चतरा में भारी बारिश से मुर्गा फार्म ढहा, 900 मुर्गों की मौत; व्यवसायी को 15 लाख तक का नुकसान, मुआवजे की मांग

चतरा के कसमार गांव में भारी बारिश से मुर्गा फार्म ढह गया। करीब 900 मुर्गों की मौत हुई और व्यवसायी साधु यादव ने 10-15 लाख के नुकसान का दावा कर मुआवजा मांगा।
चतरा में भारी बारिश से मुर्गा फार्म ढहा, 900 मुर्गों की मौत; व्यवसायी को 15 लाख तक का नुकसान, मुआवजे की मांग
Photo Credit / Attribution: Google

चतरा जिले में लगातार हो रही बारिश के बीच प्रतापपुर प्रखंड के कसमार गांव में एक बड़ा हादसा हो गया। भारी बारिश के कारण एक मुर्गा फार्म अचानक ढह गया। फार्म के अंदर मौजूद करीब 900 मुर्गे मलबे में दब गए, जिससे उनकी मौत हो गई। हादसे के बाद फार्म संचालक और उसके परिवार के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। व्यवसायी साधु यादव के अनुसार, इस घटना में उन्हें करीब 10 से 15 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। उन्होंने प्रशासन से नुकसान का आकलन कर उचित मुआवजा देने की मांग की है।

बताया जा रहा है कि पिछले कुछ समय से चतरा जिले में लगातार बारिश हो रही है। बारिश के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कई जगह जलजमाव की स्थिति बनी हुई है और कच्चे तथा कमजोर निर्माण वाले भवनों पर भी इसका असर पड़ रहा है। इसी बारिश के बीच कसमार गांव में संचालित मुर्गा फार्म की संरचना कमजोर पड़ गई। देखते ही देखते फार्म का बड़ा हिस्सा भरभराकर नीचे आ गिरा। फार्म के अंदर बड़ी संख्या में मुर्गे मौजूद थे, जिन्हें हादसे के बाद बाहर निकालने का मौका नहीं मिल सका।

फार्म के गिरने की जानकारी मिलते ही आसपास के लोग मौके पर पहुंचे। ग्रामीणों ने मलबे को हटाने की कोशिश की, लेकिन फार्म के अंदर दबे ज्यादातर मुर्गों को बचाया नहीं जा सका। करीब 900 मुर्गों की मौत से व्यवसायी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। घटना के बाद फार्म परिसर में मलबा और मृत मुर्गों का ढेर लग गया। स्थानीय लोगों ने भी इस हादसे को बारिश से जुड़ी बड़ी क्षति बताया।

व्यवसायी साधु यादव के लिए यह नुकसान केवल मुर्गों की मौत तक सीमित नहीं है। पोल्ट्री व्यवसाय में मुर्गों के अलावा फार्म तैयार करने, दाना-पानी, दवाइयों, बिजली, मजदूरी और अन्य व्यवस्थाओं पर भी लगातार खर्च होता है। ऐसे में एक साथ बड़ी संख्या में मुर्गों की मौत होने से व्यवसायी की पूरी पूंजी प्रभावित हो सकती है। साधु यादव ने नुकसान की भरपाई के लिए प्रशासन से आर्थिक सहायता की मांग की है।

व्यवसायी के मुताबिक, फार्म में करीब 900 मुर्गे रखे गए थे। भारी बारिश के दौरान फार्म की संरचना पर पानी और मौसम का दबाव बढ़ता गया। इसी दौरान भवन ढह गया और मुर्गे उसके नीचे दब गए। हादसे के बाद जब तक मलबा हटाया गया, तब तक बड़ी संख्या में मुर्गों की मौत हो चुकी थी। घटना में किसी व्यक्ति के घायल होने की जानकारी उपलब्ध रिपोर्ट में सामने नहीं आई है।

कसमार गांव में हुए इस हादसे के बाद आसपास के दूसरे पशुपालकों और पोल्ट्री व्यवसायियों में भी चिंता बढ़ गई है। लगातार बारिश के दौरान कमजोर शेड और अस्थायी ढांचे में रखे गए पशु-पक्षियों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कई छोटे व्यवसायी सीमित संसाधनों के साथ पोल्ट्री फार्म चलाते हैं। ऐसे में प्राकृतिक आपदा के कारण होने वाला नुकसान उनके लिए लंबे समय तक आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है।

