बिहार चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी एग्जिट पोल्स में 0 से 2 सीटों तक सिमटी। कमजोर संगठन, गलत टिकट वितरण, जातीय राजनीति और सोशल मीडिया पर अति-निर्भरता पार्टी की हार की बड़ी वजह बनी।
पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के एग्जिट पोल्स ने प्रशांत किशोर (PK) की पार्टी जनसुराज (JSP) को करारा झटका दिया है। लगभग सभी प्रमुख एग्जिट पोल्स एक्सिस माई इंडिया, सी-वोटर, चाणक्य और मैट्रिज ने जनसुराज को 0 से 2 सीटों के बीच सीमित बताया है। वोट प्रतिशत भी मात्र 10 से 12 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान है। यह प्रदर्शन उस हाइप के ठीक उलट है जो पार्टी ने शुरुआत में बनाई थी।
एनडीए की मजबूत वापसी में जनसुराज गायब
पोल ऑफ एग्जिट पोल्स में भी जनसुराज का प्रदर्शन नगण्य बताया गया है। वहीं एनडीए के लिए 135 से 160 सीटों की भविष्यवाणी की गई है, जिससे जनसुराज का प्रभाव लगभग शून्य दिख रहा है। सोशल मीडिया पर शुरुआती चर्चा के बावजूद पार्टी का असर जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं दिया। कई इंफ्लूएंसर्स ने इसे फ्लॉप शो करार दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषक ओमप्रकाश अश्क का कहना है कि जनसुराज की असफलता बिहार की जातीय राजनीति की जड़ों को दर्शाती है। उनके अनुसार, “बिना मजबूत स्थानीय आधार के कोई नई पार्टी बिहार में टिक नहीं सकती।” पीके के पुराने सहयोगियों ने भी माना कि टिकट वितरण की गड़बड़ी और संगठन की कमजोरी ने पार्टी की नींव हिला दी। कई कार्यकर्ता नाराज हुए और चुनाव के दौरान सक्रिय नहीं रहे।
गलत फीडबैक और आंतरिक भ्रम
पीके से जुड़े एक पुराने साथी ने बताया कि कुछ लोगों ने गलत फीडबैक देकर पार्टी नेतृत्व को भ्रम में रखा। कई सक्रिय कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं दिया गया, जबकि बाहरी लोगों को सीधे टिकट दे दिए गए। इससे संगठनात्मक असंतोष बढ़ा और जमीनी नेटवर्क कमजोर हुआ।
युवाओं की हाइप नहीं बनी वोट
राजनीतिक टिप्पणीकार डॉ. शोभित सुमन ने कहा कि प्रशांत किशोर की रणनीति युवाओं पर केंद्रित थी, लेकिन सोशल मीडिया की हाइप वोट में तब्दील नहीं हो सकी। यह “Digital vs Ground Reality” का क्लासिक उदाहरण है।
11 बड़ी वजहें जिनसे पीके का प्रयोग फेल हुआ
1. ग्रामीण इलाकों में कम पहुंच
बिहार की अधिकांश आबादी ग्रामीण है, लेकिन जनसुराज की पहुंच सीमित रही। ग्रामीण मतदाताओं को पार्टी के उम्मीदवारों और चुनाव चिह्न तक की जानकारी नहीं थी, जिससे वोट ट्रांसफर नहीं हो सका।
2. अनटेस्टेड पार्टी की छवि
मतदाताओं ने जनसुराज को “Unproven Party” के रूप में देखा। कई लोगों को लगा कि इस पार्टी को वोट देना जोखिम भरा कदम है, क्योंकि इसका कोई ट्रैक रिकॉर्ड नहीं है।
3. प्रशांत किशोर का खुद चुनाव न लड़ना

पार्टी संस्थापक प्रशांत किशोर के खुद मैदान में नहीं उतरने से मतदाताओं में निराशा फैल गई। कई लोगों ने कहा कि “जब नेता खुद चुनाव नहीं लड़ता, तो जनता उसे गंभीरता से क्यों ले।”
4. बीजेपी की बी-टीम की छवि
विपक्षी दलों ने जनसुराज को बीजेपी की बी-टीम बताया। सोशल मीडिया पर पार्टी को एनडीए वोटों को बांटने वाली “Spoiler Party” कहा गया, जिससे पार्टी की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
5. उम्मीदवारों का नामांकन वापस लेना
कम से कम तीन उम्मीदवारों ने नामांकन वापस ले लिया, जिसे पीके ने बीजेपी के दबाव का परिणाम बताया। इससे पार्टी की अंदरूनी कमजोरी उजागर हुई और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा।
6. जातीय समीकरणों में न घुस पाना
बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों पर टिकी है। जनसुराज इन पर असर नहीं डाल सकी। मतदाता पारिवारिक और सामुदायिक आधार पर वोट करते रहे।
7. तीसरे मोर्चे की असफल कोशिश
बिहार में मुकाबला दोध्रुवीय रहा — एनडीए बनाम महागठबंधन। जनसुराज तीसरा विकल्प बनने की कोशिश में थी, लेकिन वोट बैंक के अभाव में उसे जगह नहीं मिल सकी।
8. सरकारी योजनाओं का असर
नीतीश कुमार की योजनाओं — महिलाओं को पैसा ट्रांसफर, बुजुर्गों की पेंशन, मुफ्त बिजली — ने जनता को एनडीए की ओर आकर्षित किया। इससे जनसुराज का युवा आधार कमजोर पड़ा।
9. स्थानीय नेतृत्व की कमी
पार्टी में कोई मजबूत लोकप्रिय चेहरा नहीं था। स्थानीय नेताओं के अभाव में जनसुराज की अपील सीमित रह गई।
10. सोशल मीडिया पर अधिक भरोसा
जनसुराज ने सोशल मीडिया प्रचार पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई, लेकिन यह हाइप ग्राउंड वोट में तब्दील नहीं हुई। ग्रामीण इलाकों तक संदेश नहीं पहुंचा, जिससे पार्टी की वास्तविक ताकत नहीं बन पाई।
11. बूथ लेवल पर कमजोर पकड़
चुनाव के समय पार्टी अपने BLA (Booth Level Agents) खोज रही थी। कई बूथों पर JSP का कोई प्रतिनिधि मौजूद ही नहीं था। यह संगठनात्मक ढिलाई पार्टी के पतन की बड़ी वजह बनी।
सोशल मीडिया के हवाबाज बने मुसीबत
इंटरनेट मीडिया विश्लेषक राजेश यादव का कहना है कि 8 से 10 प्रतिशत वोट शेयर भविष्य के लिए उम्मीद जगाता है, लेकिन केवल सोशल मीडिया पर भरोसा करना राजनीतिक आत्मघात है। उन्होंने कहा, “इमोशन कनेक्ट सिर्फ जमीनी काम से ही बनता है, डिजिटल प्रचार से नहीं।”











