BMC पर किसका झंडा? मेयर पद को लेकर महायुति में अंदरूनी जंग शुरू

BMC पर किसका झंडा? मेयर पद को लेकर महायुति में अंदरूनी जंग शुरू

BMC मेयर पद को लेकर महायुति में सियासी खींचतान तेज हो गई है। BJP सबसे बड़ी पार्टी होने के आधार पर दावा कर रही है, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना मुंबई पर पारंपरिक हक जता रही है।

BMC Election: देश की सबसे अमीर नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी BMC एक बार फिर सियासी घमासान का केंद्र बन गई है। मुंबई मेयर पद को लेकर महायुति के भीतर खींचतान अब खुलकर सामने आ चुकी है। भारतीय जनता पार्टी और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना दोनों ही इस कुर्सी को अपना हक बता रही हैं। चुनावी नतीजों के बाद अब असली लड़ाई सत्ता के बंटवारे को लेकर शुरू हो गई है।

मुंबई मेयर कुर्सी का महत्व

मुंबई मेयर पद सिर्फ एक संवैधानिक पद नहीं है। यह देश की सबसे ताकतवर स्थानीय सत्ता का प्रतीक माना जाता है। BMC का बजट कई भारतीय राज्यों से भी ज्यादा है। सड़कें, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, हाउसिंग, ट्रांसपोर्ट जैसे अहम फैसले इसी नगर निगम से जुड़े होते हैं। यही वजह है कि हर राजनीतिक दल इस कुर्सी पर अपना कब्जा चाहता है।

महायुति के भीतर तनाव

बीजेपी और शिंदे गुट की शिवसेना ने मिलकर BMC चुनाव लड़ा था। दोनों दलों को मिलाकर बहुमत भी हासिल हो चुका है। इसके बावजूद अब मेयर पद को लेकर आपसी सहमति बनती नहीं दिख रही है। गठबंधन में रहते हुए भी दोनों दल अपनी अलग राजनीतिक मजबूती दिखाने में लगे हुए हैं। यही तनाव आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

क्या कहते हैं चुनावी आंकड़े

BMC चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। पार्टी को कुल 89 सीटें मिली हैं। वहीं एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 29 सीटों पर जीत हासिल हुई है। बहुमत के लिए जरूरी 114 सीटों का आंकड़ा दोनों दल मिलकर पार कर चुके हैं। ऐसे में सत्ता पर महायुति का दावा मजबूत है, लेकिन सवाल यह है कि मेयर कौन बनेगा।

बीजेपी का दावा मजबूत क्यों

बीजेपी का कहना है कि उसे सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संख्या का महत्व सबसे ज्यादा होता है। पार्टी का तर्क है कि जब सबसे बड़ा दल वही है तो मेयर पद पर पहला अधिकार भी उसी का बनता है। बीजेपी मुंबई में पहली बार अपना मेयर बनाने का सपना देख रही है और इसे राजनीतिक रूप से ऐतिहासिक अवसर मान रही है।

शिवसेना की पारंपरिक दावेदारी

एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना सीटों के मामले में पीछे जरूर है, लेकिन उसका दावा भावनात्मक और राजनीतिक दोनों आधारों पर है। शिवसेना का कहना है कि मुंबई उसकी पारंपरिक राजनीतिक जमीन रही है। दशकों तक BMC पर शिवसेना का ही वर्चस्व रहा है। प्रशासनिक अनुभव और स्थानीय पकड़ के आधार पर पार्टी मेयर पद अपने पास रखना चाहती है।

दिल्ली बैठक से बढ़ी हलचल

इस सियासी खींचतान के बीच दिल्ली में हुई एक अहम बैठक ने चर्चाओं को और तेज कर दिया। शिवसेना के पूर्व सांसद राहुल शेवाले ने देर रात बीजेपी नेताओं से मुलाकात की। उनकी बैठक बीजेपी नेता अमित साटम के साथ हुई। माना जा रहा है कि इस मुलाकात में BMC मेयर पद और वैधानिक समितियों के बंटवारे को लेकर बातचीत हुई।

वैधानिक समितियों का खेल

BMC में सिर्फ मेयर पद ही नहीं बल्कि वैधानिक समितियां भी सत्ता का बड़ा केंद्र होती हैं। स्थायी समिति, शिक्षा समिति, सुधार समिति जैसी इकाइयों के पास वित्तीय और प्रशासनिक ताकत होती है। दोनों दल इन समितियों पर भी अपना नियंत्रण चाहते हैं। यही वजह है कि बातचीत सिर्फ एक पद तक सीमित नहीं है।

समझौते की तलाश

महायुति के भीतर दोनों दल यह भी जानते हैं कि खुला टकराव गठबंधन को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए पर्दे के पीछे समझौते की कोशिशें जारी हैं। संभावना है कि मेयर पद एक दल को और उपमेयर या अहम समितियां दूसरे दल को देकर संतुलन बनाया जाए। हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक फार्मूला सामने नहीं आया है।

मुंबई सिर्फ महाराष्ट्र की राजधानी नहीं बल्कि देश की आर्थिक राजधानी भी है। यहां की नगर निगम पर नियंत्रण का मतलब है बड़े स्तर पर राजनीतिक प्रभाव। BMC के फैसले सीधे आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि हर पार्टी यहां अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।

एकनाथ शिंदे की रणनीति

मुख्यमंत्री बनने के बाद एकनाथ शिंदे अपनी पार्टी को मजबूत करने में जुटे हैं। BMC मेयर पद उनके लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। शिवसेना यह संदेश देना चाहती है कि भले ही सत्ता राज्य में बीजेपी के साथ साझा हो, लेकिन मुंबई में उसकी भूमिका कमजोर नहीं हुई है।

बीजेपी पिछले कई वर्षों से मुंबई में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी का मानना है कि अब समय आ गया है जब मुंबई मेयर पद पर उसका झंडा लहराए। यह न सिर्फ महाराष्ट्र बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी पार्टी की ताकत को दिखाएगा।

दोनों दल एक-दूसरे के बिना सत्ता में नहीं रह सकते। बहुमत का गणित यही बताता है कि अलग-अलग चलना फिलहाल संभव नहीं है। इसलिए अंतिम फैसला बातचीत और समझौते से ही निकलेगा। सवाल सिर्फ यह है कि कौन कितना झुकेगा।

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