द मॉनसून रॉकर्स: जब मेंढकों ने छपाक ताल में मचाया रॉक

छपाक ताल की इस मजेदार कहानी में मेंढकों का रॉक बैंड मॉनसून में धमाकेदार कॉन्सर्ट करता है और सिखाता है कि रचनात्मकता साधनों की मोहताज नहीं होती।

'छपाक ताल' नाम के एक बड़े से तालाब में सैकड़ों मेंढक रहते थे। उनका जीवन बहुत सीधा सादा था दिन भर मक्खियाँ पकड़ना और रात भर 'टर्र टर्र' करना। लेकिन इस साल मॉनसून की पहली बारिश के साथ ही कुछ तूफानी होने वाला था। तालाब का सबसे कूल मेंढक, 'रॉकी', अपनी पुरानी बोरिंग ज़िंदगी से तंग आ चुका था।

कहानी 

काले बादलों ने आसमान घेर लिया और झमाझम बारिश शुरू हो गई। सारे मेंढक खुशी से बाहर निकल आए और अपना वही पुराना 'टर्र टर्र' का राग अलापने लगे।

रॉकी एक बड़े कमल के पत्ते पर बैठा था। उसने अपना सिर हिलाया और बोला, 'यार, यह क्या हर साल वही पुरानी टर्र टर्र! इस बार कुछ नया, कुछ धमाकेदार होना चाहिए। कुछ ऐसा जिससे पूरा जंगल हिल जाए!'

उसके पास ही उसका दोस्त 'गोलू' बैठा था, जो इतना मोटा था कि जब चलता था तो धरती हिलती थी। गोलू ने एक मक्खी निगलते हुए पूछा, 'तो क्या करें भाई? भरतनाट्यम?'

रॉकी की आँखों में चमक आ गई। 'नहीं! हम बनाएंगे अपना म्यूजिक बैंड! एक रॉक बैंड!'

यह आईडिया जंगल की आग की तरह फैल गया। लेकिन समस्या यह थी कि इंस्ट्रूमेंट्स (वाद्य यंत्र) कहाँ से लाएं?

रॉकी ने कहा, 'हम जंगल की चीज़ों से ही अपना म्यूज़िक बनाएंगे।'

बैंड के सदस्य चुने गए

  • लीड सिंगर (गायक): खुद रॉकी, क्योंकि उसकी आवाज़ सबसे भारी और दमदार थी।
  • ड्रमर (ढोल वादक): गोलू। उसे तालाब के किनारे पड़ा एक खोखला लकड़ी का तना मिल गया। जब गोलू अपनी भारी भरकम टांगों से उस पर कूदता, तो 'धम धम धड़ाम' की ज़बरदस्त आवाज़ आती थी।
  • गिटारिस्ट: 'फिद्दी', जो एक पतला और फुर्तीला मेंढक था। उसने एक मज़बूत सूखी टहनी पर मकड़ी के जाले के मोटे तार बांधे और उन्हें खींचकर 'ट्वैंग ट्वैंग' की आवाज़ निकालने लगा।

उन्होंने अपने बैंड का नाम रखा 'द मॉनसून रॉकर्स'।

दिन रात प्रैक्टिस शुरू हुई। पहले तो उनकी आवाज़ें सुनकर मछलियाँ डर गईं और कछुए अपने खोल में छिप गए। लेकिन धीरे धीरे उनकी लय बनने लगी।

आखिरकार, सबसे बड़ी तूफानी रात आ गई। आज उनका पहला लाइव कॉन्सर्ट था।

तालाब के बीचों बीच एक बड़ी चट्टान को स्टेज बनाया गया। हज़ारों जुगनू (Fireflies) अपनी रोशनी जलाकर 'डिस्को लाइट' का काम कर रहे थे। दर्शक दीर्घा में मछलियाँ, केंचुए, घोंघे और यहाँ तक कि कुछ सांप भी शांति से बैठकर शो शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे।

रॉकी ने एक मशरूम को माइक समझकर थाम लिया और जोर से बोला, 'हेलो छपाक ताल! क्या रॉक करने को तैयार हो?'

दर्शकों ने शोर मचाया।

गोलू ने ड्रम पर पहली बीट मारी 'धम! धम! धड़ाम!' फिद्दी ने गिटार के तार छेड़े 'ट्वैंग! ट्वैंग!' और रॉकी ने अपना रॉक गाना शुरू किया

'बादल गरजे, बिजली कड़के, नाचे हम सब मिलके जमके! पानी है हमारा स्टेज, कीचड़ है अपना फ्लोर, मॉनसून रॉकर्स मचाएंगे शोर, वन्स मोर, वन्स मोर! टर्रर्र... टर्रर्र... धम! धम! धम!'

माहौल एकदम बिजली जैसा हो गया। गोलू मेंढक इतने जोश में आ गया कि वह ड्रम बजाते बजाते हवा में उछलने लगा। फिद्दी अपनी टहनी लेकर स्टेज पर स्केटिंग करने लगा।

तभी प्रकृति ने भी उनका साथ दिया। गाने के क्लाइमेक्स (चरम) पर, आसमान में एक ज़ोरदार बिजली कड़की 'कड़ाम!'

यह आवाज़ उनके म्यूज़िक के साथ एकदम फिट बैठ गई। दर्शकों को लगा कि यह भी बैंड का ही कोई स्पेशल इफ़ेक्ट है। सारे जानवर पागल होकर नाचने लगे। पानी में लहरें उठने लगीं।

वह रात जंगल के इतिहास की सबसे यादगार रात बन गई। 'द मॉनसून रॉकर्स' सुपरहिट हो गए।

अब हर बरसात में, जब बादल गरजते हैं, तो छपाक ताल के पास रहने वाले लोग जानते हैं कि यह सिर्फ़ बादलों की आवाज़ नहीं है, बल्कि रॉकी और उसका रॉक बैंड अपनी परफॉरमेंस दे रहा है।

सीख

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि 'रचनात्मकता (Creativity) के लिए महंगे साधनों की ज़रूरत नहीं होती। अगर आपके पास एक नया विचार और कुछ करने का जोश है, तो आप अपने आसपास की साधारण चीज़ों से भी कुछ असाधारण और मज़ेदार बना सकते हैं।'

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