डीजीपी नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, CJI सूर्य कांत बोले- 'पश्चिम बंगाल सरकार राज्यसभा भेजने में ज्यादा व्यस्त'

डीजीपी नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, CJI सूर्य कांत बोले- 'पश्चिम बंगाल सरकार राज्यसभा भेजने में ज्यादा व्यस्त'

पश्चिम बंगाल में डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े मामले पर सुनवाई करते हुए सूर्यकांत ने बड़ी टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार राज्य के डीजीपी की नियुक्ति के बजाय उन्हें राज्यसभा भेजने में ज्यादा व्यस्त है।

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय में पश्चिम बंगाल में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने राज्य सरकार पर तीखी टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पश्चिम बंगाल सरकार नियमित डीजीपी नियुक्त करने के बजाय अधिकारियों को राज्यसभा भेजने में अधिक व्यस्त है।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पश्चिम बंगाल के पूर्व डीजीपी Rajeev Kumar को तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के लिए चुना गया है। इस घटनाक्रम ने प्रशासनिक नियुक्तियों और राजनीतिक भूमिकाओं के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि राज्य सरकारें पुलिस प्रमुख की नियमित नियुक्ति से बच रही हैं। अदालत ने कहा कि कई राज्यों में तय प्रक्रिया के अनुसार दो वर्ष के निश्चित कार्यकाल वाले डीजीपी की नियुक्ति नहीं की जा रही है और इसके बजाय कार्यवाहक या अस्थायी अधिकारियों को पद पर रखा जा रहा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासनिक स्थिरता के लिए आवश्यक है कि डीजीपी जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियमित नियुक्ति हो। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर सरकारें नियमों का पालन नहीं करती हैं तो यह न्यायालय के पूर्व निर्देशों का उल्लंघन माना जाएगा।

2006 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 2006 के प्रसिद्ध Prakash Singh vs Union of India case का भी उल्लेख किया। इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि डीजीपी की नियुक्ति एक निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए और उसे कम से कम दो साल का निश्चित कार्यकाल दिया जाना चाहिए। इस निर्णय का उद्देश्य पुलिस व्यवस्था को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना और कानून-व्यवस्था को निष्पक्ष बनाए रखना था। अदालत ने उस समय कहा था कि पुलिस प्रशासन को सरकार के दबाव से अलग रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है।

पूर्व डीजीपी राजीव कुमार को सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस की ओर से राज्यसभा के लिए चुना जाना भी इस मामले में चर्चा का कारण बना। अदालत में सुनवाई के दौरान इस संदर्भ का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की गई कि राज्य सरकार को पहले पुलिस नेतृत्व की स्थिरता सुनिश्चित करनी चाहिए। राजीव कुमार का नाम पहले भी कई विवादों में आ चुका है। 

वर्ष 2019 में शारदा चिटफंड घोटाले की जांच के दौरान केंद्रीय एजेंसियों और पश्चिम बंगाल पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी। उस समय राज्य की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने कोलकाता में धरना दिया था, जब केंद्रीय जांच ब्यूरो की टीम तत्कालीन कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ करने पहुंची थी।

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