतों में लगी फसल से होने वाली कमाई से ही बच्चों की पढ़ाई, घरेलू जरूरतों और अगली फसल की तैयारी का खर्च निकलता है। ऐसे में जब नदी धीरे-धीरे जमीन को अपने भीतर समेटने लगती है, तो किसानों के सामने केवल जमीन खोने का ही संकट नहीं रहता, बल्कि उनकी आर्थिक सुरक्षा भी प्रभावित होने लगती है।
किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि बाढ़ के कारण पहले ही फसलों को नुकसान पहुंच चुका है। अब कटाव की वजह से खेती योग्य जमीन का क्षेत्रफल घटने का खतरा है। जिन परिवारों के पास सीमित जमीन है, उनके लिए थोड़ी-सी जमीन का नुकसान भी लंबे समय तक आर्थिक परेशानी पैदा कर सकता है। ग्रामीणों को आशंका है कि यदि गंगा की धारा इसी तरह किनारों को काटती रही, तो आने वाले समय में खेती करना और परिवार की जरूरतें पूरी करना और मुश्किल हो जाएगा।
कटाव का खतरा अब केवल खेतों तक सीमित नहीं रहने से ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है। नदी के किनारे बसे परिवारों के लिए घरों की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल बन गई है। लोगों को डर है कि यदि कटाव आबादी के करीब पहुंच गया, तो उन्हें अपने घरों से सामान समेटकर सुरक्षित स्थान की तलाश करनी पड़ सकती है। जिन परिवारों ने वर्षों की मेहनत से घर बनाए हैं और पीढ़ियों से एक ही इलाके में रह रहे हैं, उनके लिए विस्थापन की आशंका मानसिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर परेशानी बढ़ाने वाली है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, कटाव रोकने के लिए कुछ महीने पहले विभिन्न स्थानों पर बचाव कार्य भी कराए गए थे। हालांकि, ग्रामीणों का दावा है कि कुछ जगहों पर ये सुरक्षा कार्य क्षतिग्रस्त हो गए, जिसके बाद जमीन को बचाने की चिंता फिर बढ़ गई। लोगों का कहना है कि केवल अस्थायी उपायों से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा है। जरूरत इस बात की है कि कटाव प्रभावित क्षेत्रों का तकनीकी आकलन कराकर ऐसे उपाय किए जाएं, जो नदी के दबाव को देखते हुए लंबे समय तक प्रभावी रह सकें।
चमथा के लोगों के लिए गंगा का कटाव पुराना दर्द है। करीब तीन दशक पहले भी नदी के कटाव के कारण सैकड़ों परिवारों को अपना घर और जमीन छोड़नी पड़ी थी। रिपोर्ट के अनुसार, नंबर गांव और पंचखुटी जैसे इलाकों के कई परिवार पहले भी विस्थापन का सामना कर चुके हैं। जमीन और घर गंवाने के बाद कुछ परिवारों के पुनर्वास को लेकर उम्मीदें अब भी बनी हुई हैं। ऐसे में वर्तमान स्थिति ने उन परिवारों के भीतर फिर से असुरक्षा की भावना
ग्रामीणों की मांग है कि गंगा के कटाव से प्रभावित पूरे क्षेत्र का निरीक्षण कराया जाए और संवेदनशील स्थानों पर तत्काल प्रभावी बचाव कार्य शुरू किए जाएं। उनका कहना है कि नदी के किनारे बसे घरों और खेतों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, पहले कराए गए कटावरोधी कार्यों की स्थिति की समीक्षा कर यह पता लगाया जाना चाहिए कि वे किन स्थानों पर क्षतिग्रस्त हुए और उनकी मरम्मत या मजबूती के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने चुनौती केवल वर्तमान कटाव को रोकने की नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाले नुकसान को कम करने की भी है। इसके लिए नदी के प्रवाह, किनारों की स्थिति और कटाव की गति का आकलन महत्वपूर्ण होगा। जिन इलाकों में घरों तक खतरा पहुंचने की आशंका है, वहां रहने वाले परिवारों को समय रहते स्थिति की जानकारी देना और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित स्थानों की व्यवस्था करना भी जरूरी है।
फिलहाल, चमथा दियारा के ग्रामीणों की नजर कटावरोधी उपायों पर टिकी है। किसान चाहते हैं कि उनकी बची हुई उपजाऊ जमीन सुरक्षित रहे और परिवारों को दोबारा विस्थापन की पीड़ा न झेलनी पड़े। बाढ़ और कटाव की दोहरी मार से जूझ रहे लोगों के लिए आने वाले दिन महत्वपूर्ण होंगे। यदि समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाते हैं, तो जमीन और आबादी को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है। ग्रामीणों को अब ऐसे ठोस उपायों का इंतजार है, जो उनकी पुश्तैनी जमीन, घर और आजीविका को सुरक्षित रखने में कारगर साबित हों।









