ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल पार करने से भारत की चिंता बढ़ गई है। आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था पर दबाव, करंट अकाउंट डेफिसिट और महंगाई का जोखिम बढ़ा है। वैश्विक ब्रोकरेज फर्म्स ऊर्जा कीमतों के असर का आकलन कर रही हैं।
बिज़नेस न्यूज़: अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिख रहा है। ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुका है। यह तेजी ऐसे समय आई है जब भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में हर उछाल भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाता है।
तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से करंट अकाउंट डेफिसिट, महंगाई और करेंसी स्टेबिलिटी पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि जेपी मॉर्गन, मॉर्गन स्टेनली, गोल्डमैन सैक्स, मैक्वेरी, बर्नस्टीन, HSBC, DBS और नोमुरा जैसी ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म्स भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर इसके प्रभाव का आकलन कर रही हैं।
आयात बिल बढ़ने का सीधा खतरा
भारत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल मिडिल ईस्ट से आता है। इन शिपमेंट का एक महत्वपूर्ण भाग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरता है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल ट्रांजिट पॉइंट्स में से एक है।
यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो भारत का इम्पोर्ट बिल तेजी से बढ़ेगा। इससे करंट अकाउंट डेफिसिट में इजाफा होगा। करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने का मतलब है कि देश से बाहर जाने वाला पैसा अंदर आने वाले पैसे से ज्यादा हो रहा है। इसका असर रुपये पर भी पड़ सकता है।
ब्रोकरेज रिपोर्ट्स के अनुसार यदि एनर्जी की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो कैपिटल फ्लो पर भी दबाव बन सकता है। विदेशी निवेशक अस्थिर माहौल में सतर्क रुख अपनाते हैं, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट क्यों बड़ी टेंशन
जेपी मॉर्गन के मुताबिक सबसे अहम सवाल यह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाली सप्लाई बाधित होती है या नहीं। अगर संघर्ष सीमित रहता है और तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है तो जोखिम कम हो सकता है।
लेकिन अगर इस समुद्री मार्ग में रुकावट आती है तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ेगा। गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि मौजूदा समय में क्रूड मार्केट में करीब 18 डॉलर प्रति बैरल का रियल टाइम रिस्क प्रीमियम जुड़ा हुआ है। यह एक महीने तक पूरी तरह सप्लाई रुकने की आशंका के बराबर माना जा रहा है।
दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल सप्लाई और करीब 19 प्रतिशत LNG फ्लो इसी स्ट्रेट से होकर गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा वैश्विक ऊर्जा बाजार को झटका दे सकती है।
गैस इम्पोर्ट कॉस्ट पर भी असर
भारत केवल कच्चे तेल पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि LNG इम्पोर्ट भी करता है। यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट आती है तो गैस इम्पोर्ट कॉस्ट भी बढ़ सकती है। इससे बिजली उत्पादन और उर्वरक जैसे सेक्टर्स की लागत बढ़ सकती है।
जेपी मॉर्गन के अनुसार कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के एक्सटर्नल बैलेंस पर दबाव डालेंगी। हालांकि ब्रोकरेज ने अभी GDP रिवीजन का संकेत नहीं दिया है, लेकिन एनर्जी कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति भारत की संवेदनशीलता को रेखांकित किया है।
महंगाई और ग्रोथ पर संभावित असर
नोमुरा का मानना है कि एशिया में भारत उन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जो तेल कीमतों के झटके से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। इसका कारण है आयात पर उच्च निर्भरता।
नोमुरा के अनुमान के अनुसार तेल कीमतों में हर 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी से भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट GDP का लगभग 0.4 प्रतिशत बढ़ सकता है। यह एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है क्योंकि इससे वित्तीय स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
आम तौर पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतें महंगाई बढ़ाती हैं और आर्थिक ग्रोथ को धीमा करती हैं। हालांकि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पूरी तरह बाजार आधारित नहीं हैं। तेल मार्केटिंग कंपनियां कभी-कभी कीमतों में तुरंत बदलाव नहीं करतीं और झटके का कुछ हिस्सा खुद वहन करती हैं।
मौजूदा व्यवस्थाओं के तहत ग्रोथ और महंगाई पर लगभग 0.1 प्रतिशत पॉइंट का सीमित असर रहने का अनुमान है। फिर भी यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो असर गहरा हो सकता है।










