यूपी में कांशीराम जयंती पर अखिलेश यादव की योजना: क्या दलित वोट बैंक में सपा दोहरा पाएगी 2024 का करिश्मा?

यूपी में कांशीराम जयंती पर अखिलेश यादव की योजना: क्या दलित वोट बैंक में सपा दोहरा पाएगी 2024 का करिश्मा?

उत्तर प्रदेश की सियासत में 15 मार्च को कांशीराम जयंती के अवसर पर समाजवादी पार्टी (सपा) ने प्रदेश भर में पीडीए दिवस मनाने का ऐलान किया है। अखिलेश यादव द्वारा पार्टी पदाधिकारियों को भेजे गए पत्र में इस दिन सभी जिलों में श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन करने का निर्देश दिया गया है।

लखनऊ: समाजवादी पार्टी अब बसपा के संस्थापक कांशीराम की जयंती (15 मार्च) को पीडीए दिवस के रूप में मनाने जा रही है। इसके तहत अखिलेश यादव ने पार्टी पदाधिकारियों को पत्र भेजकर निर्देश दिया है कि प्रदेश के सभी जिलों में श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन किया जाए। इस कदम को सपा की तरफ से दलित वोटों को अपने पाले में लामबंद करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। 

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोटों (पीडीए) को आंशिक तौर पर जोड़ने में सफल रही थी, जिससे पार्टी ने 37 सीटों पर जीत हासिल की और उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बन गई।

कांशीराम को हथियार बना रही सपा

अखिलेश यादव इस बार उसी 2024 के समीकरण को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। उनका उद्देश्य है कि दलित मतदाताओं के बीच यह संदेश जाए कि सपा और कांशीराम के बीच पुराना नाता रहा है। 1992 के राम मंदिर प्रकरण के समय, भाजपा अजेय मानी जा रही थी, तब सपा-बसपा ने हाथ मिला कर यूपी की सियासत बदल दी थी।

कांशीराम ने दलित-पिछड़ी जातियों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी, जिससे मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनने का रास्ता मिला। अखिलेश यादव अब उसी इतिहास और करिश्मा का स्मरण कराते हुए दलित वोटों को फिर से जुटाने की रणनीति बना रहे हैं।

मायावती ने सपा की योजना को बताया 'सियासी नौटंकी'

बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा की इस कोशिश पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे “सियासी नौटंकी” कहा है। उन्होंने लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाकर बताया कि सपा ने कभी दलित हितैषी न होकर सियासी लाभ के लिए कांशीराम का इस्तेमाल किया। मायावती का तर्क है कि सपा ने सियासत के खतरे में आते ही दलित समुदाय की सबसे बड़ी नेता यानी स्वयं मायावती पर भी हमला किया था। इस कांड को याद दिलाकर वह अपने दलित समर्थकों को सपा से दूर रखना चाहती हैं।

2024 का समीकरण और उसका असर

2024 में सपा को दलितों का समर्थन मिला था क्योंकि:

  • मायावती की राजनीतिक सक्रियता कम थी, जिससे कुछ बसपा वोट बैंक सपा की ओर आए।
  • राहुल गांधी के आरोपों ने भाजपा पर दलित मतदाताओं में शक पैदा किया।
  • भाजपा नेताओं के विवादित बयान ने दलित मतदाताओं को इंडिया गठबंधन (सपा-कांग्रेस) की ओर आकर्षित किया।

इससे सपा-कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता मिली थी, और यूपी में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि, अब परिस्थितियां बदल गई हैं। मायावती फिर सक्रिय हैं, लखनऊ में बड़ी रैली कर सपा को चुनौती दे चुकी हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस के पास फिलहाल कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, जिससे 2024 जैसी लहर पैदा हो सके।

भाजपा भी पिछली गलती सुधारने की कोशिश कर रही है, जिससे सपा की राह कठिन हुई है। राजनीति विशेषज्ञों का कहना है कि दलित वोट बैंक तब तक सपा की ओर झुकेगा, जब मायावती मैदान में नहीं होंगी और भाजपा समर्थक प्रभाव कमजोर दिखे।

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