ईरान-इजराइल युद्ध से ब्रेंट और अमेरिकी क्रूड की कीमतें बढ़ीं, भारत में तेल आपूर्ति सुरक्षित

ईरान-इजराइल युद्ध से ब्रेंट और अमेरिकी क्रूड की कीमतें बढ़ीं, भारत में तेल आपूर्ति सुरक्षित

ईरान-इजराइल युद्ध के बाद तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में तेज़ी आई है। भारत में आपातकालीन तेल स्टॉक और वैकल्पिक आपूर्ति विकल्प मौजूद हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा फिलहाल सुरक्षित है।

Oil Prices Surge Impact: मिडिल ईस्ट में ईरान और इजराइल के बीच जारी तनाव के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल बढ़ गई है। अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर लगातार हमलों के बाद होर्मुज स्ट्रेट और आसपास के क्षेत्रों में स्थिति तनावपूर्ण है। इस तनाव का असर तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों पर दिख रहा है और एशियाई बाजार खुलते ही ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी क्रूड की कीमतों में तेजी आई।

सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 12 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। वहीं, अमेरिकी क्रूड लगभग 12 प्रतिशत बढ़कर 75 डॉलर प्रति बैरल हो गया। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट की कीमत भी 8 प्रतिशत बढ़कर 72 डॉलर पर पहुंची। इस तेजी के कारण भारत में तेल की सप्लाई और कीमतों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

भारत के लिए तत्काल खतरों का आकलन

विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल भारत को तेल की सप्लाई में तत्काल रुकावट की चिंता नहीं है। भारतीय रिफाइनर कंपनियों के पास 10 दिनों का कच्चे तेल का स्टॉक मौजूद है, जिससे आपातकालीन स्थिति में भी काम चलाया जा सकता है। इसके अलावा फ्यूल स्टॉक लगभग 5-7 दिनों की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

यदि मिडिल ईस्ट से सप्लाई में कोई अस्थायी रुकावट आती है, तब भी भारत के पास प्लान-बी मौजूद है। इसके तहत देश अमेरिका, वेस्ट अफ्रीका, रूस और लैटिन अमेरिका जैसे देशों से तेल आयात बढ़ा सकता है। यह रणनीति भारत को केवल मिडिल ईस्ट पर निर्भर नहीं रहने देती और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाती है।

रणनीतिक विकल्प और स्टॉक का महत्व

विशेषज्ञ बताते हैं कि अमेरिका के दबाव में भारत ने पहले रूस से तेल की खरीद में कटौती की थी, लेकिन यदि मिडिल ईस्ट में कोई समस्या आती है तो भारत फिर से रूस से आयात बढ़ा सकता है। इसके लिए ट्रांजिट टाइम की चुनौती है। मिडिल ईस्ट से भारत तक तेल पहुंचने में लगभग पांच दिन लगते हैं, जबकि रूस से आने में कम से कम एक महीना लगता है।

इसके अलावा भारत के पास स्ट्रेटेजिक रिजर्व का विकल्प भी है। इसमें देश की तेल जरूरत के लिए एक हफ्ते का स्टॉक रखा गया है, जिसे आपात स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह रणनीति तेल की कीमतों और अंतर्राष्ट्रीय संकट से निपटने में मददगार साबित होगी।

बढ़ती कीमतों का आर्थिक असर

तेल की बढ़ती कीमतों से घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है, लेकिन भारत का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार इस चुनौती का मुकाबला करने में सहायक है। देश के पास लगभग 720-730 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, जो रुपये की अस्थिरता या तेल की कीमतों में तेजी से निपटने में मदद करता है।

फरवरी 2026 में 1.83 लाख करोड़ रुपये का जीएसटी संग्रह इस बात का सबूत है कि देश में आर्थिक गतिविधियां मजबूत हैं और घरेलू मांग अच्छी है। इसका अर्थ यह है कि वैश्विक बाजार में अचानक हुए झटकों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर नियंत्रित रहेगा।

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