पोल्ट्री कारोबार में मुर्गों को सुरक्षित रखने के लिए फार्म की छत, दीवार और शेड का मजबूत होना जरूरी होता है। बारिश के मौसम में पानी का रिसाव और लगातार नमी भी ढांचे को कमजोर कर सकती है। यदि पानी जमा हो जाए या निर्माण सामग्री कमजोर हो तो अचानक ढहने का खतरा बढ़ सकता है। कसमार में भी फार्म ढहने के पीछे भारी बारिश को प्रमुख वजह बताया जा रहा है। हालांकि भवन किस स्थिति में था और ढांचे की मजबूती कितनी थी, इसकी आधिकारिक तकनीकी जांच की जानकारी फिलहाल सामने नहीं आई है।

हादसे के बाद व्यवसायी ने प्रशासन से मौके का निरीक्षण कराने और नुकसान का आकलन कराने की मांग की है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में मुर्गों की मौत से कारोबार को भारी नुकसान हुआ है। यदि सरकारी स्तर पर प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान के लिए कोई सहायता या मुआवजे का प्रावधान लागू होता है तो उन्हें उसका लाभ दिया जाना चाहिए। प्रशासन की ओर से सर्वे और दस्तावेजों की जांच के बाद ही किसी सहायता पर निर्णय लिया जा सकता है।

घटना ने यह भी दिखाया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे व्यवसाय किस तरह मौसम की मार से प्रभावित हो सकते हैं। खेती के अलावा पशुपालन और पोल्ट्री व्यवसाय भी बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों की आय का साधन हैं। एक तरफ बारिश से खेतों में नुकसान की आशंका रहती है, वहीं दूसरी ओर पशु-पक्षियों को रखने वाले शेड और फार्म भी प्रभावित हो सकते हैं। कसमार में मुर्गा फार्म के ढहने से सामने आया नुकसान इसी तरह की प्राकृतिक आपदा का उदाहरण है।

लगातार बारिश के कारण चतरा के ग्रामीण इलाकों में लोगों को पहले से ही कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कच्ची सड़कों पर पानी भरने और आवागमन प्रभावित होने के साथ-साथ कई जगह घरों और अन्य निर्माणों पर भी बारिश का असर पड़ सकता है। ऐसे में पोल्ट्री फार्म जैसे बड़े शेड वाले ढांचों की स्थिति पर भी नजर रखना जरूरी हो जाता है।

ग्रामीणों ने बताया कि फार्म गिरने के बाद आसपास के लोग मौके पर पहुंचे और राहत के तौर पर मलबा हटाने में मदद की। लोगों की कोशिश थी कि यदि कोई मुर्गा जिंदा बचा हो तो उसे बाहर निकाला जा सके। लेकिन हादसा इतना गंभीर था कि करीब 900 मुर्गों की मौत हो गई। घटना के बाद फार्म संचालक के सामने मृत मुर्गों के निस्तारण की समस्या भी खड़ी हो गई।

मृत पक्षियों का उचित तरीके से निस्तारण करना भी जरूरी होता है, ताकि संक्रमण और दुर्गंध जैसी समस्या पैदा न हो। पोल्ट्री फार्म में एक साथ बड़ी संख्या में पक्षियों की मौत होने पर संबंधित विभाग को भी इसकी जानकारी देना महत्वपूर्ण हो सकता है। प्रशासन और पशुपालन विभाग की ओर से यदि कोई टीम मौके पर पहुंचती है तो वह मृत मुर्गों की स्थिति, फार्म की संरचना और नुकसान का आकलन कर सकती है।

साधु यादव ने नुकसान की राशि करीब 10 से 15 लाख रुपये बताई है। वास्तविक नुकसान कितना हुआ, यह फार्म में रखे गए मुर्गों की संख्या, उनकी उम्र और बाजार मूल्य के साथ-साथ फार्म की संरचना और अन्य संपत्ति के नुकसान के आकलन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। इसलिए फिलहाल 10 से 15 लाख रुपये का आंकड़ा व्यवसायी के अनुमान के तौर पर देखा जाना चाहिए।

इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर यह मांग भी उठ सकती है कि प्राकृतिक आपदा से प्रभावित छोटे कारोबारियों के नुकसान का सर्वे कराया जाए। आमतौर पर आपदा के समय प्रशासन की ओर से प्रभावित क्षेत्रों का आकलन किया जाता है। यदि किसी योजना या नियम के तहत पात्रता बनती है तो संबंधित लाभार्थियों को सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है। इस मामले में भी व्यवसायी की मांग अब प्रशासनिक जांच और नुकसान के आकलन पर निर्भर करेगी।

कसमार गांव के लोगों के लिए भी यह घटना चिंता का कारण बनी है। एक ही फार्म में इतनी बड़ी संख्या में मुर्गों की मौत होने से ग्रामीणों ने बारिश के दौरान दूसरे फार्म संचालकों को भी सावधानी बरतने की जरूरत बताई है। फार्म की छत और दीवारों की मजबूती, पानी की निकासी और शेड में अतिरिक्त भार न बनने देने जैसे उपाय बारिश के दौरान महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

फार्म संचालक के सामने अब कारोबार को दोबारा खड़ा करने की चुनौती है। यदि मुर्गों की पूरी खेप नष्ट हो जाती है तो दोबारा चूजे खरीदने, दाना-पानी की व्यवस्था करने और फार्म को ठीक कराने में अतिरिक्त पूंजी की जरूरत होगी। पहले से हुए नुकसान के कारण छोटे कारोबारी के लिए यह खर्च जुटाना आसान नहीं होता। इसी वजह से साधु यादव प्रशासन से मुआवजे की मांग कर रहे हैं।

हादसे की जानकारी मिलने के बाद स्थानीय लोगों ने भी व्यवसायी के नुकसान को देखते हुए प्रशासन से सहायता की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि प्राकृतिक आपदा के कारण यदि किसी छोटे कारोबारी को इतनी बड़ी आर्थिक क्षति होती है तो सरकारी स्तर पर उसकी स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए। इससे प्रभावित परिवार को कारोबार दोबारा शुरू करने में मदद मिल सकती है।

फिलहाल इस घटना में सबसे बड़ा नुकसान 900 मुर्गों की मौत के रूप में सामने आया है। भारी बारिश के बीच फार्म के ढहने से कुछ ही समय में व्यवसायी की बड़ी पूंजी खत्म हो गई। अब प्रशासनिक टीम के निरीक्षण और नुकसान के आकलन के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि व्यवसायी को किसी सरकारी योजना या आपदा राहत के तहत सहायता मिल सकती है या नहीं।

चतरा में लगातार बारिश के बीच सामने आई यह घटना ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मौसम के प्रभाव को भी सामने लाती है। छोटे पोल्ट्री कारोबारी अपनी सीमित पूंजी लगाकर व्यवसाय चलाते हैं। प्राकृतिक आपदा के कारण यदि पूरा फार्म और उसमें रखे पक्षी नष्ट हो जाएं तो उन्हें दोबारा कारोबार शुरू करने में काफी समय लग सकता है। कसमार के साधु यादव के सामने भी अब यही चुनौती है।

व्यवसायी की मांग है कि प्रशासन मौके पर पहुंचकर नुकसान का आकलन करे और उन्हें उचित मुआवजा दिलाने की प्रक्रिया शुरू करे। वहीं स्थानीय स्तर पर भी लोगों की नजर अब प्रशासनिक कार्रवाई पर है। यदि सर्वे कराया जाता है तो उससे नुकसान की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है और इसके आधार पर आगे की सहायता का रास्ता साफ हो सकता है।

फिलहाल कसमार गांव में हुए इस हादसे ने बारिश के बीच पोल्ट्री फार्मों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। करीब 900 मुर्गों की मौत से व्यवसायी को लाखों रुपये का नुकसान हुआ है। साधु यादव ने सरकार और प्रशासन से आर्थिक मदद की मांग की है। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग की ओर से नुकसान का कितना आकलन किया जाता है और व्यवसायी को राहत के तौर पर क्या सहायता मिलती है।

Leave a comment