कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच चल रहे विवाद पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने आरोप लगाया कि उसे निर्धारित मात्रा में कावेरी का पानी नहीं मिल रहा है और राज्य को करीब 20 टीएमसी पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
नई दिल्ली: कावेरी जल विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। तमिलनाडु ने कावेरी नदी से मिलने वाले पानी में कमी का आरोप लगाते हुए अदालत से अपने हिस्से का पानी सुनिश्चित कराने की मांग की है। राज्य का दावा है कि उसे करीब 20 टीएमसी पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक को तमिलनाडु की याचिका पर एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को प्रस्तावित है।
तमिलनाडु ने 20 टीएमसी पानी की कमी का दावा किया
सुनवाई के दौरान तमिलनाडु की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि राज्य को निर्धारित मात्रा के अनुरूप कावेरी का पानी नहीं मिल रहा है। इसके कारण शुरुआती खरीफ फसल पर असर पड़ा है और किसानों को नुकसान उठाना पड़ा है। तमिलनाडु ने अदालत के सामने पानी की कमी का आंकड़ा करीब 20 टीएमसी बताया। टीएमसी यानी Thousand Million Cubic Feet पानी की मात्रा मापने की एक इकाई है। राज्य की मांग है कि पिछली कमी की भरपाई के लिए भी उचित व्यवस्था की जाए, ताकि कावेरी पर निर्भर कृषि क्षेत्र को पर्याप्त पानी मिल सके।
तमिलनाडु ने यह भी कहा कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) को पानी की कमी से संबंधित शिकायत पर स्पष्ट फैसला लेना चाहिए। राज्य का तर्क है कि केवल मौजूदा अवधि के लिए पानी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पहले हुई कमी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
कर्नाटक ने सूखे जैसी स्थिति का हवाला दिया
कर्नाटक की ओर से अदालत में अलग स्थिति रखी गई। राज्य ने कहा कि वह CWMA के निर्देशों के अनुसार पानी छोड़ रहा है। कर्नाटक ने अपने यहां कम बारिश और जल उपलब्धता से जुड़ी परिस्थितियों का हवाला देते हुए बताया कि राज्य भी सूखे जैसी स्थिति से गुजर रहा है। कर्नाटक का कहना है कि जलाशयों में पानी की आवक, उपलब्ध जल और वर्षा की स्थिति जैसे पहलुओं की जानकारी CWMA के सामने रखी गई है। प्राधिकरण इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मामले पर विचार कर रहा है।
रिपोर्टों में कर्नाटक की ओर से पानी की कमी का आकलन लगभग 16 टीएमसी बताया गया है। हालांकि, तमिलनाडु की ओर से अदालत के समक्ष करीब 20 टीएमसी की कमी का दावा किया गया है। दोनों राज्यों के आकलन में अंतर इस विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

CWMA की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी पक्ष को अपनी शिकायत संबंधित वैधानिक प्राधिकरण के सामने रखने और उस पर निर्णय प्राप्त करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि तमिलनाडु ने पानी की कमी से जुड़ी शिकायत रखी है और CWMA को उस पर विचार करना होगा।
अदालत के निर्देश के मुताबिक, कर्नाटक को तमिलनाडु की याचिका पर एक सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा। इसके बाद मामले में आगे की सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा कार्रवाई फिलहाल दोनों राज्यों के दावों और संबंधित प्राधिकरण की भूमिका पर केंद्रित है।
6,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश
इस विवाद की पृष्ठभूमि में CWMA की ओर से सितंबर में दिया गया पानी छोड़ने का निर्देश भी महत्वपूर्ण है। कर्नाटक को 9 से 23 सितंबर तक प्रतिदिन 6,000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु की ओर प्रवाहित सुनिश्चित करने को कहा गया था। तमिलनाडु ने इसी अवधि में हुई कथित कमी और इससे पहले की कमी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। राज्य चाहता है कि कमी की भरपाई के लिए भी उचित निर्देश दिए जाएं।











